मुंबई की धारावी के बारे में अब क्या नया लिखा जाए? इस जगह पर दुनिया भर के लेखकों, कवियों और फिल्ममेकर्स ने न जाने कितनी कहानियां लिखी हैं. धारावी एक ऐसी जगह है, जहां के हालात को बयां करने के लिए कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं. मशहूर लेखक सलमान रुश्दी ने भी एक बार कहा था कि अगर धारावी की हकीकत को पूरी तरह समझना है, तो यहां महीनों तक रहना पड़ेगा. लेकिन फिर भी, यह बस्ती बार-बार हमारा ध्यान अपनी ओर खींचती है, क्योंकि यहां की तंग गलियों में बहुत कुछ ऐसा है जो दुनिया की नजरों से अब भी छिपा हुआ है.
धारावी की गलियों में कदम रखते ही यहां का फलता-फूलता कारोबार और एक अलग ही दुनिया का एहसास होने लगता है. इसे अक्सर 'शहर के भीतर बसा शहर' कहा जाता है, जहां लाखों लोगों की जिंदगी इन तंग झुग्गियों से ही शुरू होकर यहीं सिमट जाती है. यहीं पैदा हुए और पेशे से प्लंबर राजू हनुमंता धारावी की पूरी हकीकत को बस एक बात में समझा देते हैं 'गटर है, पर सोने का है'
धारावी के छोटे-छोटे बिजनेस आज पूरी मुंबई की रफ्तार को बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं. अक्सर लोग धारावी को सिर्फ एक झुग्गी-बस्ती के तौर पर देखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यहां का बिजनेस सेटअप दक्षिण मुंबई के ऐतिहासिक 'बैलार्ड एस्टेट' और बांद्रा के चमचमाते 'बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स' के आलीशान दफ्तरों को सीधी टक्कर देता है. जहां बड़े-बड़े बोर्डरूम में बैठकर डील्स होती हैं, वहीं धारावी की इन तंग गलियों में बिना किसी शोर-शराबे के उससे भी बड़ा कारोबार जमीन पर उतारा जाता है.

बाहर से देखने वालों के मन में अक्सर यह धारणा होती है कि धारावी जैसी जगह में जमीन और दुकानों के दाम बहुत कम होंगे, लेकिन यहां के आंकड़े इस सोच को पूरी तरह बदल देते हैं. एशिया की इस सबसे बड़ी झुग्गी में कमर्शियल दुकानों का किराया सुनकर कोई भी दंग रह सकता है. यहां दुकानों का मासिक किराया 5 लाख रुपये तक पहुंच जाता है, जो मुंबई के कई पॉश इलाकों के बराबर या उससे भी ज्यादा है. यह बताता है कि यहां की जमीन का हर एक इंच कितना कीमती है.
मात्र 2.4 वर्ग किलोमीटर के इस बेहद छोटे से इलाके में अरबों डॉलर का कारोबार साल के बारह महीने बिना रुके चलता रहता है. यहां का टर्नओवर सालाना 9,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है. धारावी में दो अलग-अलग हकीकतें एक साथ चलती हैं, जहां एक तरफ बुनियादी सुविधाओं का अभाव और गरीबी साफ झलकती है, वहीं दूसरी तरफ यहां का आर्थिक ढांचा इतना मजबूत है कि यह पूरी मुंबई की इकोनॉमी को एक बड़ा सहारा देता है. इसी वजह से धारावी आज दुनिया भर के बिजनेस एक्सपर्ट्स के लिए शोध का विषय बन चुकी है.
अक्सर लोग धारावी को एक ऐसी जगह की तरह देखते हैं जहां से फिल्में या कहानियां निकलती हैं. कई लोग यहां की गरीबी में भी अपनी प्रेरणा ढूंढ लेते हैं, लेकिन हम यहां किसी कहानी की तलाश में नहीं हैं. हमारा मकसद उस जमीनी हकीकत को समझना है जो यहां की अर्थव्यवस्था को चलाती है. हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर उन झुग्गियों में बिजनेस करना इतना महंगा क्यों है, जहां रहने के हालात भी ठीक नहीं हैं.
