मिडिल ईस्ट में हवा, पानी और ज़मीन पर जंग... पर्यावरण पर बड़े ख़तरे का साया

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष का असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है. मिसाइल हमलों, तेल रिफाइनरी और टैंकरों पर हमलों से पूरे इकोसिस्टम के चरमराने का ख़तरा बढ़ गया है.

Advertisement
इज़रायल-यूएस अटैक के बाद तेहरान में स्थित आज़ादी टॉवर के पीछे से ज़बरदस्त धुआं उठा. (Photo: AP) इज़रायल-यूएस अटैक के बाद तेहरान में स्थित आज़ादी टॉवर के पीछे से ज़बरदस्त धुआं उठा. (Photo: AP)

मोहम्मद साक़िब मज़ीद

  • नई दिल्ली,
  • 06 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:10 PM IST

पिछले कुछ दिनों से पूरा मिडिल ईस्ट जंग की ज़द में है. ख़ित्ते में बढ़ते अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष का असर वर्ल्ड पॉलिटिक्स और नागरिकों की सुरक्षा पर तो पड़ ही रहा है लेकिन इसका दायरा यहीं तक सीमित नहीं है. पर्यावरण पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है. इस युद्ध में कई सैन्य ठिकानों, तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा ढांचों को निशाना बनाया गया है, जिससे हवा, पानी और समुद्री पारिस्थितिकी को नुक़सान पहुंचने का ख़तरा बढ़ गया है. तेल टैंकरों, रिफाइनरियों या स्टोरेज साइट्स पर हमले होने से बड़े पैमाने पर तेल रिसाव, आग और प्रदूषण फैल सकता है, जिससे समुद्री जीवों और इकोसिस्टम को नुक़सान होता है.

Advertisement

मिसाइल और बम धमाकों से भारी धातुएं, ज़हरीले रसायन और विस्फोटक अवशेष वातावरण में फैलते हैं, जो मानव स्वास्थ्य और मिट्टी-पानी की क्वालिटी पर लंबे वक़्त तक असर डाल सकते हैं. इसके अलावा, अगर परमाणु सामग्री वाले ठिकानों को नुक़सान पहुंचता है, तो रेडियोधर्मी प्रदूषण का भी ख़तरा हो सकता है.

जंग का असर क्लाइमेट पर भी पड़ता है, क्योंकि सैन्य गतिविधियां और जहाजों-विमानों के लंबे रास्तों से ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन बढ़ जाता है. बहरीन, साइप्रस, कुवैत, लेबनान, ओमान और क़तर जैसे मुल्क पहले से ही पानी की कमी और प्रदूषण से जूझ रहे हैं. ऐसे में यह जंग मिडिल ईस्ट के पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर वक़्त के लिए बुरा असर डाल सकती है.

लेबनान के बेरुत में इज़रायली हमले के बाद के हालात (Photo: Reuters)

मिडिल ईस्ट की हवा में बढ़ता कॉर्बन

दुनिया में सबसे ज़्यादा फॉसिल फ्यूल (कोयला, पेट्रोलियम, गैस) इस्तेमाल करने वालों में मिलिट्री टॉप पर है. US मिलिट्री दुनिया की बड़ी इंस्टीट्यूशनल एमिटर है. यानी अमेरिका की सेना इतनी ज़्यादा ईंधन (जैसे जेट फ्यूल, डीज़ल, पेट्रोल) इस्तेमाल करती है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी संस्थागत प्रदूषण फैलाने वाली (Institutional Emitter) मानी जाती है.

Advertisement

ग़ाज़ा के नतीजों से अंदाज़ा लगाया गया कि पहले 120 दिनों में इतना ज़्यादा प्रदूषण हुआ, जो 26 अलग-अलग देशों और इलाक़ों से एक साल में होने वाले एमिशन के बराबर है. एमिशन वह प्रक्रिया होती है, जब गैसों या धुआं का वातावरण में निकलता है.

