उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. राज्य की राजनीति में अब तक यह परिपाटी रही है कि दलितों की चुनावी हिस्सेदारी आमतौर पर केवल आरक्षित सीटों तक ही सीमित रखी जाती है. लेकिन 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में यह अघोषित परिपाटी दम तोड़ सकती है. अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने और अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) एजेंडे को और अधिक मजबूत करने के लिए, समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी जातिगत रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. पार्टी सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की बड़ी योजना पर काम कर रही है.
MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण से आगे का विस्तार
पार्टी के सूत्रों के अनुसार, यह कदम सपा के पारंपरिक मुस्लिम-यादव समर्थन आधार से आगे बढ़कर खुद को एक व्यापक सामाजिक गठबंधन के रूप में पेश करने का एक सोचा-समझा प्रयास है. यदि आंकड़ों पर नजर डालें, तो समाजवादी पार्टी ने 2022 में सामान्य सीटों पर केवल 3 ही सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारे थे, गाजियाबाद - विशाल वर्मा (जाटव), हरदोई - अनिल वर्मा (पासी) और चौरी-चौरा - बृजेश चंद्र लाल (पासी). उस दौरान सपा ने दलित वर्ग के उम्मीदवारों को केवल उत्तर प्रदेश की निर्धारित 84 सुरक्षित (SC) सीटों पर ही टिकट दिए थे (जिनमें से 2022 के चुनाव में सपा गठबंधन ने केवल 20 सीटें जीती थीं, जबकि एनडीए ने अधिकांश सीटें जीती थीं).
इसके विपरीत, सपा ने 2017 और 2022 के चुनावों में सामान्य सीटों पर 100 से अधिक (लगभग 115 से 125) बड़ी संख्या में ओबीसी उम्मीदवारों (यादव, कुर्मी, शाक्य, मौर्य, सैनी, राजभर, निषाद आदि) को टिकट दिए थे. इसलिए, सामान्य सीटों पर दलित प्रत्याशी उतारना 2017 और 2022 के मुकाबले एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक रणनीतिक बदलाव होगा.
लोकसभा चुनावों की सफलता से प्रेरणा
2017 के विधानसभा चुनावों में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने दलित उम्मीदवारों को मुख्य रूप से आरक्षित सीटों तक ही सीमित रखा था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में फैजाबाद (अयोध्या) और मेरठ जैसी हाई-प्रोफाइल सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवारों (जैसे फैजाबाद से अवधेश प्रसाद) को उतारकर एक नई शुरुआत की गई थी. इस सफल प्रयोग से उत्साहित होकर सपा अब विधानसभा चुनाव में भी इसे दोहराना चाहती है. इस नई राजनीतिक रणनीति का मुख्य केंद्र पश्चिम उत्तर प्रदेश और मध्य उत्तर प्रदेश (अवध) बनेगा, जहाँ दलित बिरादरी की आबादी क्रमशः 23% और 25% है (जबकि पूरे राज्य में दलितों की कुल आबादी करीब 21% है).
पार्टी का मानना है कि कठिन निर्वाचन क्षेत्रों और सामान्य सीटों पर भी दलित और ओबीसी उम्मीदवारों को नामांकित करने से, भाजपा विरोधी वोट एकजुट होंगे और पड़ोसी क्षेत्रों में एक लहर प्रभाव (Ripple Effect) पैदा होगा. सपा सूत्रों ने भाजपा के गढ़ सरोजिनीनगर का हवाला देते हुए बताया कि भले ही वहाँ पासी उम्मीदवार तुरंत न जीते, लेकिन उसकी उम्मीदवारी मलिहाबाद और बख्शी का तालब जैसे आसपास के निर्वाचन क्षेत्रों के समीकरणों को पूरी तरह प्रभावित कर सकती है. पार्टी ऐसी ही सीटों की पहचान कर रही है जहाँ यह रणनीति गेम-चेंजर साबित हो सकती है.
बसपा के जनाधार में बिखराव
पिछले डेढ़ दशकों में बसपा के लगातार छिटकते जनाधार के कारण राज्य के दलित वोट बैंक में तेजी से बिखराव हुआ है. भाजपा ने पहले गैर-जाटव दलितों को साधकर इसका लाभ उठाया था, और अब 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा ने भी इस वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी की है. वर्तमान में भाजपा और सपा दोनों ही जाटव व गैर-जाटव वोटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की होड़ में हैं. सपा ऐसी सीटें तलाश रही है जहाँ उसके मूल वोट बैंक (यादव व मुस्लिम) के साथ दलितों की संख्या अधिक हो, जिससे जीत सुनिश्चित की जा सके. वहीं, दूसरी ओर भाजपा भी ऐसी सीटें चिह्नित कर रही है जहाँ अगड़े, अति पिछड़ों और दलितों का गठजोड़ एक अजेय समीकरण बना सके.सामान्य सीटों पर दलित जीत के ऐतिहासिक अपवादसामान्य सीटों पर दलितों का लड़ना और जीतना पूरी तरह नया नहीं है, हालांकि यह अब तक बहुत सीमित और प्रतीकात्मक रहा है. कांशीराम ने वर्ष 1991 में कांशीराम ने इटावा की सामान्य सीट से चुनाव जीता था.
वर्तमान लोकसभा में अयोध्या (फैजाबाद) से जीतने वाले अवधेश प्रसाद एक बड़ा उदाहरण हैं. इसके अलावा देश के अन्य हिस्सों में किरेन रिजिजू (एसटी - अरुणाचल प्रदेश पश्चिम), चरणजीत सिंह चन्नी (एससी - जालंधर) और झारखंड के पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी जैसे नेता सामान्य सीटों से प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
सपा सूत्रों के अनुसार, उनका मुख्य ध्यान PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) संयोजन को और अधिक धार देना है, जिसने 2024 में शानदार परिणाम दिए थे. भाजपा ने सपा के इस कदम को खारिज करते हुए तीखा हमला बोला है. पार्टी प्रवक्ताओं ने आरोप लगाया कि जब भी सपा सत्ता में थी, उसने दलितों के खिलाफ सबसे ज्यादा अत्याचार किए, उनकी जमीनों पर अतिक्रमण किया, बसपा प्रमुख मायावती का अपमान किया और दलित दिग्गजों के नाम पर रखे गए संस्थानों के नाम बदल दिए. भाजपा का दावा है कि दलित और ओबीसी आज भी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में शीर्ष पदों पर मजबूती से काबिज हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और अन्य राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 1990 के दशक के सपा-बसपा गठबंधन के पतन के बाद दलितों और यादवों के बीच ऐतिहासिक तनाव रहे हैं. अखिलेश यादव इस अंतर को पाटने की कोशिश जरूर कर रहे हैं, लेकिन यह देखना बाकी है कि दलित इसे वास्तविक राजनीतिक पहुंच मानते हैं या सिर्फ चुनावी गणना. इस प्रकार, 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सपा का यह नया प्रयोग उत्तर प्रदेश के पारंपरिक जातिगत समीकरणों को पूरी तरह नया आकार देने की क्षमता रखता है.
समर्थ श्रीवास्तव