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बिजनेस

सेंट्रल एशिया को क्यों पसंद आ रहे हैं मोदी

सेंट्रल एशिया को क्यों पसंद आ रहे हैं मोदी
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उम्मीदों का उजबेकिस्तान
उजबेकिस्तान की राजधानी ताशकंद का नाम भारत में खुद उजबेकिस्तान से ज्यादा मशहूर है. यही वह शहर है जहां देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का अचानक देहांत हो गया था. खैर इस युग में किसी भी देश से उसका संबंध उनके बीच व्यापारिक सहयोग से आंका जाता है.

चीन के मुकाबले उजबेकिस्तान से हम व्यापार करने में पिछड़े ही रहे हैं पर 2002-03 के बाद से उजबेकिस्तान से द्विपक्षीय व्यापार बढ़ा है. पिछले तीन सालों में उब्जेकिस्तान को होने वाले निर्यात में 78 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. वहां टेक्सटाइल इंडस्ट्री सबसे प्रमुख है और भारत के लिए इस क्षेत्र में बहुत कुछ हाशिल करने के लिए है. वहीं यहां के यूरेनियम भंडार भारत के लिए सबसे बड़े आकर्षण का केंद्र भी हैं.

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संभावनाओं का कजाखस्तान
कजाखस्तान सेंट्रल एशिया के सेंटर में है और आर्थिक और सामरिक रूप से बेहद अहम भी है, क्योकि यह दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक राष्ट्र है. कजाखस्तान के पास कॉपर, तेल और गैस के पर्याप्त भंडार मौजूद है जो भारत के लिए वैसे ही है जैसे विमान के ईधन.

चीन यहां तक आपनी पहुंच बहुत पहले ही बना चुका है पर भारत को अभी बहुत काम कारना बाकी है. भारत की उम्मीद तब और मजबूत होती दिखती हैं जब पिछले तीन सालों में कजाखस्तान को होने वाले निर्यात में 368 फीसदी की बढ़त दिखाई देती है. भारत कजाकिस्तान को दवाइयां और चाय निर्यात करता है.

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भारत की जरुरत 'तुर्कमेनिस्तान'
तुर्कमेनिस्तान भारत के लिए बेहद अहमियत रखता है. तुर्कमेनिस्तान भारत की तेजी से बढती उर्जा जरूरतों को पूरा करने की पूरी उर्जा रखता है. तुर्कमेनिस्तान के पास गैस के अथाह भंडार मौजूद है. पर चीन के मुकाबले भारत बहुत देर से तुर्कमेनिस्तान का रुख करने जा रहा है.

तुर्कमेनिस्तान अपना 68 फीसदी निर्यात चीन को करता है. जबकि अभी भारत वहां बहुत छोटा खिलाड़ी है. पर बीते 5 सालों की कहानी भारत की ललक को दर्शाता है क्योकिं 5 सालों में तुर्कमेनिस्तान को होने वाले निर्यात में 200 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है. पर भारत की नजर तापी (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) गैस परियोजना पर है जो अभी तक कागजों से जमीन पर नहीं उतर सकी है.

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किर्गिस्तान का सोना
चीन के पडोसी किर्गिस्तान के पास सोने और युरेनियम के पर्याप्त भंडार हैं. यहां का मुख्य उद्योग टेक्सटाइल है और इसे क्षेत्र में वो भारत से व्यापार भी करता है.

भारत की पहुंच अभी इसके सोने और यूरेनियम तक नहीं हो पाई है वहीं सात समंदर पर से कनाडा यहां की खदानों से सोने निकलता है. प्रतिद्वंदी चीन यहां के बाजार पर एकछत्र राज करता है. भारत को अगर एशिया में अपनी पकड़ बनानी है तो उसे किर्गिस्तान से अपने व्यापर को बढ़ाना ही होगा.

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उभरता ताजिकिस्तान
कश्मीर के ऊपर हिमालय की पहाड़ियों के उसपार स्थित ताजिकिस्तान भारत के लिए अहमियत रखता है और यह अहमियत तब और बढ़ जाती है जब वह चीन से 477 किलोमीटर लंबा बॉर्डर शेयर करता है. यहां भी चीन की पकड़ भारत के मुकाबले बहुत ज्यादा मजबूत है.

यहां भारत को चीन से मुकाबला करने के लिए एक लंबा सफर तय करना है. ताजिकिस्तान के पास एलुमिनियम, युरेनियम, मरकरी का पर्याप्त भंडार है. भारत ने पिछले एक दशक में तजाकिस्तान को होने वाले निर्यात में 700 फीसदी की बढ़ोत्तरी की है जिसे और तेजी से बढ़ाने की जरूरत है.

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मोदी की पैनी नजर
प्रधानमंत्री मोदी सेंट्रल एशिया का महत्त्व बखूबी समझते हैं. चीन के बढ़ते प्रभाव को बैलेंस करने और भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने वो सेंट्रल एशिया का रुख कर रहे हैं. कजाखस्तान की एक यूनिवर्सिटी में बोलते हुए उन्होंने सेंट्रल एशिया को भारत से बड़ी होशियरी से कनेक्ट किया.

ईरान के छहबर पोर्ट और अफगानिस्तान की सड़कों का प्रयोग करके सेंट्रल एशिया को मुंबई और गुजरात से सीधे जोड़ा जा सकता है और मोदी इस काम को पूरा कर सेंट्रल एशिया तक भारत की पहुंच बनाने को बेताब हैं. सेंट्रल एशिया में भारत की मौजूदगी चीन के बढ़ते प्रभाव को बैलेंस करने का कम करेगा. भारत के लिए 'सेंट्रल एशिया' भविष्य का सबसे बड़ा बाजार साबित हो सकता है और शायद इसीलिए नेहरु के बाद कोई प्रधानमंत्री पूरे सेंट्रल एशिया के देशों को इतनी अहमियत दे रहा है.

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