शिपिंग कंपनियां मिडिल ईस्ट से बचने के लिए जहाजों का रूट बदल रही हैं. वे रेड सी (Red Sea) से होकर जाने वाले स्वेज़ कैनाल रूट का रिस्क लेने के बजाय अफ्रीका के सिरे के आस-पास से जहाज़ भेज रही हैं. इससे हिंद महासागर से अटलांटिक जाने वाले जहाज़ों के लिए रास्ता काफ़ी लंबा हो जाता है. लंबी दूरी की वजह से जहाज़ तेज़ी से चलते हैं और ज़्यादा फ्यूल ख़र्च होता है, जिससे ज़्यादा कार्बन वातावरण में शामिल होता है.

(Photo: AP)

2024 की एक मॉडलिंग स्टडी के मुताबिक़, स्वेज़ कैनाल में रुकावट से जहाजों का कार्बन फुटप्रिंट क़रीब 50 फ़ीसदी बढ़ सकता है. जबकि UN की ट्रेड और डेवलपमेंट बॉडी UNCTAD का सुझाव है कि अगर सिंगापुर से उत्तरी यूरोप का राउंड ट्रिप केप ऑफ़ गुड होप से होकर जाता है, तो एमिशन 70 फीसदी ज़्यादा होगा.

हवाई रास्ते पर नज़र डालें तो स्थिति कुछ ऐसी ही दिखती है. हालांकि, गल्फ़ एयरस्पेस के सिविलियन प्लेन के लिए बंद होने की वजह से कई फ्लाइट्स कैंसिल हो गई हैं, लेकिन लंबे वक़्त तक रूट बदलने से एमिशन बढ़ सकता है. Communications Earth & Environment पर छपी एक स्टडी के मुताबिक़, यूक्रेन पर हमले के बाद, कई कैरियर्स के लिए रूसी एयरस्पेस बंद होने से 2023 में ग्लोबल एविएशन एमिशन में 1% की बढ़ोतरी हुई.

Advertisement

पहले ही क्लाइमेट चिंताओं से जूझ रहा मिडिल ईस्ट

कुछ गल्फ़ देशों ने एनवायरनमेंटल साइंस और पर्यावरणीय आपदाओं से निपटने के लिए बनाए जाने वाले सिस्टम में भारी इन्वेस्ट किया है. सऊदी अरब ने 2030 तक लाखों पेड़ लगाने और अपने समंदर के बड़े एरिया को बचाने का प्लान बनाया है. ओमान ने मैंग्रोव रेस्टोरेशन के लिए बड़ा कमिटमेंट किया है. यानी ओमान में समुद्र और तटीय इलाकों में खत्म या कम हो चुके मैंग्रोव जंगलों को फिर से विकसित करने पर ज़ोर दिया जाएगा. लेकिन ईरान इस जंग में गहरी इकोलॉजिकल कमज़ोरियों और जवाब देने की कम क्षमता के साथ शामिल हुआ.

(Photo: AFP)

ईरान पहले से ही एयर पॉल्यूशन और पानी की कमी से जूझ रहा था. हाल ही में पब्लिश हुए UN के मशहूर एक्सपर्ट कावेह मदानी के आर्टिकल के मुताबिक़, यह 'वॉटर बैंकरप्सी' के कॉन्सेप्ट का एक खास उदाहरण है. यह ऐसी स्थिति होती है, जब किसी इलाक़े में पानी की मांग उपलब्ध पानी से ज़्यादा हो जाए और पानी के सोर्स क़रीब ख़त्म होने लगें. 

ईरान ने ज़मीन से इतना पानी खींच लिया है कि ज़मीन धंस रही है. फिर भी, इस्तेमाल अभी भी इतना ज़्यादा है कि कमी आम बात है. रिपोर्ट के मुताबिक़, देश के बड़े शहरों में कभी-कभी रात में सप्लाई ख़त्म हो जाती है. माना जाता है कि एयर पॉल्यूशन से हर साल हज़ारों मौतें होती हैं. तेहरान दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक माना जाता है.

