सपनों की इस नगरी में ऐसा तिलिस्म है कि यहां की बदहाली भी नीलाम होती है. कहते हैं कि मुंबई के गटर भी सोने के हैं, जहां गरीबी अब केवल एक हालात नहीं, बल्कि एक 'बिकाऊ वस्तु' बन चुकी है. यह विडंबना ही है कि यहां के अभावों को 'एक्सपोज़र' और 'एजुकेशन' का मुलम्मा चढ़ाकर नुमाइश के लिए रखा जाता है. और इस नुमाइश के खरीदार सिर्फ सात समंदर पार से आए सैलानी ही नहीं, बल्कि मालाबार हिल और पेडडर रोड के वो संभ्रांत रईस भी हैं, जिनके लिए गरीबी एक 'टूरिस्ट डेस्टिनेशन' बन गई है.
दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक, धारावी में यह नज़ारा सबसे ज्यादा दिखाई देता है. मुंबई के दिल में बसी इस बस्ती की हालिया यात्रा के दौरान सबसे चौंकाने वाले दृश्यों में से एक था अभिजात वर्ग को गरीबी बेचा जाना, वह भी दो घंटे के 15,000 रुपये में.
इंडिया टुडे डिजिटल ने जब धारावी की तंग गलियों में एक प्लंबर, राजू हनुमंता और उनके पड़ोसी इडली बेचने वाले शनप्पा का इंटरव्यू लिया, तो उसी वक्त वहां विदेशियों का एक समूह दिखाई दिया, एक ऐसी जगह जहां उनकी मौजूदगी की उम्मीद सबसे कम थी, उनके साथ एक "गाइड" भी था.
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मुंबई का वो अंधेरा हिस्सा...
धारावी में ऐसी कई गलियां हैं, जहां आम मुंबईकर भी जाने से हिचकिचाते हैं. ये गलियां मुंबई का वह अंधेरा हिस्सा हैं, जिन्हें कभी वरदराजन मुदलियार जैसे क्राइम बॉसों से जोड़कर देखा जाता था. उनके गुर्गे अब जबरन वसूली या खून-खराबे में तो नहीं, बल्कि उन धंधों में लगे हैं, जिन्हें अब वैध माना जाता है. जैसे रियल एस्टेट, जमीन से जुड़ी चीजें और ड्रग्स. लेखक और पूर्व खोजी पत्रकार एस. हुसैन जैदी, जो मुंबई के इस अंधेरे हिस्से को रग-रग से जानते हैं, उनका कहना है कि तरीके भले ही बदल गए हों, लेकिन फितरत अब भी वही है.
खैर, वह समानांतर अर्थव्यवस्था एक अलग कहानी है. यहां हम बात कर रहे हैं 'गरीबी के व्यापार' की.
गरीबी, खासकर भारत में, हाथों-हाथ बिकती है. धारावी की अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था में यह एक ऐसा पहलू है जिसके बारे में हमने सोचा तक नहीं था. विदेशियों के उस समूह का नेतृत्व एक स्थानीय व्यक्ति, ओंकार ढमाले कर रहा था. जब उससे पूछा गया कि वह इस 'स्लम टूर' के लिए कितना शुल्क लेता है, तो उसका जवाब था, "प्रति व्यक्ति 15,000 रुपये." उसके साथ पांच विदेशी थे. यानी झुग्गियों में सिर्फ दो घंटे की पैदल सैर के लिए वह 75,000 रुपये कमाने वाला था.

सालों से चल रहा है गरीबी दर्शन
यह कोई नया चलन नहीं है, 'इंडिया टुडे मैगजीन' ने साल 2006 में ही पूरे भारत में फैल रहे 'गरीबी पर्यटन' (Poverty Tourism) पर रिपोर्ट दी थी, लेकिन अब कुछ बदल गया है. पहले इस तरह के टूर संगठित समूहों और प्रशिक्षित गाइडों द्वारा चलाए जाते थे. अब यह व्यवसाय खुद धारावी के निवासी संभाल रहे हैं और उनकी फीस किसी कॉर्पोरेट सैलरी के बराबर है. मुंबई आने वाले विदेशी अक्सर धारावी की लेदर मार्केट वाली सड़क तक ही आते हैं. लेकिन यह बस्ती उस मुख्य मार्ग से बहुत आगे, कई किलोमीटर तक गहराई में फैली हुई है. वहां ऐसी गलियां और कोने हैं जो दुनिया की नजरों से ओझल हैं, जहां सिर्फ वहां रहने वाले लोग ही जाते हैं. महज तीन फीट चौड़ी गलियां. ऐसी जगहें न केवल विदेशियों को, बल्कि मुंबई के उन निवासियों को भी आकर्षित करती हैं, जिन्होंने कभी यहां कदम रखने की हिम्मत नहीं की.
