पश्चिम बंगाल से TMC सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से लगाए गए धार्मिक भेदभाव के आरोपों पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) ने अपनी रिपोर्ट दी है. आयोग ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप तीनों अधिकारियों के बयानों से मेल नहीं खाते. तीनों अधिकारियों ने धार्मिक भेदभाव से साफ इनकार किया है. आयोग ने अब पश्चिम बंगाल पुलिस से शिकायत के सोर्स और आरोपों की जांच करने को कहा है.
दरअसल, महुआ मोइत्रा ने 16 सितंबर को आयोग में शिकायत दी थी. इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान तीन वरिष्ठ मुस्लिम अधिकारियों को सरकारी बैठकों और कार्यक्रमों से अलग रखा गया. मामला जुलाई और अगस्त में शाह के पश्चिम बंगाल दौरे से जुड़ा था.
महुआ मोइत्रा ने अपनी शिकायत में सिलिगुड़ी के पुलिस कमिश्नर सैयद वकार रजा, एसटीएफ के डीजी जवेद शमीम और फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज के अतिरिक्त मुख्य सचिव खलील अहमद का नाम लिया था.
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शिकायत के मुताबिक, रजा को 18 जुलाई को सिलिगुड़ी में हुई सीमा सुरक्षा बैठक से जाने के लिए कहा गया था. उनका नाम आधिकारिक प्रोटोकॉल लिस्ट में भी नहीं था. वहीं, जवेद शमीम के बारे में आरोप लगाया गया कि उन्हें बैठक में शामिल नहीं होने दिया गया और उनकी जगह एक जूनियर अधिकारी मौजूद था.
महुआ ने आरोप लगाया था कि 19 जुलाई को कोलकाता में हुई आपदा तैयारी की बैठक में खलील अहमद को भी वहां पहुंचने के बाद जाने के लिए कहा गया था. इन घटनाओं को उन्होंने धार्मिक भेदभाव से जोड़ते हुए आयोग से जांच की मांग की थी. इन आरोपों की उस समय स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई थी.
तीनों अधिकारियों ने आरोपों से किया इनकार
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने 5 अक्टूबर को कोलकाता में इस मामले पर सुनवाई की. आयोग ने शिकायत में नामित तीनों अधिकारियों के बयान दर्ज किए. तीनों अधिकारियों ने कहा कि उनके साथ धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हुआ. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें किसी सरकारी बैठक, प्रोटोकॉल या कार्यक्रम से धार्मिक पहचान की वजह से जानबूझकर अलग नहीं किया गया.
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आयोग ने कहा कि अधिकारियों के बयान महुआ मोइत्रा की शिकायत में लगाए गए मुख्य आरोपों से अलग हैं. महुआ मोइत्रा से संपर्क करने की कई कोशिशें की गईं. उन्हें अपना पक्ष रखने और आरोपों के समर्थन में सबूत देने का मौका दिया गया. हालांकि, वह सुनवाई के दौरान उपलब्ध नहीं थीं. इसलिए उनका बयान दर्ज नहीं किया जा सका.
आयोग ने अब पश्चिम बंगाल पुलिस से शिकायत के स्रोत की जांच करने को कहा है. पुलिस को आधिकारिक रिकॉर्ड, प्रोटोकॉल दस्तावेज और बैठकों से जुड़े रिकॉर्ड भी देखने को कहा गया है. अगर जांच में आरोप जानबूझकर झूठे या फर्जी पाए जाते हैं, तो आयोग ने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर पर विचार करने की सिफारिश की है. पश्चिम बंगाल पुलिस से मामले में कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी गई है.
तपस सेनगुप्ता