Advertisement

मौजूदा जंग से ईरान में स्थिति और ज़्यादा ख़राब हो सकती है. इंफ्रास्ट्रक्चर को नुक़सान, हड़तालों से होने वाला पॉल्यूशन और सरकारी रिसोर्स की कमी की वजह से एनवायरनमेंटल रिकवरी जंग के बाद की प्राथमिकताओं की लिस्ट में नीचे आ सकती है.

जंग के बाद पर्यावरण को होने वाले नुक़सान से निपटना स्थिरता के लिए ज़रूरी है. युद्ध से न सिर्फ़ इकोलॉजिकल नुक़सान और ज़्यादा बढ़ सकता है बल्कि इसे ठीक करने के लिए ज़रूरी इंस्टीट्यूशन भी कमज़ोर पड़ सकते हैं. 

मिट्टी, पानी, हवा... हर तरफ़ मंडरा रहा ख़तरा!

पर्यावरण मामलों के जानकार डॉ. अरुण, aajtak.in के साथ बातचीत में कहते हैं, "इज़रायल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रही यह जंग क़रीब 10 साल के लिए निशान छोड़ जाएगी. यह हवा, पानी, मिट्टी और पहाड़ों की बनावट पर असर डाल रही है. पर्यावरण में माइक्रोबायोलॉजिकल लोड बढ़ रहा है. यह साल गर्म साल होने वाला है. इस दौरान होने वाली यह जंग तापमान को और ज़्यादा बढ़ा देगी."

उन्होंने आगे कहा कि यह युद्ध, C0P से जुड़े ऐलानों पर असर डालेगा. UN के सतत विकास लक्ष्य-SDG टार्गेट्स को पाने में बहुत रुकावट डालेगा.

(Photo: AFP)

बीमारियों की वजह बनेगा पीएम 2.5!

मिसाइल हमले, तेल भंडार, सैन्य ठिकानों और इमारतों के नष्ट होने से हवा में बड़ी मात्रा में बारीक कण फैलते हैं, जिससे पीएम 2.5 बढ़ता है. पीएम 2.5 हवा में मौजूद बहुत बारीक कण होते हैं, जिनका साइज़ 2.5 माइक्रोमीटर से छोटा होता है. ये कण धूल, धुआं और विस्फोटों से निकलते हैं और आसानी से फेफड़ों के अंदर तक पहुंच जाते हैं.

Advertisement

मिडिल ईस्ट में बारिश कम होती है, जिससे पर्यावरण से इनके जल्दी साफ होने की उम्मीद भी ना के बराबार है. बारिश हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण को नीचे गिरा देती है. ऐसे में जंग जारी रहने से आने वाले वक़्त में इलाक़े में पीएम 2.5 का स्तर बहुत ज़्यादा बढ़ सकता है, जिससे प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम दोनों बढ़ेंगे. 

(Photo: Reuters)

डॉ. अरुण कहते हैं, "एक्सप्लोसिव और बारूद से पूरे फूड साइकल पर बुरा असर पड़ेगा, जिससे नागरिकों का स्वास्थ्य ख़राब होगा. मिडिल ईस्ट में बमबारी से सिलिका वाली धूल बहुत ज़्यादा फैलती है, जिसे सांस के साथ लेने से सैनिकों और आम लोगों में सिलिकोसिस जैसी फेफड़ों की बीमारी का खतरा बढ़ सकता है."

