बिहार की राजनीति में गुरुवार का दिन एक ऐतिहासिक और भावुक मोड़ लेकर आया, जब लगभग दो दशकों तक सत्ता के शीर्ष पर रहे 'सुशासन बाबू' यानी नीतीश कुमार ने अचानक राज्यसभा जाने का फैसला कर सबको चौंका दिया. नीतीश के इस ऐलान के बाद जनता दल (यूनाइटेड) के दफ्तर में तोड़फोड़ हुई, मुख्यमंत्री आवास के बाहर समर्थकों के जमावड़े से पार्टी के विधायक और मंत्री भी भीतर नहीं जा सके और उल्टे पांव भागना पड़ा.
मौके पर खुद डीजीपी को उतरना पड़ा और मुख्यमंत्री आवास की सुरक्षा बढ़ाई गई. लेकिन असली राजनीतिक इमोशनल अत्याचार वाली कहानी शुक्रवार शाम देखने को मिली, जब मुख्यमंत्री आवास पर जेडीयू विधानमंडल दल की बैठक हुई. विधानसभा और विधान परिषद सदस्यों की यह बैठक केवल एक राजनीतिक चर्चा का मंच भर नहीं थी, बल्कि एक ऐसे भावनात्मक विस्फोट की गवाह बनी जिसने नीतीश कुमार जैसे मंझे हुए राजनेता को भी निःशब्द कर दिया.
बैठक जैसे ही शुरू हुई और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने औपचारिक रूप से अपने राज्यसभा जाने और राज्य की कमान सौंपने की बात छेड़ी, कमरे में सन्नाटा पसर गया. जेडीयू विधायक विनय चौधरी ने मीडिया से बातचीत में जो बताया, वह बहुत भावुक पल का आंखों देखा हाल है. विनय चौधरी ने बताया कि बैठक में वरिष्ठ नेता विजेंद्र यादव ने विधायकों की तरफ से कहा कि सच यदि कड़वा होता है, तो वो बोलेंगे.
उनके मुताबिक बैठक में विजेंद्र यादव ने कहा कि हम लोग आपके (नीतीश कुमार के) फैसले से सहमत नहीं हैं. इतना सुनते ही कमरे में मौजूद कई विधायकों की आंखों से आंसू छलक पड़े. विनय चौधरी खुद को संभाल नहीं पाए और रोने लगे. उन्होंने भावुक होकर कहा कि साहब, विधानसभा में हम लोग आपके स्वागत के लिए गुलदस्ता लेकर खड़े रहते थे, अब वह गुलदस्ता किसे देंगे? आपने तो सारा खेल ही खत्म कर दिया. विधायकों का यह दर्द केवल एक नेता के जाने का नहीं, उस भरोसे के टूटने का था जो पिछले 20 साल से बिहार की सियासत की धुरी बना हुआ था.
नीतीश-निशांत को साथ देखना चाहते हैं विधायक
विनय चौधरी ने बताया कि विधायकों ने अपनी ओर से कहा कि हम लोग आपके लिए गए निर्णय के पीछे मजबूती से खड़े रहेंगे, लेकिन इसके बदले में हमें निशांत को सौंप दीजिए. विधायकों ने एक स्वर में मांग की है कि यदि नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं, तो वे अपनी विरासत के रूप में निशांत को उन्हें सौंप दें. हालांकि, कई विधायकों का तर्क था कि बिना नीतीश, निशांत मंजूर नहीं हैं. उनका कहना था कि वे निशांत को राजनीति में तभी स्वीकार करेंगे, जब नीतीश कुमार बिहार में रहकर उनका मार्गदर्शन करेंगे.
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उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार इस प्रस्ताव पर मौन रहे, लेकिन कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने घोषणा कर दी कि निशांत कुमार आठ मार्च को पार्टी की सदस्यता लेंगे. विधायकों ने इस फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन उनके मन में यह कसक बाकी रही कि वे नीतीश और निशांत को 'साथ-साथ' देखना चाहते थे, न कि एक के बदले दूसरे को. ध्यान रहे कि नीतीश कुमार के अचानक हुए हृदय परिवर्तन को जेडीयू के अंदर का एक गुट सहज नहीं मान रहा है.
दबाव के आगे झुके नीतीश कुमार
जेडीयू के भीतर भी चर्चा है कि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर गृह मंत्री अमित शाह के दखल के बाद 'सत्ता हस्तांतरण' का यह फॉर्मूला तय हुआ है. चुनावी नतीजों के बाद बीजेपी अब बिहार में अपना मुख्यमंत्री चाहती थी. अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार इस दबाव के आगे झुके जरूर हैं, लेकिन वे मन से इसके लिए तैयार नहीं थे. यही कारण रहा कि जेडीयू के जमीनी कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए, ललन सिंह और संजय झा जैसे नेताओं के खिलाफ 'सौदेबाजी' के आरोप लगाए. उन्हें विभीषण तक करार दे दिया गया.
स्वर्ण युग का अंत बता रहे विश्वलेषक
जेडीयू कार्यकर्ताओं का मानना है कि बीजेपी ने नीतीश कुमार को हाईजैक कर लिया है. जेडीयू दफ्तर के बाहर प्रधानमंत्री मोदी के पोस्टर पर कालिख पोतना इस आक्रोश का प्रत्यक्ष प्रमाण है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना बिहार के लिए एक स्वर्ण युग के अंत जैसा है. नीतीश ने बीजेपी के साथ रहते हुए भी बिहार को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बचाकर रखा और 'क्राइम, करप्शन, कम्युनलिज्म' से समझौता नहीं किया. अब सवाल यह है कि बीजेपी का नया मुख्यमंत्री क्या नीतीश के उस 'सेकुलर-समाजवादी' ढांचे को बरकरार रख पाएगा?
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नीतीश कुमार ने विधायकों को भरोसा दिलाया है, "मैं हूं ना, चिंता मत करिए." लेकिन विधायकों के आंसू और कार्यकर्ताओं का गुस्सा यह बता रहा है कि बिहार की जनता इस 'जबरन विदाई' को स्वीकार करने के मूड में नहीं है. क्या निशांत कुमार अपने पिता की विरासत को उसी मजबूती से संभाल पाएंगे? और क्या बीजेपी के शासन में बिहार वह 'सुशासन' देख पाएगा जिसका चेहरा नीतीश कुमार थे?
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फिलहाल, पटना की गलियों में सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा किसी बड़े राजनीतिक तूफान की आहट जैसा महसूस हो रहा है. नीतीश कुमार ने राज्यसभा का नामांकन कर अपनी नई शुरुआत की ओर पहला कदम बढ़ा दिया है, लेकिन बिहार की सियासत की गुत्थियां अब और उलझ गई हैं.