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प्यार, उलझन और नोकझोंक... हंसी-हंसी में रिश्तों की कहानी कहता नाटक ‘जीने भी दो यारों’

‘जीने भी दो यारों’ नाटक वैवाहिक जीवन की बदलती मनोस्थिति और पति-पत्नी के बीच के हास्यपूर्ण टकराव को दर्शाता है. यह नाटक डिजिटल युग में रिश्तों की जटिलताओं को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत करता है, जिसमें जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं के बीच रिश्तों का संतुलन बदलता है.

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नाटक जीने भी दो यारों का इंडिया हैबिटेट सेंटर में मंचन हुआ
नाटक जीने भी दो यारों का इंडिया हैबिटेट सेंटर में मंचन हुआ

वैवाहिक रिश्तों की बदलती मनोस्थिति और पति-पत्नी के बीच के हास्यपूर्ण टकराव को मंच पर जीवंत ढंग से प्रस्तुत करने वाला हिंदी नाटक ‘जीने भी दो यारों’ आज के दौर में भी मौजूं इसलिए है, क्योंकि जब-तब पति-पत्नी के बीच का रिश्ता यूं ही उलझने सा लगता है. डिजिटल होती दुनिया में ये समस्या और भी बढ़ी है. अलग-अलग लोगों के जीवन में समस्याएं अलग हो सकती हैं, लेकिन उसकी जड़ों में जाएं तो दिक्कत एक ही सी है. 

इसी उलझन को सब्जेक्ट बनाकर सामने रखता है यात्री थिएटर ग्रुप का ये नाटक. जिसे दर्शकों ने अपना काफी प्यार दिया और इंडिया हैबिटेट सेंटर  के Stein Auditorium में हंसते-खिलखिलाते 110 मिनट कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला. 

क्या है कहानी?

नाटक की कहानी उन रोमांटिक कल्पनाओं से शुरू होती है, जो लगभग हर प्रेमी जोड़ा अपने भविष्य के बारे में करता है. प्रेम के दिनों में जिंदगी बेहद खूबसूरत और आसान नजर आती है, हाथों में हाथ डालकर हमेशा साथ चलने के सपने, हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश को पूरा करने का वादा और एक-दूसरे को खुश रखने की कोशिश. होने वाला पति अपनी प्रेमिका को प्रभावित करने के लिए हर संभव कोशिश करता है. कभी चॉकलेट और फूल लाकर, कभी फिल्म और डिनर डेट पर ले जाकर, तो कभी महंगी शॉपिंग के जरिए वह अपने प्यार का इजहार करता है.

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Jeene bhi do yaron play

लेकिन कहानी का असली मोड़ शादी के बाद सामने आता है. नाटक यह सवाल उठाता है कि क्या शादी के बाद वही उत्साह और वही रोमांस बना रहता है? धीरे-धीरे रिश्ते की गर्माहट में बदलाव आने लगता है. जो प्रेमिका कभी बेहद प्यारी लगती थी, वही पत्नी बनकर कभी-कभी शिकायत करने वाली या झुंझलाने वाली नजर आने लगती है. वहीं पति भी, जो पहले हर छोटी इच्छा पूरी करने को तैयार रहता था, शादी के बाद धीरे-धीरे लापरवाह और उदासीन होने लगता है.

‘जीने भी दो यारो’ इसी बदलते समीकरण को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत करता है. नाटक दिखाता है कि किस तरह विवाह के बाद जिम्मेदारियों, अपेक्षाओं और रोजमर्रा की उलझनों के बीच पति-पत्नी के रिश्ते का संतुलन बदलने लगता है. हालांकि इस पूरे विषय को बेहद हल्के और मनोरंजक अंदाज में पेश किया गया है, जिससे दर्शक हंसते भी हैं और रिश्तों की वास्तविकताओं पर सोचने के लिए भी प्रेरित होते हैं.

नाटक की खासियत इसकी सशक्त प्रस्तुति और कलाकारों का प्रभावशाली अभिनय है. कलाकारों की संवाद अदायगी, मंच पर उनकी सहजता और हास्यपूर्ण टाइमिंग दर्शकों को पूरे समय बांधे रखती है. नाटक में 'ओम कटारे, प्रशांत उपाध्याय, सायली गायकवाड़, कनुप्रिया शर्मा और हितेश भाटिया' जैसे कलाकारों ने अपने किरदारों को जीवंत बनाया. उनके अभिनय ने नाटक की कहानी को और भी प्रभावी बना दिया.

कार्यक्रम की आयोजक और 'अंजना वेलफेयर सोसायटी' की फाउंडर माया कुलश्रेष्ठ कहती हैं कि, ‘जीने भी दो यारो’ केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि यह आज के दौर की वैवाहिक जीवन में पनपने वाली मुश्किलोंपर हल्के-फुल्के अंदाज में की गई एक सार्थक टिप्पणी भी है, जो दर्शकों को रिश्तों में समझ, संवाद और संवेदनशीलता की अहमियत का अहसास कराती है.

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