चरमरा सकता है मराइन इकोसिस्टम

ईरान जंग के बढ़ने के साथ समुद्री पर्यावरण पर भी गंभीर ख़तरा पैदा हो सकता है क्योंकि ऑयल टैंकरों को भी निशाना बनाया जा रहा है. जब ऑयल टैंकर पर हमला या ब्लास्ट होता है, तो वह समंदर में डूब सकता है. ऐसे में टैंकर के अंदर भरा तेल पानी में फैल सकता है. तेल के समुद्र में मिल जाने से समुद्री जीव-जंतु, पौधों और पूरे मराइन इकोसिस्टम पर बुरा असर पड़ेगा. इसके साथ ही समंदर के अंदर रहने वाले कई ऐसे जीव भी नष्ट हो सकते हैं, जिनकी अभी तक पूरी तरह पहचान भी नहीं हो पाई है.

Advertisement
(Photo: AFP)

'मिडिल ईस्ट का ग्लोबल वॉर्मिंग में होगा बड़ा रोल...'

रांची यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ़ जियोलॉजी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और पर्यावरण मामलों के जानकर डॉ. नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं, "ईरान युद्ध से बहुत बड़ा एटमॉस्फियरिक डिजास्टर होने जा रहा है. किसी भी युद्ध का असर मनुष्य के बाद पर्यावरण पर होता है. पर्यावरण का मतलब सिर्फ़ हवा से नहीं है. जंग का असर मिट्टी और पानी में भी हो रहा है. मिडिल ईस्ट में नदियां भी ज़्यादा नहीं हैं. पर्यावरण के नज़रिए जो भी नुक़सान हो रहा है, हम उसके वापस नहीं कर पाएंगे."

वे आगे कहते हैं, "धरती बनने के बाद हम छठवें महाविनाश में प्रवेश कर चुके हैं, जिसमें मनुष्य बहुत बड़ा रोल अदा कर रहा है. मिट्टी को बनने में कई सौ साल लग जाते हैं, वो एक मिनट में बर्बाद की जा रही है. पानी प्रदूषित हो जाएगा. चट्टानें बर्बाद हो जाएंगी."

डॉ. नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं, "ऑयल, गैस और रिफाइनरियों पर हमले होने से ज़हरीली गैसें पर्यावरण में शामिल हो रही हैं. जब कॉर्बनडाई ऑक्साइड पर्यावरण में शामिल हो जाता है, तो उसकी उम्र 120 साल होती है. जितनी ग्रीन हाउस गैसें पर्यावरण में आ रही हैं, ये क़रीब सौ साल तक ज़िंदा रहेंगी. ग्लोबल वॉर्मिंग में मिडिल ईस्ट एक बहुत बड़ा रोल प्ले करने जा रहा है."

Advertisement
(Photo: Reuters)

सवालों के साये में ग्लोबल क्लाइमेट टार्गेट्स

ईरान जंग का असर सिर्फ़ ग्लोबल पॉलिटिक्स या सिक्योरिटी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह वैश्विक जलवायु लक्ष्यों पर भी पड़ सकता है. COP19 जलवायु सम्मेलन का मक़सद दुनिया भर के देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने, क्लाइमेट चेंज से निपटने और पर्यावरण की रक्षा के लिए ठोस क़दम उठाने पर सहमत करना था. इसी तरह संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलप्मेंट गोल्स (SDGs) का टार्गेट 2030 तक ग़रीबी कम करना, स्वच्छ ऊर्जा बढ़ाना, पर्यावरण की रक्षा करना और टिकाऊ विकास सुनिश्चित करना है.

लेकिन अगर ईरान और मिडिल ईस्ट में जंग लंबी चलती है, तो इन टार्गेट्स पर बड़ा असर पड़ सकता है. जंग के दौरान तेल और गैस का इस्तेमाल बढ़ता है, बमबारी से कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण बढ़ता है और पर्यावरण को भारी नुक़सान हो रहा है. इसके अलावा, मिडिल ईस्ट और अन्य देशों का फोकस जलवायु नीतियों से हटकर सुरक्षा और सैन्य खर्च पर जा सकता है. ऐसे सवाल यह है कि स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु कार्रवाई और टिकाऊ विकास से जुड़े वैश्विक लक्ष्य कैसे हासिल किए जा सकेंगे? 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement