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दोस्ती में दरार...12 साल से नीतीश की ये एक मांग, मोदी सरकार ने कभी नहीं दिया भाव!

2020 में बीजेपी के साथ मिलकर बिहार की सत्ता पर काबिज होने वाले नीतीश कुमार एक बार फिर पाला बदलने जा रहे है. उनके बीजेपी का साथ छोड़ने की अटकलों पर मुहर लग चुकी है. यानी बिहार में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन टूट चुका है.

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बिहार में नीतीश की पलटी के ये भी बड़े कारण! बिहार में नीतीश की पलटी के ये भी बड़े कारण!
स्टोरी हाइलाइट्स
  • नीतीश कुमार 2010 से उठा रहे विशेष राज्य के दर्जे की मांग
  • 2.75 लाख करोड़ का स्पेशल पैकेज पर भी नहीं हो सका फैसला

बिहार (Bihar) में एक बार फिर सियासी सुनामी देखने को मिल रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) ने पलटी मारते हुए बीजेपी (BJP) को छोड़ आरजेडी (RJD) के साथ सत्ता पर राज की तैयारी कर ली है. बिहार में आए इस राजनीतिक भूचाल के स्पष्ट कारणों पर तो अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन गौर करें तो 2010 से की जा रही विशेष राज्य (Special Status) के दर्जे की मांग और 5 साल पहले केंद्र से मांगे गए स्पेशल पैकेज (Special Package) की अनदेखी भी नीतीश के इस कदम की वजह हो सकती है. 

नीतीश ने मांगा था इतना पैकेज
5 साल पहले साल 2017 में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने बिहार की सेहत सुधारने का दावा करते हुए आरजेडी का साथ छोड़कर बीजेपी का हाथ पकड़ा था. उस समय उन्होंने केंद्र सरकार (Central Government) से राज्य के डेवलपमेंट के लिए 2.75 लाख करोड़ रुपये के स्पेशल पैकेज की मांग की थी. इससे पहले नीतीश कुमार ने अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट कर ये भी कहा था कि बिहार और बिहार की जनता के लिए अगर मुझे बार-बार याचक के तौर पर किसी के दरवाजे जाना पड़े, तो इसमें मुझे कोई संकोच नहीं है. 

स्पेशल पैकेज पर नहीं बनी बात 
नीतीश कुमार की स्पेशल पैकेज की मांग और बीजेपी के साथ के बाद ऐसा लग रहा था कि बिहार के अच्छे दिन आने वाले हैं. लेकिन 5 साल बाद भी इस पैकेज को लेकर बात आगे नहीं बढ़ सकी. ऐसे में नीतीश की मांग पर केंद्र की अनदेखी को भी दोनों के बीच पड़ी दरार के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि, बीजेपी की ओर से कहा गया कि बिहार के लिए 1.25 लाख करोड़ का बड़ा पैकेज दिया गया. जिसका वादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरा में की गई एक जनसभा के दौरान किया था.   

विशेष राज्य का दर्जा अधर में लटका
बिहार राज्य को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग अभी से नहीं बल्कि 2010 से उठ रही है और अभी तक यह मांग पूरी नहीं हो सकी. नीतीश कुमार ने 17 मार्च 2013 को एक बड़ी अधिकार रैली भी निकाली थी और दिल्ली के रामलीला मैदान में डेरा जमाकर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की थी. नीतीश के बीजेपी का दामन थामने के बाद इस मांग के पूरा होने की उम्मीदों को पंख जरूर लगे थे. लेकिन, केंद्र सरकार की ओर से इस मामले पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका. विशेष राज्य की मांग पर केंद्र की बेरुखी को भी बिहार में उठे सियासी घमासान की वजह माना जा रहा है.    

इसलिए जरूरी विशेश राज्य का दर्जा?
बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा दरअसल, इसलिए जरूरी है क्योंकि यह देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है. राज्य के 38 जिलों में से 15 जिलों को बाढ़ प्रभावित घोषित किया गया है. ज्यादातर आबादी के खेती-किसानी पर निर्भर होने के कारण बाढ़ की समस्या और भी गंभीर हो जाती है और हर साल इस विपदा से करोड़ों की संपत्ति का नुकसान होता है. इसके अलावा सिंचाई के साधनों की कमी समेत और भी कई कारण हैं, जिसके चलते इसे विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने को जरूरी बताया गया है. 

विशेष राज्य को ये फायदे
जिन प्रदेशों को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाता है, उन्हें केंद्र सरकार से 90 फीसदी अनुदान प्राप्त होता है. यानी केंद्र उस राज्य को जो फंडिंग देती है, उसमें से 90 फीसदी अनुदान के तौर पर, जबकि 10 फीसदी बिना ब्याज के मिलती है. साथ ही ऐसे राज्यों को एक्साइज, कस्टम, कॉर्पोरेट, इनकम टैक्स में भी छूट दी जाती है. जबकि सामान्य राज्यों को केंद्र से की जाने वाली फंडिंग में महज 30 फीसदी रकम अनुदान के तौर पर मिलती है. 

1969 से की गई थी शुरुआत
फिलहाल, देश में असम, नागालैंड, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त प्रदेशों में शामिल हैं. पहली बार 5वें वित्त आयोग के सुझाव पर विशेष राज्य का दर्जा देना शुरू किया गया था. इनमें वे राज्य थे शामिल थे, जो अन्य राज्यों की तुलना में भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक संसाधनों के लिहाज से पिछड़े हुए थे. सबसे पहले 1969 में असम, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर को यह दर्जा दिया गया था.  

 

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