हालांकि, भारतीय इन स्लम टूर के लिए अलग कीमत चुकाते हैं- 1,500 रुपये से लेकर 7,000 रुपये के बीच, जहां अधिकतम कीमत भी किसी विदेशी पर्यटक से ली जाने वाली राशि की आधी होती है.
कई लोग इस तरह के दौरों को 'वॉयूरिज्म' (दूसरों की मजबूरी या निजी जिंदगी को मजे के लिए देखना) कहते हैं, लेकिन धारावी में पले-बढ़े और 12वीं तक पढ़े स्थानीय निवासी ढमाले के लिए अपने इलाके से कमाई करने में कुछ भी गलत नहीं है. उनका कहना है, "गोरे लोगों को झोपड़पट्टी पहली बार देखने को मिलता है इधर. अपना घर दिखा कर पैसा मिलता है, कायको नहीं दिखाएं?
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असली दिक्कत तब आती है, जब रईस लोग ही दूसरे अमीर लोगों को गरीबी की आधी-अधूरी जानकारी देकर पैसे कमाते हैं. धारावी की गलियों में कदम रखते ही आपको समझ आता है कि वहां जिंदगी कितनी जद्दोजहद भरी है, जहां हर शख्स अपनी पहचान बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है. जब आप ओंकार ढमाले जैसे गाइडों को विदेशियों के साथ वहां देखते हैं, जो बड़े शौक से उस गरीबी को देखने आते हैं, तब आपको मुंबई की उस उलझी हुई और अजीब सच्चाई का एहसास होता है.
धारावी वॉक्स का दूसरा पहलू जो केवल दिखावे से परे है लंबे समय तक, 'खाकी टूर्स' के संस्थापक भरत गोठोसकर ने पर्यटकों को धारावी ले जाने के विचार का विरोध किया. उन्होंने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया, "पहले तीन-चार साल हमने ऐसा कभी नहीं किया." उनके लिए यह सीधे तौर पर 'पॉवर्टी टूरिज्म' जैसा था. एक ऐसी स्थिति जैसा 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' फिल्म में दिखाया गया था, जहां एक जापानी पर्यटक मुंबई में "गरीब और भूखे लोगों" को देखने आता है.
कैसे बिक रही है गरीबी?
लेकिन उन्होंने समझाया कि यह चलन अचानक पैदा नहीं हुआ था. 2005 में एक यूरोपीय सामाजिक कार्यकर्ता क्रिस वे और कृष्णा पुजारी द्वारा शुरू किए गए 'रियलिटी टूर्स' ने धारावी में व्यवस्थित तरीके से घूमने का एक खाका तैयार किया था. इसके पीछे विचार यह था कि स्थानीय छात्र इतना कमा सकें कि वे अपनी शिक्षा का खर्च उठा सकें. गोठोसकर ने कहा कि उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा वापस उसी समुदाय के काम आता था. समय के साथ, जो एक व्यवस्थित पहल के रूप में शुरू हुआ था, वह कुछ और ही बन गया. उन्होंने आगे कहा- "अब धारावी में स्लम टूरिज्म एक 'कुटीर उद्योग' बन गया है. आज, कोई भी जो कामचलाऊ अंग्रेजी बोल सकता है, खुद को गाइड के रूप में पेश कर सकता है और "गरीबी बेच" सकता है.
समय के साथ गोठोसकर का अपना नजरिया भी बदला. खुद एक ऐसे ही धारावी दौरे में शामिल होने के बाद, उन्होंने इसे अलग तरह से देखना शुरू किया. उन्होंने तर्क दिया, "जिस तरह से मैं इसे देखता हूं, यह केवल गरीबी के बारे में नहीं है. यह जितना अभाव के बारे में है, उतना ही उद्योग, प्रवास, धर्म और भूगोल के बारे में भी है."
