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10 मिनट की डिलीवरी या साफ हवा...क्यों भारत नहीं आना चाहते हैं ये लोग

अब विदेश जाने वाले भारतीयों के लिए मुद्दा सिर्फ 'डॉलर या दिरहम' कमाना नहीं, बल्कि खुली हवा में सांस लेना और एक गरिमापूर्ण जीवन जीना बन चुका है. न्यू जर्सी, दुबई और बैंकॉक में बसे 3 NRI परिवारों की यह कहानी बयां करती है कि आखिर क्यों आज का पढ़ा-लिखा भारतीय मानसिक सुकून को चुन रहा है.

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विदेश में क्यों बसना चाहते है लोग (Photo-AI-Generated)
विदेश में क्यों बसना चाहते है लोग (Photo-AI-Generated)

कुछ दिनों पहले, बैंकॉक में रहने वाली एक भारतीय महिला का इंस्टाग्राम पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह आज के शहरी भारत में हावी 10 मिनट की डिलीवरी और अत्यधिक-सुविधा की संस्कृति के मुकाबले साफ हवा, सुरक्षित सड़कों और शांतिपूर्ण सुबह को चुनना पसंद करेंगी.

इसके बाद, इंटरनेट हमेशा की तरह दो गुटों में बंट गया. एक पक्ष का तर्क था कि सुविधा और सर्विस इकॉनमी के मामले में कोई भी देश भारत का मुकाबला नहीं कर सकता. वहीं दूसरे पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि अगर रोजमर्रा की जिंदगी ही थकाऊ लगने लगे, तो ऐसी सुविधा का कोई खास मतलब नहीं रह जाता.

भारत में रहने वाले लोग यहां की सुविधा के बारे में बढ़-चढ़कर बातें कर सकते हैं. आठ मिनट में ग्रोसरी, दस मिनट में कॉफी, और देर रात आपके दरवाजे पर आपकी इच्छा पूरी होने से पहले ही आइसक्रीम का हाजिर हो जाना और अब, तो दस मिनट में घर के काम के लिए हेल्पर भी मिलने लगे हैं.

लेकिन अगर आप इस सुविधा से परे हटकर देखें, तो एक ऐसी गंभीर और धुंधली तस्वीर सामने आती है जिसे कई लोग (स्वीकार नहीं करते. एयर क्वालिटी, जीवन स्तर, सैलरी, वर्क-लाइफ बैलेंस और शिक्षा इस समय हर एक चीज़ बहस का विषय बनी हुई है. ऐसा नहीं है कि लोग विकसित देशों जैसी विलासिता या सुविधाओं की उम्मीद करते हैं, बल्कि वे तो बुनियादी ज़रूरतें चाहते हैं, जैसे कि चैन से साफ हवा में सांस लेने की आज़ादी.

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विदेश में बस रहे हैं लोग

और अब, विदेश जाने वाले कई भारतीयों के लिए यह केवल डॉलर या दिरहम कमाने तक सीमित नहीं रह गया है. यह अब जीवन की गुणवत्ता के बारे में है.  क्योंकि आज विदेशों में रहने वाले कई भारतीयों के लिए, आकर्षण केवल विदेश में बसने तक ही सीमित नहीं रह गया है. यह अब ऐसी व्यवस्थाओं में जीने के बारे में है जो कम अराजक, अधिक मानवीय और अधिक व्यवस्थित महसूस होती हैं.

न्यू जर्सी में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर कुणाल अरोड़ा (बदला हुआ नाम) का ही उदाहरण ले लीजिए, जो छह साल पहले नोएडा से अमेरिका गए थे. उनका कहना है कि उनके लिए सबसे बड़ा 'कल्चर शॉक' अमेरिका का पैमाना या वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था, बल्कि यह एहसास था कि ज़िंदगी पूरी तरह से सिर्फ काम के इर्द-गिर्द ही घूमे, यह ज़रूरी नहीं है.

क्वालिटी लाइफ के लिए लोग हो रहे विदेश में शिफ्ट

भारत में, खासकर कॉर्पोरेट नौकरियों में, ज़रूरत से ज़्यादा काम करने को एक बड़ी उपलब्धि की तरह दिखाया जाता है. आधी रात तक ऑनलाइन रहना, छुट्टियों के दौरान मैसेज का जवाब देना, वीकेंड पर काम करना  यह सब सामान्य मान लिया जाता है, वे कहते हैं. “यहा, एक बार जब लोग लॉग ऑफ कर देते हैं, तो वे सचमुच अपनी निजी ज़िंदगी में खो जाते हैं.”

