एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करने वाली हैं, इस बजट से हर सेक्टर को उम्मीद है. सरकार भी लगातार 'मेक इन इंडिया' के तहत मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दे रही है. इस बीच पिछले कई वर्षों से एक सेक्टर चुनौतियों से जूझ रहा है. यहां हम बात मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री की कर रहे हैं.
दरअसल, भारतीय मेडिकल डिवाइस उद्योग फिलहाल एक अहम मोड़ पर है, ऑल इंडिया मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (Aimed) के फोरम कॉर्डिनेटर राजीव नाथ का कहना है कि 2025 भारत के मेडिकल डिवाइस सेक्टर के लिए एक अच्छा और स्थिर साल रहा. मेडटेक इंडस्ट्री को मजबूत करने के लिए लगातार सरकार से बातचीत हुई, सरकार ने भी मेडिकल डिवाइस को हेल्थकेयर के साथ-साथ आर्थिक ताकत का अहम हिस्सा माना है.
राजीव नाथ की मानें तो AiMeD ने हमेशा की तरह फेयर कंपटीशन, ईमानदार खरीदारी और पूरी सप्लाई चेन में लंबे समय तक चलने वाले विकास वाली नीतियों की पैरवी की. उन्होंने कहा कि साल 2026 असल में नीतियों को जमीन पर उतारने और इंडस्ट्री-सरकार के बीच तालमेल को और बनाने का वक्त है.
इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की मांग
उनकी सलाह है कि बजट में मेडिकल डिवाइस आयात पर टैरिफ को मौजूदा 7.5% से बढ़ाकर 10-15% करना चाहिए, ताकि देश में मैन्युफैक्चरिंग को असली बूस्ट मिले. सरकारी खरीद में क्वालिटी को सबसे ऊपर रखा जाए और ICMED सर्टिफिकेशन को विदेशी अप्रूवल से ज्यादा महत्व दिया जाए. उन्होंने कहा कि भारत अपनी क्षमता, प्रोडक्शन ताकत और भरोसे को असल सफलता में बदल सकता है, और मेडटेक हब बन सकता है. राजीव नाथ (Rajiv Nath) हिंदुस्तान सिरिंज एंड मेडिकल डिवाइसेज लिमिटेड (HMD) के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं.
सरकार से राजीव नाथ ने पहली मांग है कि मेडिकल डिवाइस से जुड़े घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और उसे 'प्रोटेक्ट' करने के लिए कम से कम 10-15% की बेसिक कस्टम ड्यूटी अनिवार्य रूप से लगाई जानी चाहिए. वर्तमान में यह सेक्टर लगभग 70% आयात पर निर्भर है और सालाना आयात में 10% से अधिक की बढ़ोतरी हो रही है. अगर स्थानीय उद्योगों को शुल्क के माध्यम से सुरक्षा नहीं मिली, तो यह निर्भरता और बढ़ती जाएगी.
उनकी दूसरी मांग है कि उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाने के लिए कस्टम ड्यूटी कम करना समाधान नहीं है. ड्यूटी कम करने का लाभ सीधे जनता तक नहीं पहुंचता है. इसलिए सरकार को MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) की मॉनिटरिंग करनी चाहिए, जहां भी कीमतें तर्कहीन रूप से अधिक हों, वहां कटौती की जानी चाहिए ताकि सीधा लाभ मरीजों को मिले.
FTA और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां
यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि यूरोप में भारतीय मेडिकल डिवाइस के एक्सपोर्ट पर पहले से ही ड्यूटी शून्य है. असली समस्या 'नॉन-ड्यूटी' बाधाएं और भारी रेगुलेटरी खर्चे हैं.
इसलिए उद्योग चाहता है कि भारत का ICMED सर्टिफिकेट यूरोप में मान्य हो (Mutual Recognition Agreement), जिससे CE सर्टिफिकेशन का खर्च कम हो सके. इसके अलावा राजीव नाथ ने यह भी चिंता जताई कि FTA की आड़ में चीन जैसे देश यूरोप के रास्ते अपने प्रोडक्ट्स भारत में न खपाने लगें.
GST और टैक्स सुधार
तीसरी मांग के तौर पर वर्किंग कैपिटल की समस्या को सुलझाने के लिए GST रिफंड प्रक्रिया को तेज की जाए. उन्होंने कहा कि सरकार ने एक हफ्ते का वादा किया था, लेकिन वर्तमान में इसमें 3-4 महीने लग रहे हैं. साथ ही, सिंगापुर और कनाडा जैसे देशों की तर्ज पर भारत में भी कैपिटल गुड्स और सेवाओं पर दिए गए GST का रिफंड मिलना चाहिए ताकि निवेश को प्रोत्साहन मिले.
वहीं SS इनोवेशन्स इंटरनेशनल (हेल्थकेयर सेक्टर) के संस्थापक और चेयरमैन डॉ. सुधीर श्रीवास्तव ने कहा कि यूनियन बजट से मेडिकल टेक्नोलॉजी और सर्जिकल रोबोटिक्स सेक्टर भी उम्मीद लगाए बैठा है. उन्होंने कहा कि भारत के पास मजबूत डॉक्टरों की विशेषज्ञता, बेहतर इंजीनियरिंग क्षमता और कम लागत में समाधान देने की ताकत है, जिससे देश को वैश्विक मेडटेक हब बनाया जा सकता है.
इसके लिए स्वदेशी रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा देना, देश में ही मेडिकल उपकरणों के पार्ट्स निर्माण और AI आधारित हेल्थकेयर तकनीक को अपनाना जरूरी है. घरेलू मेडिकल उपकरणों पर जीएसटी में राहत, आरएंडडी पर टैक्स छूट, सस्ती पूंजी की उपलब्धता और आसान नियम भारत को मेडिकल टेक्नोलॉजी में वैश्विक नेतृत्व दिला सकते हैं.