किसी भी जंग में दो तरह के देश होते हैं. एक वो जो हथियार उठाते हैं. दूसरे वो जो बातचीत की मेज सजाते हैं. पश्चिम एशिया की मौजूदा लड़ाई में कतर, ओमान और पाकिस्तान ऐसे ही देश थे, जो अमेरिका और ईरान के बीच कम्युनिकेशन बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है.
कतर पर मिसाइलें गिर रही हैं. पाकिस्तान सऊदी अरब को लेकर खुलकर ईरान को चेताने लगा है. मध्यस्थ के मोर्चे पर ओमान की भूमिका भी कमजोर पड़ने लगी है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ईरान सिर्फ अपने दुश्मनों से लड़ रहा है, या फिर वह उन देशों को भी खुद से दूर कर रहा है जो अब तक उसके लिए सबसे अहम कूटनीतिक पुल बने हुए थे?
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यही वजह है कि कई रणनीतिक विशेषज्ञ ईरान की मौजूदा नीति को बड़ा जोखिम बता रहे हैं. उनका कहना है कि सैन्य मोर्चे पर दबाव बनाने की कोशिश कहीं कूटनीतिक मोर्चे पर आत्मघाती साबित न हो जाए.
कतर... जो पुल था, उसी पर हमले कर रहा ईरान
खाड़ी देशों में कतर की भूमिका हमेशा अलग रही है. एक तरफ उसके यहां अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा अल-उदीद मौजूद है. दूसरी तरफ उसने वर्षों तक ईरान के साथ भी कम्युनिकेशन बनाए रखा है. अमेरिका और ईरान के बीच जब भी तनाव बढ़ा, कतर अक्सर दोनों पक्षों के बीच बातचीत का जरिया बना. लेकिन हालिया संघर्ष में इसी कतर पर ईरानी मिसाइल-ड्रोन से हमले कर रहा है.
दोहा ने साफ कहा कि ईरानी हमलों ने कई रेड लाइन्स पार कर दी हैं. हालांकि, तेहरान कहता रहा है कि उसका निशाना अमेरिकी सैन्य ठिकाने थे, कतर नहीं. लेकिन कतर इसे अपनी सुरक्षा पर खतरा मान रहा है. इसके बाद उसने अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग और मजबूत करने की बात कही. यानी जिस देश ने दोनों पक्षों के बीच बातचीत का रास्ता खोला, मानो वही अब खुद इस जंग का हिस्सा बन गया है.
पाकिस्तान की मुश्किल क्यों बढ़ गई?
कतर के बाद सबसे ज्यादा दबाव पाकिस्तान पर दिखाई दे रहा है. पिछले कुछ महीनों में शहबाज-मुनीर की जोड़ी ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने की कोशिश की. लेकिन इसी दौरान यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर फिर मिसाइल हमले शुरू कर दिए. यहीं से पाकिस्तान की मुश्किल बढ़ गई.
इस्लामाबाद के सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंध हैं. पाकिस्तान की सेना सऊदी के साथ सुरक्षा सहयोग करती रही है. ऐसे में अगर सऊदी सीधे इस संघर्ष में घिरता है तो पाकिस्तान के लिए न्यूट्रल रहना आसान नहीं होगा. पाकिस्तान और सऊदी का रक्षा समझौता ऐसा है कि अगर सऊदी पर, हालिया मामले में अगर ईरान हमला करता है तो पाकिस्तान को उसके बचाव में उतरना पड़ेगा. इससे पाकिस्तान भी जंग में शामिल माना जाएगा.
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इसी वजह से पाकिस्तानी नेतृत्व ने साफ कहा कि सऊदी की सुरक्षा उसके लिए भी अहम है. साथ ही उसने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील भी की. यानी पाकिस्तान अब मध्यस्थ और रणनीतिक साझेदार, दोनों भूमिकाओं के बीच फंसता नजर आ रहा है. पाकिस्तान की तरफ से पहले भी ईरान को दबी जुबान में चेतावनी दी गई है. इशाक डार ने बकायदा संसद में कहा था कि ईरान को पाकिस्तान-सऊदी का समझौता याद रखनी चाहिए.
ईरान आखिर चाहता क्या है?
रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि ईरान पूरे खाड़ी क्षेत्र को यह मैसेज देना चाहता है कि अगर उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई होगी तो उसका असर सिर्फ अमेरिका या इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण की उसकी कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है. ईरान चाहता है कि इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाज उसकी शर्तों के मुताबिक चलें. लेकिन इसी रणनीति का दूसरा पहलू भी है.
अगर कतर, ओमान और दूसरे खाड़ी देश खुद को असुरक्षित महसूस करने लगें तो वे पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अमेरिका का साथ दे सकते हैं. यानी जिस दबाव की रणनीति से ईरान अपने विरोधियों को रोकना चाहता है, वही रणनीति उसके खिलाफ नया क्षेत्रीय गठबंधन भी खड़ा कर सकती है.
होर्मुज स्ट्रेट में कभी टोल-फीस का समर्थन करने वाले ओमान से भी ईरान के खिलाफ होता नजर आ रहा है. होर्मुज स्ट्रेट में यूनाइटेड नेशन के साथ मिलकर शिपिंग कॉरिडोर ओमान ने ही बनाई है. ईरान ने कथित रूप से ओमानी कॉरिडोर से गुजरने वाले जहाजों पर हमले भी किए हैं. ओमान इसको लेकर चेतावनी भी दे चुका है और हमले रोकने की ईरान से अपील कर चुका है.
क्या ईरान खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है?
कई पश्चिमी और खाड़ी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय ईरान की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अमेरिका नहीं है. असल चुनौती यह है कि उसके कुछ ऐसे साझेदार भी दूरी बना रहे हैं, जो हालिया जंग में उसके लिए मध्यस्थ की भूमिका में थे. कतर अमेरिका संग सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर रहा है. पाकिस्तान दोहरे दबाव में है. ओमान की भूमिका ईरान के खिलाफ होती दिख रही है. सऊदी पहले से ही ईरान के खिलाफ खड़ा है.
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यानी तेहरान के पास बातचीत के विकल्प पहले के मुकाबले कम होते दिखाई दे रहे हैं. यही वजह है कि कुछ एक्सपर्ट्स इसे ईरान के लिए सैन्य सफलता से ज्यादा कूटनीतिक नुकसान मान रहे हैं.
क्या सच में 'सुसाइडल मोड' में है ईरान?
इसे लेकर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान अपनी डिटरेंस यानी विरोधियों पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है. जबकि कुछ का मानना है कि अगर इसी दौरान उसके सबसे अहम कूटनीतिक साझेदार उससे दूर होते गए तो इसका सबसे बड़ा नुकसान खुद तेहरान को होगा.
फिलहाल इतना साफ है कि अमेरिका और इजरायल से टकराव के बीच ईरान की हर नई कार्रवाई सिर्फ युद्ध का दायरा नहीं बढ़ा रही, बल्कि उसके कूटनीतिक विकल्प भी कम करती जा रही है. यही वजह है कि आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ईरान अगली मिसाइल कहां दागेगा. असली सवाल यह है कि अगर बातचीत कराने वाले देश ही उससे नाराज हो गए, तो कल तेहरान के लिए बातचीत की मेज कौन सजाएगा?
एम. नूरूद्दीन