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कुणाल का कहना है कि वे अमेरिका में काफी ज़्यादा कमाते हैं, लेकिन जिस चीज़ ने उनके जीवन को सबसे ज़्यादा बदला, वह थी 'घंटे के हिसाब से समय की कीमत की अवधारणा.' भारत में लोग पागलों की तरह घंटों काम करते हैं क्योंकि वहां श्रम सस्ता है और मुकाबला बेहद कड़ा है, अमेरिका में, आपके समय की एक साफ और तय कीमत होती है.”

विदेशों में है साफ हवा

बात सिर्फ सैलरी की ही नहीं है. बेहतर गुणवत्ता वाला खाना, शुद्ध सामग्री और अच्छी शिक्षा भी इसमें एक बड़ी भूमिका निभाते हैं. कुणाल, जिनका एक बेटा है, कहते हैं, “क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि मेरा बेटा उसी सरकारी स्कूल में जाता है जहां एक सफाईकर्मी का बेटा और एक एस्ट्रोनॉट की बेटी पढ़ते हैं? यहां की सरकारी शिक्षा का स्तर ऐसा है.”

वहीं दुबई में रहने वाले दंपति अर्कोज्योति और सुनैना के लिए सबसे बड़े कारण थे- बेहतर वेतन, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और ज़ाहिर है, कोई इनकम टैक्स न होना. यह दंपति अपनी बेटी के जन्म के बाद 2019 में मुंबई से दुबई चला गया था, क्योंकि अर्कोज्योति को वहां नौकरी का ऑफर मिला था, आज, सुनैना का कहना है कि वे भारत में झेले गए तनाव के बीच अपने बच्चे की परवरिश करने की कल्पना भी नहीं कर सकतीं. “मुंबई में, हम दोनों लगातार काम के बोझ से पूरी तरह थके रहते थे. लंबी यात्राएं, अत्यधिक भीड़भाड़, प्रदूषण, अविश्वसनीय इंफ्रास्ट्रक्चर, और बहुत महंगी ज़मीन-जायदाद.  रोज़मर्रा की ज़िंदगी ही हमारी सारी ऊर्जा सोख लेती थी. हम मुश्किल से ही कुछ बचा पाते थे.”  दुबई में उन्हें वह चीज़ मिली जिसे वे मानसिक सुकून और राहत कहते हैं. 

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अर्कोज्योति कहते हैं-' यहां रोजमर्रा की ज़िंदगी में एक अलग ही गरिमा है, सड़कें व्यवस्थित हैं. सार्वजनिक स्थान साफ-सुथरे हैं, स्कूल सुसंगठित हैं और सिस्टम कुशल हैं.” वे बताते हैं कि वहां रुकने का एक बड़ा कारण शिक्षा भी बन गई.

सुनैना कहती हैं- ' भारत में मिडिल-क्लास  माता-पिता भी भारी दबाव में रहते हैं. अच्छे स्कूल महंगे हैं, मुकाबला बहुत कम उम्र से ही शुरू हो जाता है और बच्चे एक अंतहीन दौड़ में बड़े होते हैं, यहां भी पढ़ाई महंगी है, लेकिन इसके साथ सामाजिक आपाधापी और तनाव कम जुड़ा है.” यह दंपति भोजन की गुणवत्ता और उसके कड़े नियमों के बारे में भी बात करता है.  एक ऐसा विषय जिस पर अब विदेशों में रहने वाले शहरी भारतीयों के बीच अक्सर चर्चा होने लगी है.

दुबई भारतीयों की पसंदीदा जगह

भारत में खाने की चीजों में मिलावट का भी खतरा

सुनैना कहती हैं- 'भारत में आपके मन में लगातार एक संदेह बना रहता है, क्या दूध असली है? क्या सब्ज़ियों में कीटनाशक भरे हैं? क्या पनीर मिलावटी है? विदेशों में फूड सिस्टम्स और उनके नियमों पर अधिक भरोसा रहता है.” ज़ाहिर है, वे भारत को बहुत याद करते हैं. यहां के त्योहार, खाना, लोगों का बिना किसी योजना के अचानक मिल जाना और कम्युनिटी लिविंग की गर्मजोशी,
लेकिन पुरानी यादें और व्यावहारिक जीवन दो अलग-अलग चीज़ें हैं.

