गुरुवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 92 के पार पहुंच गया, जो इसका ऑल टाइम लो लेवल है. भारतीय मुद्रा इस साल 2.5 फीसदी टूट चुकी है. यह गिरावट अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा रेपो रेट में कटौती पर ब्रेक के बाद आया है.
इस बीच, गुरुवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2026 पेश किया गया. इस सर्वे में भारतीय रुपये में कमजोरी का जिक्र किया गया है और रुपये में गिरावट की वजह, नुकसान और इसे रोकने के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं.
रुपये में क्यों आ रही गिरावट?
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय मुद्रा में जारी गिरावट भारत की आर्थिक बुनियाद को नहीं दिखाती है. रुपया अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर रहा है. वित्त मंत्रालय की टीम द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट का मानना है कि भारतीय मुद्रा की कमजोरी अमेरिकी टैरिफ में वृद्धि के भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को आंशिक रूप से कम करती है. दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरिकी टैरिफ बहुत ज्यादा रुपये के गिरावट में योगदान नहीं दे रहा है.
इकोनॉमी सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि निश्चित तौर से इन परिस्थितियों में रुपये में गिरावट होना हानिकारक नहीं है, क्योंकि यह भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ में बढ़ोतरी के प्रभाव को कुछ हद तक कम करता है और कच्चे तेल के आयात की ऊंची कीमतों से महंगाई बढ़ने का कोई खतरा नहीं है. हालांकि इससे निवेशकों को संशय जरूर होता है. भारत में निवेश को लेकर निवेशकों की अनिच्छा की जांच करना जरूरी है. सर्वे में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था में कैपिटल इनफ्लो और आउटफ्लो में रुकावट के कारण रुपये में कमजोरी हुई है.
कैसे रुक सकती है रुपये में गिरावट
इस सर्वे में भारतीय रुपये की कमजोरी का मुकाबला करने के लिए उपाय भी सुझाए गए हैं. इसमें आगे कहा गया है कि भारत को अपने बढ़ते आयात बिल को पूरा करने के लिए पर्याप्त निवेशक रुचि और विदेशी मुद्रा में निर्यात आय उत्पन्न करने की आवश्यकता है.
1 साल में 6 फीसदी टूटा रुपया
पिछले एक साल में रुपये में 6% से अधिक की गिरावट आई है, जिससे आयात महंगा और निर्यात सस्ता हो गया है और इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कंम्पटीशन बढ चुका है. इस सर्वे में स्वदेशी प्रयासों के साथ निर्यात पर भी फोकस रहने की बात कही गई है.