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चीन से मिल रही चुनौती और लॉकडाउन के झटके से जूझ रहा है अलीगढ़ का ताला उद्योग

Aligarh Lock Industry: कोरोना संकट के दौरान लॉकडाउन की वजह से अलीगढ़ के लॉक इंडस्ट्री का कामकाज पूरी तरह से ठप था, लेकिन अब जब कामकाज शुरू हुआ है तो उसके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. 

अलीगढ़ के लॉक इंडस्ट्री के सामने कई चुनौतियां (प्रतीकात्मक तस्वीर) अलीगढ़ के लॉक इंडस्ट्री के सामने कई चुनौतियां (प्रतीकात्मक तस्वीर)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अलीगढ़ है ताला उत्पादन का केंद्र
  • अब उसे चीन से मिल रही चुनौती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर का दौरा किया. इस अवसर पर उन्होंने अलीगढ़ के ताला उद्योग (Aligarh Lock Industry) की चर्चा करते हुए इसकी सराहना की. अलीगढ़ की पहचान पूरे देश में 'ताला नगरी' के नाम से ही है. कोरोना संकट के दौरान लॉकडाउन की वजह से लॉक इंडस्ट्री का कामकाज पूरी तरह से ठप था, लेकिन अब जब कामकाज शुरू हुआ है तो उसके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. यह इंडस्ट्री चीन से आ रहे सस्ते माल, कच्चे माल की भारी कीमत जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रही है.

गौरतलब है कि अलीगढ़ में निर्मित ताले देश के सभी भागों में बहुत लोकप्रिय हैं और दुनिया के कई देशों में इनका निर्यात किया जाता है. ताले व हार्डवेयर निर्माण अलीगढ़ में घरेलू उद्योग के रूप में विकसित हैं. कच्चे माल व ऊर्जा की सरल उपलब्ध्ता के कारण अलीगढ़ एक व्यापार कुशल केन्द्र के रूप में उभरा. यहां पैड लॉक, डोर लॉक, मल्टी स्लॉट, साइकिल लॉक, पजल लॉक, हथकड़ी, तीन चाबी वाले ताले, दरवाजे के ताले, साइकिल के ताले, बहुउद्देशीय ताले आदि कई तरह के ताले बनाए जाते हैं. 

अंग्रेजों के जमाने से जेलों में अलीगढ़ के ग्लैमराइज्ड आयरन पैड लॉक (जीआइ) लगाए जाते हैं. इनकी खासियत ये है कि पावर कोडिंग के साथ हैंड मेड होते हैं. जड़ाई के साथ लीवर व स्प्रिंग पीतल की होती है. ये सिर्फ अलीगढ़ में ही निर्मित होते हैं. अलीगढ़ में लिंक, हरीसन, बजाज मोबाज, कोनार्क, रामसन, जैनसन, प्लाजा, सिगमा आदि कंपनियों या ब्रैंड के ताले बनाए जाते हैं. यही नहीं सेफ व तिजोरी के लिए प्रतिष्ठ‍ित कंपनी गोदरेज के लिए भी यहीं से ताले बनकर जाते हैं. 

कैसे हुई शुरुआत

इस बारे में बहुत स्पष्ट इतिहास नहीं है कि अलीगढ़ में ताला बनाने की शुरुआत कैसे हुई, लेकिन कुछ स्रोतों के अनुसार अलीगढ़ में मुगलों के जमाने से ही ताले बनते रहे हैं. पहले यहां हैंडमेड ताले बनते थे. कुछ स्रोतों के अनुसार, साल 1870 में इंग्लैंड से यहां एक अंग्रेज व्यापारी आए और उन्होंने जॉनसन ऐंड कंपनी की स्थापना थी. यह कंपनी इंग्लैंड से ताला आयात करके अलीगढ़ में बेचती थी.

साल 1890 में कंपनी ने अलीगढ़ में ही ताला उत्पादन के लिए एक लघु कारखाना शुरू किया. आज, इस शहर में हजारों निर्माता, निर्यातक व आपूर्तिकर्ता हैं जो ताले के अलावा पीतल, तांबा, लोहा व एल्यूमिनियम उद्योगों से जुड़े हैं. ताला निर्माण की प्रक्रियाएं विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में पूरी की जाती हैं. यहां Brass (पीतल), Bronze (कांसा) और एल्युमिनियम उद्योग का विकास होने की वजह से तालों के लिए कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हो जाता है.  गौरतलब है कि ज्यादातर तालों का बेस मटीरियल ब्रास यानी पीतल ही होता है. कई बड़े निर्माता स्टेनलस स्टील, निकल, लोहा जैसे कच्चे माल का भी इस्तेमाल करते हैं.  

डिस्ट्रिक गजेटियर के अनुसार अंग्रेजों के शासन में पिछली यानी बीसवीं सदी में अलीगढ़ में हर साल करीब 2.76 लाख रुपये मूल्य के 5 लाख ताले बनते थे. इससे प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने साल 1926 में यहां एक वर्कशॉप स्थापित किया जिसमें श‍िल्पकारों को आधुनिक तरीके से ताला बनाने की ट्रेनिंग दी जाने लगी. अगले दशकों में हाल यह हो गया कि अलीगढ़ जिले के हर घर में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता था जो किसी न किसी तरह से ताला इंडस्ट्री से जुड़ा हो. 

