ईरान की 'साइलेंट डिप्लोमेसी'! कुरान की अलग-अलग आयतों से मुल्कों को मैसेज? जानें भारत के लिए क्या कहा

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में आज 30 से ज्यादा देश और गैर-राज्य संस्थाओं के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए. उनके जनाजे में कुरान की विभिन्न आयतें पढ़ी गईं, जो धार्मिक होने के साथ-साथ गहरे कूटनीतिक संदेश भी थीं. सऊदी अरब, रूस, चीन, भारत और बाकी देशों के लिए अलग-अलग आयतें चुनी गईं, जो उनके राजनीतिक और धार्मिक संबंधों को दिखाती थीं.

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खामेनेई के जनाजे में 30 ज्यादा देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए. (Image: AFP) खामेनेई के जनाजे में 30 ज्यादा देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए. (Image: AFP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 06 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:42 PM IST

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक करने की तैयारी जारी है. 4 जुलाई 2026 को तेहरान में आयोजित इस जनाजे में जब 30 से ज्यादा देशों और गैर-राज्य संस्थाओं के प्रतिनिधिमंडल खामेनेई को आखिरी विदाई देने पहुंचे, तो वहां कुरान की अलग-अलग आयतों को पढ़ा गया. 

विशेषज्ञों का मानना है कि कुरान की इन आयतों का सिलेक्शन सिर्फ धार्मिक नहीं था, बल्कि इनके जरिए ईरान ने दुनिया को एक बेहद नपा-तुला कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश की है.

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जब कई देशों के प्रतिनिधि खामेनेई के ताबूत के पास से गुजर रहे थे, तो हर देश के हिसाब से आयतें बदल रही थीं. हालांकि ईरान सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि ये सब पहले से तय और सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था.

सऊदी अरब को याद दिलाई 'बद्र की जंग'

अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक शाहीन मोदारेस के मुताबिक, 'इस जनाजे में सबसे अहम बातें किसी अधिकारी ने मुंह से नहीं कहीं, बल्कि वो आयतें थीं जो पढ़ी जा रही थीं.' उन्होंने इसे 'आयतों के जरिए शीतयुद्ध कालीन क्रेमलिनोलॉजी' करार दिया.

सबसे हैरान करने वाला वाकया तब देखा गया जब सऊदी अरब का डेलीगेश ताबूत के सामने पहुंचा. उस समय सूरह अल इमरान (3:13) की आयत पढ़ी गई. ये आयत 'बद्र की जंग' की याद दिलाती है, जो इस्लाम की पहली बड़ी लड़ाई थी. इसमें एक छोटी मुस्लिम सेना ने अपने से बहुत बड़ी दुश्मन सेना को हराया था. बद्र की लड़ाई 624 ईस्वी में सऊदी अरब की धरती पर ही लड़ी गई थी, इसलिए इस आयत के चयन ने तुरंत सबका ध्यान खींचा.

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यूके की मीडिया वेबसाइट 'मिडिल ईस्ट आई' के मुताबिक, इसे एक साझा इस्लामिक इतिहास की याद दिलाने के तौर पर भी देखा जा सकता है और रियाद को एक तीखा संदेश भी. ईरान इसके जरिए खुद को उस ताकत के रूप में पेश कर रहा था जो अमेरिका और इजरायल के साथ हालिया युद्ध में टिकी रही और जीत गई, जबकि सऊदी अरब वॉशिंगटन के पाले में खड़ा रहा.

इराक के राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद हसन बहरानी ने भी बगदाद के 'अलहद टीवी' पर कहा, 'ये अचानक या खुद से नहीं था. शहीद नेता की अंतिम विदाई में शामिल होने वाले प्रतिनिधिमंडलों के सामने पढ़ी गई कुरान की आयतें जानबूझकर चुनी गई थीं. कुछ देश तो वहां न चाहते हुए भी शामिल हुए थे.'

'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' को मिला हौसला

ईरान के वैचारिक और सैन्य सहयोगियों, जिन्हें 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' कहा जाता है, उन्हें शहादत, वफादारी और जीत के संदेश वाली आयतें सुनाई गईं.

हमास के प्रतिनिधियों का स्वागत उन पुरुषों के बारे में लिखी आयत से किया गया जिन्होंने अल्लाह के साथ अपने वादे को निभाया. जबकि हिज्बुल्लाह के लिए वो आयत पढ़ी गई जिसमें अल्लाह पर यकीन रखने वालों से कहा गया है कि वो कमजोर न पड़ें और शोक न मनाएं, क्योंकि जीत उन्हीं की होगी.

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लाल सागर में पश्चिमी जहाजों को निशाना बनाने वाले यमन के हुथियों को दृढ़ता से लड़ने और हिम्मत न हारने वाली आयतें डेडीकेट की गईं. इसके जरिए तेहरान ने अपने करीबियों को भरोसा दिलाया कि वो उनके साथ खड़ा है.

भारत, रूस और चीन के लिए नरम कूटनीति

रूस, चीन और भारत जैसे मित्र देशों के लिए युद्ध की नहीं, बल्कि धार्मिकता और सांत्वना से जुड़ी आयतें चुनी गईं. चीन के लिए पढ़ी गई आयत में नरम लहजे में कहा गया कि जीत सिर्फ अल्लाह से मिलती है. रूस के लिए कहा गया कि आखिर में नेक लोगों के हक में फैसला होता है.

भारत के लिए 'कमजोर न पड़ें और शोक न मनाएं' वाले हिस्से का एक छोटा और सौम्य अंश पढ़ा गया. सोमवार को ईरान ने खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत का आभार भी जताया. तेहरान ने भारत की इस मौजूदगी को दोनों देशों के स्थायी संबंधों का 'अनमोल सबूत' बताया और कहा कि ईरानी लोग भारत की इस एकजुटता को कभी नहीं भूलेंगे.

विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान ने मित्र देशों को अपने 'प्रतिरोध के अक्ष' वाले गुट से अलग रखा. वो सहयोगियों का आभार तो जता रहा था, लेकिन उन्हें अपनी वैचारिक जंग में नहीं घसीट रहा था.

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शाहीन मोदारेस ने 'एक्स' पर लिखा, 'हर एक विदेशी प्रतिनिधिमंडल को एक आयत सौंपी गई थी और हर आयत एक टारगेटेड राजनीतिक संदेश थी. सऊदी अरब को डांटा गया. तुर्किये को शर्मिंदा किया गया. लेबनान पर आरोप मढ़े गए. प्रॉक्सी ग्रुप्स को सांत्वना दी गई और कतर का शुक्रिया अदा किया गया. कल ताबूत आयतों में बोल रहा था और ईरानियों ने इसे किसी भी विदेशी विश्लेषक से ज्यादा तेजी से डिकोड कर लिया.'

पहले भी आयतों से संदेश देता रहा है ईरान

ईरान का तनाव के समय कुरान की आयतों का इस्तेमाल करना नया नहीं है. इसी साल अप्रैल में, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का जवाब सूरह अल-मुजादिला की आयतों से दिया था, ताकि ईरान के रुख को अल्लाह के इंसाफ और अंतिम जीत के तौर पर पेश किया जा सके.

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इसी तरह, अली खामेनेई की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी मोजतबा खामेनेई ने शोक के 40वें दिन अपने संदेश की शुरुआत सूरह अल-फत्ह की आयत से की थी. उन्होंने कहा था, 'बेशक, हमने आपको एक क्लियर जीत दी है.', जो अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध में ईरान की 'जीत' को दैवीय रूप से तय बताता है. भले ही ईरान इस पर चुप हो, लेकिन विश्लेषक खामेनेई के जनाजे को कूटनीति की एक नए अध्याय के तौर पर देख रहे हैं.

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