कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महिला के शव का उसके गोद लिए बेटे को तुरंत दाह संस्कार करने की अनुमति दे दी है. परिजनों के आपसी दावों और विवादों के कारण महिला का पार्थिव शरीर पिछले एक महीने से अस्पताल के मोर्चरी में लावारिस की तरह पड़ा हुआ था.
याचिकाकर्ता अर्का मोंडल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर पुलिस प्रशासन को अपनी मां कृष्णा घोष के शव का अंतिम संस्कार करने की अनुमति देने गुहार लगाई थी. कृष्णा घोष का निधन एक महीने पहले 23 जून को हो गया था.
कोर्ट की सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने बताया कि मोंडल हालांकि गोद लिए बेटे हैं, लेकिन उनके और परिवार के दूसरे सदस्यों (मायके पक्ष के रिश्तेदारों) के बीच संपत्ति और अधिकारों को लेकर विवाद चल रहा है. इसी खींचतान की वजह से अंतिम संस्कार को लेकर विवाद बना हुआ था.
अदालत की तल्ख टिप्पणी: तुरंत अंतिम संस्कार जरूरी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस भट्टाचार्य ने चिंता जताते हुए कहा, 'सबसे अहम बात ये है कि एक महिला का निधन 23 जून को हुआ था और आज 23 जुलाई को एक रिट याचिका पर ये तय करने के लिए विचार किया जा रहा है कि शव का दाह संस्कार कौन करेगा.'
अदालत ने कहा कि महिला की मौत को एक महीना बीत चुका है, इसलिए अब बिना किसी देरी के तुरंत दाह संस्कार किया जाना बेहद जरूरी है.
सिर्फ अंतिम संस्कार का अधिकार, संपत्ति पर नहीं
जस्टिस भट्टाचार्य ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वो याचिकाकर्ता को तुरंत शव का दाह संस्कार करने की अनुमति दें. इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि वो याचिकाकर्ता या दूसरे रिश्तेदारों के किसी भी कानूनी अधिकार पर फैसला नहीं कर रहा है.
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि सिर्फ दाह संस्कार करने से याचिकाकर्ता को कोई अतिरिक्त कानूनी अधिकार नहीं मिल जाएगा, जब तक कि इसका फैसला किसी उपयुक्त मंच या अदालत की ओर से न किया जाए.
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याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया था कि मृतका ने अपनी जिंदगी में उनके पक्ष में एक वसीयत की थी. उन्होंने कहा कि गोद लिए बेटे को अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार करने का हक है, लेकिन पुलिस उन्हें ऐसा करने से रोक रही थी. अब कोर्ट के आदेश के बाद अब मृतका को एक महीने बाद अंतिम विदाई मिल सकेगी.
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