कंकर-कंकर शंकर... ये कहावत इतनी प्रसिद्ध है कि भारत की माटी में एक-एक कदम चलते जाइए और महादेव के शिव स्वरूप से मिलते जाइए. अगर आप इस दुनिया को शिव रूप में देखना चाहेंगे तो हर तरफ आपको उनका ही रूप दिखाई देगा. आप तीन पत्तियों को एक साथ देखें तो वह त्रिशूल जैसी दिखेंगी. अगर आप किसी उभार वाली जगह को देखें तो वह शिवलिंग जैसा लगेगा. पर्वतों से बहती और बलखाती, टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलती नदियां ऐसी लगती हैं कि वह नागों की तरह शिव से लिपट गई हैं. आप फल, फूल, सब्जी किसी को भी ध्यान से देखें तो वह शिव या शिवलिंग जैसे ही नजर आएंगे.
ऐसा ही एक मंदिर है, जहां शिव एक लौकी के स्वरूप में हैं. ये है विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ धाम में मौजूद लोकनाथ मंदिर. यहां महादेव का शिवलिंग एक लौकी से बना हुआ है और मान्यता है कि इसे त्रेतायुग में खुद भगवान श्रीराम ने स्थापित किया था.
श्रीराम ने की थी शिवलिंग की स्थापना!
लोकनाथ मंदिर पुरी में जगन्नाथ मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. कहते हैं कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी. सदियों से यह मंदिर शैव उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है. श्रद्धालुओं में ऐसा विश्वास है कि लोकनाथ महादेव के दर्शन किए बिना जगन्नाथ पुरी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. महाशिवरात्रि यहां का सबसे बड़ा पर्व है, जब लाखों श्रद्धालु रात भर जागकर भजन, कीर्तन और पूजा-अर्चना करते हैं तो पूरा क्षेत्र शिवमय हो उठता है.

साल भर जल में डूबा रहता है शिवलिंग
इस मंदिर का सबसे अनोखा और आकर्षक स्वरूप यहां स्थित शिवलिंग है, जो हमेशा ही जल में डूबा रहता है. एक प्राकृतिक भूमिगत जलधारा शिवलिंग को लगातार ढके रहती है, जिसे पवित्रता और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. वर्ष में केवल एक बार, महाशिवरात्रि से कुछ दिन पहले पड़ने वाली पंकोद्धार एकादशी के अवसर पर यह जल हटाया जाता है और भक्तों को शिवलिंग के दर्शन होते हैं. इस दुर्लभ दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से पुरी पहुंचते हैं.
पुरी का लोकनाथ मंदिर केवल एक शिवालय नहीं, बल्कि आस्था और आध्यात्मिक रहस्य का संगम है. जलमग्न शिवलिंग का रहस्य, प्राचीन परंपराएं और भक्तों की अटूट श्रद्धा इसे ओडिशा की आध्यात्मिक विरासत का एक अनुपम और पवित्र रत्न बनाती हैं.
महाशिवरात्रि पर हरिहर मिलन
महाशिवरात्रि के मौके पर यहां महादेव की डोल उत्सव यात्रा निकलती है. इस यात्रा को उतने ही धूम-धाम से आयोजित किया जाता है, जितने उत्साह से पुरी की रथयात्रा. इस डोल उत्सव यात्रा के जरिए महादेव के उत्सव विग्रह को जगन्नाथ धाम ले जाया जाता है. जहां महादेव अपने ईष्ट, अपने सखा, अपने साक्षी और साथ जगन्नाथ से मिलते हैं. जगन्नाथ धाम में महाशिवरात्रि का मौका हरिहर मिलन उत्सव के तौर पर मनाया जाता है. जहां हरि यानी विष्णु (श्रीकृष्ण जगन्नाथ) का मिलन हर यानी शिव यानी लोकनाथ से होता है.
भगवान जगन्नाथ का लोकनाथ से मिलना और इस मौके को अपनी आंखों से देखना जीवन भर के लिए यादगार बन जाता है. शिव यहां लोकनाथ कैसे बन गए इसकी भी एक मान्यता और कथा है.
एक लौकी में कैसे प्रकट हुए महादेव?
कहते हैं कि जब श्रीराम हर दिशा की यात्रा करते हुए ओडिशा पहुंचे थे तब यहां के जंगलों में साबर जनजाति निवास करती थी. इसी साबर जनजाति के एक भक्त ने श्रीराम को अपनी गृहवाटिका में उगाई हुई लौकी उन्हें भेंट की थी. भाव के भूखे भगवान ने उसे बहुत प्यार से स्वीकार किया और सिर माथे से लगाकर कहा, तुमने तो मुझे लौकी के रूप में मेरे महादेव से मुझे मिला दिया.
उधर कैलास पर बैठे भगवान शिव ने जब यह सुना तो इसे प्रभु का आदेश मानकर उसी लौकी में प्रकट हुए और श्रीराम को दर्शन दिए. इस तरह वह लौकी, लौकी से अलौकिक हो गई. दिव्य हो गई. गोल लौकी का पिंड शिवलिंग जैसा दिखता था, इसलिए श्रीराम ने उसकी शिवलिंग के रूप में स्थापना की.
स्कंद पुराण में वर्णन आता है कि पुरी को सृष्टि की शुरुआत में ही पुरुषोत्तम धाम कहा गया था, जहां भविष्य में (द्वापर युग के अंत में) जगन्नाथ धाम का निर्माण होना था. इसलिए जब महादेव ने कहा कि मैं यहीं आपके पास रहना चाहता हूं तब श्रीराम ने कहा कि द्वापर के अंत में जब मैं यहां जगत के नाथ के रूप में स्थापित हो जाऊंगा तब आप इस लौकी से लोकनाथ बन जाएंगे. इस तरह पुरी में दो धाम हैं जगन्नाथ और लोकनाथ. महाशिवरात्रि पर दोनों का मिलन अद्भुत होता है और श्रद्धालुओं को जगत के नाथ के साथ लोक के नाथ का आशीर्वाद भी मिलता है.