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क्यों है यहां बिजनेस करना इतना महंगा?
अगर कोई बांद्रा या दक्षिण मुंबई के रईस इलाकों में पला-बढ़ा है, तो उसके लिए धारावी की इन घुमावदार और पतली गलियों में कुछ मिनट चलना भी भारी पड़ जाएगा. यहां की बनावट ऐसी है कि किसी आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस या पुलिस की वैन अंदर नहीं पहुंच सकती. अगर कहीं आग लग जाए, तो दमकल की गाड़ियों के लिए रास्ता ढूंढना मुश्किल हो जाता है. यहां तक कि आज के दौर में जो लड़के मोबाइल ऐप से खाना पहुंचाते हैं, वे भी इन गलियों में आकर अक्सर चकरा जाते हैं.
लेकिन इतनी दिक्कतों के बाद भी, मुंबई में रोजी-रोटी की तलाश में आने वाले मजदूरों और कामगारों के लिए धारावी ही पहला ठिकाना बनती है. इसकी सबसे बड़ी वजह यहां की सादगी है. यहां किराए पर झुग्गी लेने के लिए आपको पुलिस वेरिफिकेशन का चक्कर नहीं पालना पड़ता. यहां भले ही पीने का साफ पानी न मिले या सीवेज की पक्की सुविधा न हो, लेकिन रहने के लिए कोई आपसे ज्यादा सवाल-जवाब नहीं करता. बस एक ही शर्त है मकान मालिक को महीने का किराया नकद मिल जाना चाहिए. 100 वर्ग फुट की एक छोटी सी खोली का किराया यहां 3,000 से 7,000 रुपये के बीच होता है, जो मुंबई जैसे महंगे शहर में नए आने वालों के लिए एक बड़ा सहारा है.
लेकिन जैसे ही हम रहने वाली झुग्गी से निकलकर बिजनेस वाली दुकानों की तरफ बढ़ते हैं, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. यहां व्यावसायिक संपत्तियों का किराया इतना ज्यादा है कि सुनकर किसी के भी होश उड़ जाएं. जिस इलाके में बुनियादी सुविधाओं का अकाल है, वहां दुकानों का किराया आसमान छू रहा है.
अगर हम मुंबई के बड़े फ्लैट्स से इसकी तुलना करें, तो लगभग 1,200 से 1,300 वर्ग फुट की जगह, जो एक दो BHK फ्लैट जितनी होती है, उसका किराया यहां लाखों में पहुंच जाता है. इतना ही नहीं, करीब 1,800 वर्ग फुट की जगह का किराया तो महीने का 5 लाख रुपये तक पहुंच सकता है. यह बात वाकई हैरान करती है कि जहां आम इंसान के लिए सम्मान के साथ रहना भी मुश्किल है, वहां का बिजनेस इतना मजबूत है कि लोग लाखों रुपये किराया देने को तैयार हैं. यही वो विरोधाभास है जो धारावी को दुनिया की सबसे महंगी और अनोखी झुग्गी बस्ती बनाता है.

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धारावी की असली ताकत है यहां का हुनर
ऐसी जगह पर दुकानों और व्यापार के ये दाम देखकर वाकई बहुत दुख होता है, जहां इंसान की बुनियादी गरिमा और सुख-सुविधाओं का कोई नामोनिशान तक नहीं है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन सब मुश्किलों के बावजूद यहां व्यापार न सिर्फ चल रहा है, बल्कि बहुत बड़े पैमाने पर फल-फूल रहा है.
