ट्रेड डील से लेकर एनर्जी सिक्योरिटी तक... PM मोदी-ट्रंप की मीटिंग में क्या होगा एजेंडा?

पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की बैठक के एजेंडे में वेस्ट एशिया का संकट प्रमुख मुद्दा रहेगा. लेकिन भारत-अमेरिका की आगामी ट्रेड डील पर भी बातचीत होगी. दोनों नेताओं के बीच व्यापार समझौता चर्चा का एक महत्वपूर्ण विषय होगा.

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पीएम मोदी और ट्रंप की आज द्विपक्षीय मीटिंग होगी. (File Photo: PTI) पीएम मोदी और ट्रंप की आज द्विपक्षीय मीटिंग होगी. (File Photo: PTI)

प्रणय उपाध्याय

  • नई दिल्ली,
  • 17 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:42 AM IST

फ्रांस के एवियन शहर में G-7 समिट का आयोजन हो रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दुनियाभर के कई बड़े नेता इस समिट में हिस्सा ले रहे हैं. इस बीच बुधवार को पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय वार्ता होने जा रही है. ऐसे में उम्मीद है कि होर्मुज की मौजूदा स्थिति से लेकर अमेरिका-ईरान डील और ट्रेड पर दोनों नेताओं के बीच बातचीत होगी.

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पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की बैठक के एजेंडे में वेस्ट एशिया का संकट प्रमुख मुद्दा रहेगा. लेकिन भारत-अमेरिका की आगामी ट्रेड डील पर भी बातचीत होगी. दोनों नेताओं के बीच व्यापार समझौता चर्चा का एक महत्वपूर्ण विषय होगा. समझौते से जुड़े अधिकांश तकनीकी और प्रक्रियागत काम पहले ही पूरे किए जा चुके हैं. भारत 12,000 से अधिक टैरिफ लाइनों पर व्यापार करता है और प्रस्तावित व्यापार समझौता लगभग 11,000 टैरिफ लाइनों को कवर करता है. बाजार पहुंच (Market Access) से जुड़े अधिकांश तकनीकी पहलुओं पर सहमति बन चुकी है.

वहीं, ऊर्जा सुरक्षा भी बैठक का एक अहम मुद्दा रहेगी. पिछले एक साल में अमेरिका से भारत के ऊर्जा आयात में लगभग 60 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. रूस से तेल आयात को लेकर जो मौजूदा छूट है, वह बुधवार को समाप्त हो रही है. ऐसे में यह साफ नहीं है कि आगे क्या फैसला लिया जाएगा. वैसे, प्रतिबंध पूरे रूस पर नहीं बल्कि कुछ विशेष कंपनियों पर लगाए गए हैं. वहीं कई ऐसी कंपनियां भी हैं जो प्रतिबंधों के दायरे में नहीं हैं. भारत इनमें से कुछ कंपनियों से तेल खरीद रहा है.

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वैश्विक बाजार में फिलहाल तेल की पर्याप्त उपलब्धता बनी हुई है. होर्मुज भारत के लिए चिंता का एक विषय है. इस क्षेत्र में भारत के रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं. समुद्री सुरक्षा मिशन को लेकर कई प्रस्तावों पर चर्चा चल रही है. हालांकि बहुत कुछ ईरान-अमेरिका समझौते की दिशा पर निर्भर करेगा.

फ्रांस और ब्रिटेन ने समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने के लिए माइन-स्वीपिंग मिशन और नौसैनिक एस्कॉर्ट मिशन का सुझाव दिया है. भारत ने भी इस संबंध में कुछ बैठकों में भाग लिया है. भारत का मानना है कि ऐसे मिशन आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन सैन्य संघर्ष के दौरान इनमें भाग लेना उचित नहीं होगा. इस तरह के मिशन तभी संभव हैं जब कोई स्थायी और भरोसेमंद शांति समझौता हो जाए.

H-1B वीजा मुद्दे को लेक भी भारत की अपनी चिंताएं हैं, लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि वीजा नीति किसी भी देश का संप्रभु अधिकार है. भारत किसी अन्य देश पर कोई विशेष नीति अपनाने के लिए दबाव नहीं डाल सकता. यह भी स्वीकार करना होगा कि अतीत में H-1B कार्यक्रम का कुछ मामलों में दुरुपयोग हुआ है. हालिया बदलावों से भारतीय पेशेवरों पर सबसे अधिक असर पड़ा है और उनमें असंतोष है, क्योंकि इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी भारतीय ही रहे हैं. भारत इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ संवाद जारी रख सकता है लेकिन किसी सीमा से आगे जाकर दबाव नहीं बना सकता क्योंकि यह अमेरिका की आंतरिक नीति का विषय है.

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