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इसके बाद बात करते हैं 39 वर्षीय कंटेंट स्ट्रेटेजिस्ट मेघा बनर्जी की, जो अपने तलाक के बाद अपनी बेटी के साथ कोलकाता से बैंकॉक चली गईं. वो कहती हैं- “मैं अपने आस-पास की हर चीज़ से बदलाव चाहती थी, इसलिए सच कहूं तो बैंकॉक मुझे इसके लिए सबसे सही जगह लगी.”
 
मेघा एक एफएंडबी कंपनी में काम करती हैं और उनकी बेटी 10 साल की है. वो बताती हैं- बैंकॉक में अच्छे इंटरनेशनल स्कूल हैं, इसलिए स्वाभाविक था कि मैंने इसी विकल्प को चुना. यहां तक कि मेडिकल सुविधाएं भी यहां कहीं बेहतर हैं, थाईलैंड शुरुआत में किफायती लग सकता है, लेकिन हर जगह का रहन-सहन का खर्च एक जैसा नहीं है, मेरे पास यहां अपनी कार तक नहीं है, लेकिन फिर भी मैं खुश हूं. मैं अपनी बेटी को योग क्लासेस ले जाती हूं, और खुद भी अलग-अलग एक्टिविटीज़ का आनंद लेती हूं, यहां एक भारतीय समुदाय भी है, जहां मैं काफी सारे दोस्त बनाने में कामयाब रही हूं और यहां से भारत भी महज़ कुछ ही घंटों की दूरी पर है.'

थाईलैंड भी लोगों को भा रहा है.

विडंबना यह है कि तीनों ही परिवारों का कहना है कि जब बात सेवाओं की सुविधा और उनके किफायती होने की आती है, तो भारत आज भी कई देशों को पीछे छोड़ देता है. वहां घरेलू सहायक सस्ते हैं. फूड डिलीवरी ज़्यादा तेज़ है. डॉक्टर से सलाहजल्दी और आसानी से मिल जाती है. क्विक-कॉमर्स ऐप्स आपके इंस्टाग्राम स्क्रॉल करने से पहले ही किराना का सामान आपके दरवाजे पर पहुंचा सकते हैं. लेकिन कई अप्रवासी भारतीयों का तर्क है कि ये सुविधाएं अक्सर इसलिए मौजूद हैं क्योंकि पहली बात तो यह कि भारतीय शहरी जीवन खुद में बहुत ज़्यादा तनावपूर्ण और थकाऊ हो चुका है, और दूसरी बात, उचित रोज़गार के अवसरों की कमी और ज़ाहिर है, जनसंख्या के दबाव के कारण वहां श्रम सस्ता है.

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अरोड़ा कहते हैं, “मुझे साल में एक या दो बार भारत जाने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वापस वहीं बसने को लेकर मैं अब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूं. शायद अपनी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर, जब मेरे बच्चे सेटल हो जाएगे, तब सोचूं, तब तक, मैं अमेरिका में ही रुकना पसंद करूंगा, जब तक कि हमें किसी वजह से यहां से जाने के लिए मजबूर न होना पड़े.”

उनका कहना है आखिरकार, बात इस पर भी आकर टिकती है कि क्या आपका बच्चा जहरीली हवा के बिना बाहर खेल सकता है. क्या दो घंटे का सफर आपके पूरे दिन को निगल जाता है. क्या आपकी सैलरी आपकी मेहनत के मुताबिक है. क्या आप बिना किसी अपराधबोध के काम से खुद को पूरी तरह अलग कर पाते हैं. क्या बुनियादी नागरिक व्यवस्थाएं बिना किसी रोज-रोज के 'जुगाड़' के काम करती हैं.

इन सब बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि भारत के पास देने के लिए कुछ नहीं है. कई मायनों में, भारतीय शहर अपनी महत्वाकांक्षा, ऊर्जा और अवसरों के मामले में आज भी बेजोड़ हैं. यही वजह है कि आज भी इतने सारे लोग वापस लौटते हैं, यहां जीवन में एक ऐसी जीवंतता है जिसकी बराबरी दुनिया के कई वैश्विक शहर कभी नहीं कर सकते, क्योंकि अगर आप इसे करीब से देखें, तो जितने भारतीय विदेशों में बसने के लिए देश छोड़ रहे हैं, उतने ही विदेशी लोग भारत को अपना घर बनाने का विकल्प भी चुन रहे हैं.

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नोट: वक्ताओं की गोपनीयता बनाए रखने के लिए ऊपर दिए गए सभी नाम बदल दिए गए हैं.

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