यहां मुंबई की वो असली ताकत रहती है जो इस शहर को हर रोज अपने कंधों पर उठाती है. इसमें वो मजदूर हैं जो फैक्ट्रियों में पसीना बहाते हैं, चौकीदार, घरों में काम करने वाले लोग, टैक्सी और ऑटो चलाने वाले ड्राइवर, और गलियों में इडली-कॉफी बेचने वाले लोग शामिल हैं. इनके अलावा मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार, कबाड़ का काम करने वाले, बैग और जूते बनाने वाले कारीगर और चमड़े के बेहतरीन फनकारों ने धारावी की इन्हीं तंग गलियों में अपने लिए एक खास जगह बनाई है. धारावी में जो कुछ भी होता है वो किसी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन फिर भी खुद को 'कट्टर मुंबईकर' कहने वाले लोग भी इस शहर के भीतर बसे इस छोटे से शहर में शायद ही कभी कदम रखते हैं.
धारावी का विस्तार इतना बड़ा है कि इसे सिर्फ एक छोटी सी बस्ती कहना गलत होगा. वैसे तो कागजों पर इसका क्षेत्रफल मात्र 2.39 वर्ग किलोमीटर ही दिखता है, लेकिन इसकी जड़ें बांद्रा, माहिम, माटुंगा, सायन, कुर्ला, चुनाभट्टी और किंग्स सर्कल जैसे सात बड़े इलाकों तक फैली हुई हैं. यहां तक कि साकी नाका और कुर्ला के कुछ हिस्सों में भी इसका असर साफ नजर आता है. जब कोई हवाई जहाज से मुंबई उतरता है, तो खिड़की से उसे सबसे पहले इसी झुग्गी बस्ती का अंतहीन विस्तार नजर आता है. एक तरह से देखा जाए तो मुंबई आने वाले मुसाफिरों का स्वागत यही इलाका करता है.
बांद्रा स्टेशन के पश्चिमी और पूर्वी हिस्से के बीच का अंतर इतना ज्यादा है कि देखकर कोई भी चकरा जाए. एक तरफ ऐतिहासिक स्टेशन की इमारत, पॉश लिंकिंग रोड, हिल रोड और आलीशान बंगले हैं, तो वहीं स्टेशन के दूसरी तरफ महज 200 मीटर की दूरी पर झुग्गियां शुरू हो जाती हैं. अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को इन दोनों तरफ की तस्वीरें दिखाएं जो मुंबई को नहीं जानता, तो वो कभी यकीन नहीं करेगा कि ये एक ही इलाके के दो अलग-अलग हिस्से हैं. बांद्रा स्टेशन का पश्चिमी उपनगर अपनी विरासत और रईसी के लिए जाना जाता है, जबकि पूर्वी हिस्सा उस संघर्ष की कहानी कहता है जो धारावी से शुरू होती है.
धारावी का चमड़ा व्यापार और चमड़ा कारखाने
आइए, अब धारावी के उस काम के बारे में जानते हैं जो यहां की असली पहचान बन चुका है और वो है चमड़े का कारोबार. यह सिर्फ एक धंधा नहीं, बल्कि 19वीं सदी के आखिरी सालों से इस बस्ती की असली ताकत रहा है. 'शेफर्ड लेदर गुड्स' के मालिक राजू भोईते पिछले 20 साल से इस काम में हैं. भोईते बहुत गर्व से कहते हैं कि यह उनका पुश्तैनी काम है.

आज धारावी में 5,000 से ज्यादा छोटे कारखाने हैं, जहां कारीगरों के हाथ जादू करते हैं. यहां बैग, जैकेट और बटुए तो बनते ही हैं, साथ ही घोड़ों की काठी, चाबुक और जूते जैसा हर वो सामान तैयार होता है जिसकी मांग दुनिया भर में है. भोईते के पास अपना एक शोरूम है, लेकिन धारावी की हर फैक्ट्री इतनी चमक-धमक वाली नहीं है. इसके बावजूद कमाई का आलम यह है कि उनके जैसे कारोबारी दिन का 20,000 रुपये तक आसानी से कमा लेते हैं, वहीं छोटे दुकानदारों का भी दिन का 5,000 रुपये का लक्ष्य आराम से पूरा हो जाता है.