कितना है आकार 

अब अलीगढ़ में ताला उत्पादन के करीब 6400 मिडिल यूनिट और 3,000 कुटीर उद्योग हैं और इनमें करीब 2 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है. देश का करीब 80 फीसदी ताला अलीगढ़ में ही बनता है. यही नहीं इनका कई देशों में निर्यात किया जाता है. यहां की लॉक इंडस्ट्री का आकार करीब 4,000 करोड़ रुपये का है. 

सरकारों ने यहां इंडस्ट्री को सपोर्ट करने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर का अच्छा विकास किया है और बिजली आपूर्ति भी अच्छी रहती है. यहां किफायती तकनीक के इस्तेमाल और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की वजह से इस इंडस्ट्री का अच्छा विकास हुआ. 

अलीगढ़ के ताले काफी मशहूर हैं

चीन से मिली भारी चुनौती 

हालांक‍ि अब अलीगढ़ लॉक इंडस्ट्री को चीन जैसे कई देशों से आयातित तालों की वजह से भारी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. नई टेक्नोलॉजी और स्टाइल एवं डिजाइन के विदेशी ताले इस इंडस्ट्री के लिए चुनौती पेश कर रहे हैं. पहले नोटबंदी और हाल में लॉकडाउन की वजह से भी यहां की इंडस्ट्री को काफी मुश्किलें आईं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चुनौती चीन से आने वाले सस्ते तालों की ही है. इसकी वजह से यहां के इंडस्ट्री का निर्यात भी प्रभावित हो रहा है, क्योंकि दूसरे देशों में चीन के सस्ते उत्पाद यहां की इंडस्ट्री को चुनौती दे रहे हैं. 

जानकार कहते हैं कि अब हैंडमेड तालों की मांग नहीं रह गई है, मशीन मेड तालों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. चीनी उत्पादों की फिनिश‍िंग बेहतर होती है, क्वालिटी भी अच्छी होती है और वे काफी कम कीमत पर मिल जाते हैं. चीन के ताले भारत से करीब 40 फीसदी सस्ते होते हैं. चीन में अलीगढ़ से ज्यादा सुविधाएं हासिल हैं और वहां की इंडस्ट्री को सरकारी प्रोत्साहन भी अच्छा मिलता है. यही नहीं, ताइवान और कोरिया के ताले भी बाजार में आ रहे हैं.

नई टेक्नोलॉजी में पीछे

चीन से आ रहे ताले असल में नई टेक्नोलॉजी के हैं. केबल, ट्यूबलर और वायर लॉक का प्रचलन शुरू हुआ जिसकी वजह से अलीगढ़ के तालों की मांग कम होने लगी. साल 2005 के बाद से भारत में बड़े पैमाने पर चीन से ऐसे ताले आने लगे जिसकी वजह से अलीगढ़ के ताला उद्योग पर भारी मार पड़ी है. 

अलीगढ़ की एक कंपनी कोडिया लॉक के डायरेक्टर प्रदीप गर्ग कहते हैं, 'अलीगढ़ की ताला इंडस्ट्री कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है. चीन से आने वाले आधुनिक तकनीक के ट्यूबलर लॉक, स्मार्ट लॉक हमारे लिए प्रमुख चुनौती हैं. हमारे पास ऐसी लेटेस्ट मशीनें और टेक्नोलॉजी नहीं हैं. इस इंडस्ट्री का फ्यूचर नई टेक्नोलॉजी वाले तालों का ही है. लेकिन आधुनिक मशीनें काफी महंगी होने के कारण बहुत से उत्पादक चीन से आयात कर ताले बेचने लगे हैं. कई उत्पादकों ने अपने 40 फीसदी पोर्टफोलियो में चीन से आयातित तालों को शामिल कर लिया है.' 

प्रदीप गर्ग कहते हैं, 'सरकार ने कुछ आधुनिक मशीनें मंगाकर मदद जरूर शुरू की है, लेकिन अभी ये पर्याप्त नहीं है. इन मशीनों को चलाने और नई टेक्नोलॉजी की समझ के लिए बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को स्किल ट्रेनिंग देने की जरूरत है. इसके अलावा यह इंडस्ट्री कच्चे माल की भारी कीमतों से जूझ रही है. वायदा कारोबार की वजह से भारत में मेटल की कीमतें काफी अनिश्चित होती हैं,जबकि चीन सरकार ने ताला इंडस्ट्री के लिए स्टेबल रेट सिस्टम लागू किया है.' 

राहत की दरकार 

कोरोना महामारी की वजह से पिछले साल लगा लॉकडाउन अलीगढ़ ताला इंडस्ट्री के लिए दोहरी मार साबित हुआ है. महामारी के दौरान लॉक इंडस्ट्री का काम पूरी तरह से ठप हो गया था. अब जब इंडस्ट्री ने कामकाज शुरू किया है, तो उसे फिर से चीन से मिल रही भारी चुनौती और धातुओं जैसे कच्चे माल की महंगाई का सामना करना है. इंडस्ट्री को अब भी सरकार से किसी राहत पैकेज का इंतजार है. अलीगढ़ इंडस्ट्रियल एस्टेट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्रीआदित्यनाथ को एक मेमोरंडम देकर हालात से आगाह भी किया है. कारोबारियों का कहना है कि स्टील जैसी कई धातुओं की कीमतों के निर्धारण में सरकार की बड़ी भूमिका होती है, इसलिए सरकार को तत्काल इस मामले में कोई कदम उठाना चाहिए. 

 

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