कई घरों में एयर-कंडीशनर लगे हैं, स्थानीय लोग और विदेशी, दोनों ही यह देखकर हैरान रह जाते हैं. गोठोसकर कहते हैं, 'यह सच है कि यहां रहने की जगह तंग है, लेकिन यह इलाका शहर के बीचों-बीच है. यहां रहने वालों के लिए यह एक व्यावहारिक सौदा है उन्हें विरार या बदलापुर जैसे दूर-दराज के इलाकों के मुकाबले यहां से आने-जाने में आसानी होती है.' गोठोसकर बताते हैं कि उनकी कंपनी धारावी को किसी तमाशे की तरह नहीं देखती. वे कहते हैं, 'हम स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम करते हैं, लेकिन हमारा तरीका अलग है. हम यहां के अनौपचारिक मकानों, रीसाइक्लिंग और यहां की बसावट पर एक गहरी समझ और चर्चा पर ध्यान देते हैं.'

जहां कुछ टूर यहां की बारीकियों और स्थानीय लोगों के नजरिए को समझाते हैं, वहीं कुछ टूर ऐसे भी होते हैं जहां बिना किसी जानकारी के बस गलियों में चक्कर लगवा दिए जाते हैं, जैसा कि ढमाले के मामले में दिखा. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने उन स्थानीय लोगों से इजाजत ली थी जिनकी विदेशी फोटो खींच रहे थे, तो उन्होंने कहा, 'अपने ही लोग हैं... सब चलता है.'"
लेकिन असलियत ऐसी नहीं थी. जब 'इंडिया टुडे डिजिटल' ने राजू हनुमंता, उनकी पत्नी और शनप्पा से फोटो खिंचवाने के लिए कहा, तो उन्होंने साफ मना कर दिया. इसकी वजह यह है कि धारावी का नाम अक्सर दुख-तकलीफ और गरीबी से जोड़ा जाता है, और उन्हें डर था कि एक और पत्रकार वही सब दिखाने आ गया है. वे नहीं चाहते थे कि उनकी पहचान बस एक 'झोपड़पट्टी' की बुरी यादों तक सिमट कर रह जाए.
जानकारी देने और किसी की निजी जिंदगी में दखल देने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है. कई बार यहां के निवासियों ने इसका विरोध भी किया है. कुछ इलाकों में तो पर्यटकों के आने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है, क्योंकि वे बिना इजाजत घरों के अंदर की तस्वीरें खींचते थे.
गोठोसकर कहते हैं, "हम हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि फोटो लेने से पहले इजाजत जरूर लें." कुम्हारवाड़ा में बुजुर्ग महिलाएं अक्सर फोटो खिंचवाने से मना कर देती हैं. वहां आने वालों को साफ कहा जाता है कि वे बर्तनों की फोटो लें, कुम्हार की नहीं.
गोठोसकर का मानना है कि यह गाइड की जिम्मेदारी है कि वह पर्यटकों को समझाए कि यह दौरा समझने के लिए है, न कि लगातार फोटो खींचने या 'गरीबी देखने' के लिए. उन्होंने आगे बताया, "कचरा रीसाइक्लिंग की वह व्यवस्था, जहां रद्दीवाले बिना सरकारी मदद के आपको कचरे के बदले पैसे देते हैं, वह विदेशी मेहमानों को तंग घरों को देखने से ज्यादा हैरान करती है. लेकिन ऐसी व्यवस्थाओं को सही संदर्भ में समझाने की जरूरत होती है."
वे कहते हैं, "एक स्थानीय निवासी कहानी का एक पहलू बताता है, जबकि एक ट्रेन्ड गाइड उसे ब्राजील या दुनिया के अन्य झुग्गी वाले शहरों से तुलना करके गहराई से समझाता है." धारावी के ये 'स्लम टूर' यहां की मेहनत करने की संस्कृति और औद्योगिक जज्बे को भी दिखाते हैं.
गोठोसकर ने कहा, "क्या पुनर्विकास (redevelopment) इस जज्बे को बदल देगा, यह अभी अनिश्चित है. लोगों की रोजी-रोटी के तरीके बदलेंगे. यहां तक कि वे युवा गाइड जो इन दौरों पर निर्भर हैं, उन्हें भी शायद खुद को नए सिरे से ढालना पड़े." जब इंडिया टुडे डिजिटल ने राजू हनुमंता और उनकी पत्नी से पूछा कि उन्हें कैसा लगता है जब विदेशी और टूर गाइड उनकी गलियों में बिना पूछे घुस आते हैं, तो हनुमंता ने कहा, "उसका घर चलता है इससे. क्या ही कहेंगे।" उनकी पत्नी ने बिना किसी भाव के बस सिर हिलाकर सहमति जताई.