हैरानी की बात यह है कि जहां रहने वाली झुग्गियों का किराया 3 से 7 हजार रुपये है, वहीं सड़कों के किनारे बनी इन कमर्शियल दुकानों का किराया डेढ़ लाख से लेकर 5 लाख रुपये महीना तक पहुंच जाता है. कोलीवाड़ा रोड पर महज 500 मीटर का यह छोटा सा चमड़ा बाजार साल भर में 250 करोड़ रुपये का बिजनेस करता है. यही वजह है कि यहां जमीन की कीमत और दुकानों का किराया आसमान छूता है.
भले ही इस काम के मालिक ज्यादातर चमार समुदाय के लोग हों, लेकिन यहां पूरा भारत बसता है. महाराष्ट्र के सतारा से लेकर झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार तक के लोग इस काम से जुड़े हैं. चमड़ा कानपुर और चेन्नई से आता है और यहां के कारीगर उसे कीमती प्रोडक्ट में बदल देते हैं. भारत का चमड़ा निर्यात जो अरबों डॉलर का है, उसमें धारावी का बहुत बड़ा योगदान है. यहां के कारीगर एक बैग पर भले ही 200-300 रुपये का मामूली मुनाफा कमाते हों, लेकिन उनके बनाए बैग यूरोप और अमेरिका के बड़े बाजारों की शोभा बढ़ाते हैं.
कारीगर सुनील सोनावाने कहते हैं कि सरकारें आईं और गईं, लेकिन मुंबई के बीचोबीच होने के बाद भी किसी ने उनकी सुध नहीं ली. वे कहते हैं कि अगर उन्हें सही मशीनें और सरकारी मदद मिले, तो उनके कारीगर 'गुच्ची' और 'प्राडा' जैसे बड़े ब्रांड्स को धूल चटा सकते हैं. सोनावाने बताते हैं कि यह काम बहुत कठिन है, रसायनों की वजह से जहरीला कचरा निकलता है, नालियां जाम रहती हैं, पर फिर भी उनके लिए यह चमड़ा 'सोना' ही है.
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कुम्हारवाड़ा में मिट्टी को मिलता है रूप
चमड़े के बाद बारी आती है कुम्हारवाड़ा की, जो पूरे एशिया में मिट्टी के बर्तनों का सबसे बड़ा केंद्र है. यहां की गलियों में कदम रखते ही आपको चारों तरफ दीये, कुल्हड़, सुंदर गमले और कलाकृतियां सजी दिखेंगी. हवा में हमेशा गीली मिट्टी और भट्टियों से उठते धुएं की महक रहती है. गुजरात से आए करीब एक हजार परिवारों ने आज भी इस हुनर को सीने से लगा रखा है.
यहां साल भर में 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार होता है. बारिश के चार महीनों को छोड़ दें, तो बाकी आठ महीने यहां के चाक कभी नहीं रुकते. दिवाली आते-आते तो यहां दिन-रात एक हो जाता है क्योंकि यहां के दीये सिर्फ देश में ही नहीं, विदेशों में भी रोशनी फैलाते हैं. लेकिन इस मुनाफे की एक कड़वी हकीकत भी है. तंग झुग्गियों के अंदर बनी भट्टियों का धुआं यहां के मजदूरों के फेफड़ों में जहर घोल रहा है, जिससे कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है. लोगों का मानना है कि अगर इसे व्यवस्थित किया जाए, तो कई परिवारों की जिंदगी सुधर सकती है.

इडली-वड़े की खुशबू और मुंबई की रफ्तार
धारावी की एक पहचान यहां का स्ट्रीट फूड भी है, जिसका स्वाद पूरी मुंबई चखती है. असल में धारावी की शुरुआत एक तमिल बस्ती के रूप में हुई थी, लेकिन वक्त के साथ यहां कर्नाटक और केरल के लोग भी बस गए. आज पूरी मुंबई में जो सुबह-सुबह इडली-वड़ा और फिल्टर कॉफी की महक आती है, उसका असली केंद्र धारावी ही है.
यहां के कारीगर रात के ढाई बजे से काम पर लग जाते हैं. सुबह 5 बजे तक हजारों किलो इडली तैयार हो जाती है, जिसे छोटे दुकानदार थोक भाव में खरीदते हैं और फिर अपनी साइकिलों पर लादकर बांद्रा से कांदिवली तक गलियों-गलियों में बेचते हैं. कर्नाटक के यादगिर से आए शानप्पा पिछले 30 साल से यही काम कर रहे हैं. वे बताते हैं कि सुबह के वक्त यहां की गलियों में चाय-कॉफी की खुशबू सीलन की बदबू को पूरी तरह ढंक लेती है. इस काम का कोई लिखित आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन यह धारावी की उस 'अनौपचारिक अर्थव्यवस्था' का बहुत अहम हिस्सा है.

मुंबई के असली रक्षक हैं कबाड़ी वाले
धारावी के सबसे बड़े 'हीरो' हैं यहां के कबाड़ व्यापारी. ये वो लोग हैं जो रद्दी कागज से लेकर पुरानी लग्जरी गाड़ियों के ढांचे तक का सौदा करते हैं. मुंबई का करीब 80% कचरा यानी रोज का 20,000 टन कचरा यहीं रिसाइकिल होता है. करीब 2.5 लाख कूड़ा बीनने वाले और कबाड़ व्यापारी मिलकर शहर को साफ रखते हैं.
प्लास्टिक को छांटना, उसे बारीक काटना, धोना और झुग्गियों की छतों पर सुखाना, यह काम यहां हर कोने में होता है. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले वकील आलम बताते हैं कि यह काम बहुत खतरनाक है. कचरे में अस्पताल की पुरानी सुइयां और नुकीला कांच होता है, जिससे चोट लगने का डर हमेशा बना रहता है. उनके लड़के नंगे पैर या मामूली चप्पलों में यह सारा काम करते हैं. यहां पुराने कपड़ों से भी थैले बनाए जाते हैं. आलम कहते हैं कि उन्हें कैमरे के सामने आने में शर्म आती है, लेकिन उनका काम किसी बड़े बिजनेस से कम नहीं है.
अब जबकि धारावी को फिर से बसाने यानी पुनर्विकास का काम शुरू हो गया है, यहां रहने वालों के मन में एक गहरा डर बैठ गया है. लोगों को लग रहा है कि इसे उनके फायदे के लिए नहीं, बल्कि एक 'रियल एस्टेट स्कीम' की तरह देखा जा रहा है. उन्हें डर है कि न्यूयॉर्क जैसा 'मैनहट्टन' बनाने के चक्कर में कहीं उन्हें 'अयोग्य' करार देकर यहां से बाहर न कर दिया जाए. अगर ऐसा हुआ तो उनका रोजगार और उनकी पहचान दोनों खत्म हो जाएंगे.

वकील आलम जैसे लोग जो बरसों से इन गटरों के बीच पले-बढ़े हैं, वे एक बहुत गहरी बात कहते हैं कि नई इमारतें तो बन सकती हैं, लेकिन धारावी की फितरत नहीं बदली जा सकती. यहां पैर जमाना बहुत मेहनत का काम है. लोग अक्सर गंदगी देखकर यहां से मुंह मोड़ लेते हैं, लेकिन वे यह नहीं देख पाते कि इसी गंदगी के बीच दुनिया का सबसे अनोखा और मजबूत बिजनेस सिस्टम चल रहा है. प्लंबर हनुमंता की बात आज भी इन गलियों में सच साबित होती है कि यह जगह भले ही गटर जैसी दिखे, पर यह वास्तव में "सोने का गटर" है.
रिपोर्ट- आनंद सिंह