उत्तर प्रदेश: कम लागत, ज्यादा मुनाफा! चित्रकूट के किसानों ने अपनाई जैविक खेती

उत्तर प्रदेश के किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों की बढ़ती लागत से परेशान होकर जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं. गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और प्राकृतिक कीटनाशकों के उपयोग से फसल की गुणवत्ता बेहतर हो रही है और लागत कम हो रही है.

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जैविक खेती से बढ़ा किसानों का मुनाफा (Photo: ITG) जैविक खेती से बढ़ा किसानों का मुनाफा (Photo: ITG)

अखिलेश कुमार सोनकर

  • चित्रकूट,
  • 18 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:53 AM IST

उत्तर प्रदेश में रसायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते खर्च के बीच जैविक खेती अब किसानों के लिए एक उम्मीद की नई किरण के रूप मे सामने आई है. जो किसान कभी खेती में बढ़ती लागत से परेशान रहते थे, आज वे जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. 

गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और प्राकृतिक तरीके से तैयार कीटनाशकों का इस्तेमाल करके किसान फसलों की गुणवत्ता सुधार रहे हैं. पहले खाद और दवाइयों पर काफी खर्च हो जाता था. लेकिन अब जैविक खेती शुरू करने के बाद किसानों की लागत कम हुई और फसल की कीमत भी अच्छी मिलने लगी. 

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जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों के स्थान पर जीवांश खाद पोषक तत्वों (गोबर की खाद कम्पोस्ट, हरी खाद, जीवणु कल्चर, जैविक खाद आदि) बायो-पैस्टीसाईड और बायो एजेंट का इस्तेमाल किया जाता है.

इससे न सिर्फ भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है, बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता और कृषि लागत घटने व उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ने से फायदा भी ज्यादा होता है. जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग ने किसानों को बाजार में बेहतर कीमत पाने का मौका दिया है.  

जैविक खेती से किसानों को हुआ फायदा

जैविक खेती करने वाले बैहार गांव निवासी नत्थूराम ने झांसी के चिरगांव राजकीय कृषि विद्यालय मे तीन दिवसीय प्रशिक्षण लिया था. वे एक रिटायर्ड शिक्षक हैं और उन्होंने साल 2022 से जैविक खेती की शुरुआत की थी. जब इससे उन्हें फायदा होने लगा तो उन्होंने रबी और खरीफ उगानी शुरू की.

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वे अब 18 बीघे की फसल में खेती के साथ ही फलों की बागवानी भी करते हैं. जानकारी के मुताबिक, उन्हें सालाना 4 से 5  लाख का मुनाफा हो रहा है. अब  नत्थूराम अन्य लोगों को भी जैविक खेती के लिए जागरूक कर रहे हैं.  

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नत्थूराम की तरह ही मानिकपुर तहसील के बरहट गांव के निवासी किसान कोठारी सिंह पटेल भी जैविक खेती कर रहे है. उन्होंने साल 2023 में इसकी शुरुआत की थी. उनका कहना है कि उन्हें शुगर और BP की समस्या थी, जिसके बाद उन्होंने जैविक खेती की शुरुआत की. और उसी के आहार को खाया.

उनका कहना है कि इससे उनका स्वास्थ्य बेहतर हुआ. कोठारी सिंह पटेल ने बताया कि जब उन्हें इसमें रुचि आने लगी तो उन्होंने धान, अरहर और ज्वार की खेती करना शुरू किया. 

'जैविक खेती जीरो बैलेंस की खेती'

कोठारी सिंह पटेल का कहना है कि जैविक खेती जीरो बैलेंस की खेती है. उन्होंने कहा कि इसमें लागत नहीं मेहनत लगती है.  उन्होंने बताया कि वे इस खेती से अपने परिवार के लिए अनाज का उत्पादन करते हैं और जो अनाज बचता है उसे वे बाजार में बेच देते हैं. उनका कहना है कि उन्हें रासायनिक खेती से ज्यादा फायदा जैविक खेती में हुआ. 

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इसी तरह जिले के एक और बड़े किसान है जिन्हें प्रगतिशील किसान के रूप में जाना जाता है. इनका नाम योगेश जैन है, वे वह कर्वी तहसील के बेड़िपुलिया के पास प्राकृतिक और जैविक खेती कर रहे हैं. योगेश ने बहुत सालों से जैविक खेती कर रहे हैं. 

उन्होंने बताया कि जहां वे खेती कर रहे हैं वहां रसायनिक खेती होने के कारण वहां की भूमि बंजर हो गई थी. इस भूमि को सुधारने के लिए उन्होंने सबसे पहले पशुपालन किया. फिर गौमूत्र और गोबर से कम्पोजिट खाद बनाया और पम्प के माध्यम से उस खाद को खेतों तक पहुंचाया. उनका कहना है कि इससे खेतों की उर्वरक क्षमता बढ़ी और उन्होंने रबी और खरीफ फसलों का उत्पादन शुरू किया.

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प्राकृतिक और जैविक खेती को लेकर कृषि उप निदेशक जीत लाल गुप्ता का कहना है कि भारत सरकार और राज्य सरकार मिलकर नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फोर्मिंग योजना चला रही है. 

सरकार द्वारा 2026-27 में 25 कलस्टर बनाने का लक्ष्य दिया गया है, इसमें 3125 किसानों को जैविक खेती कराने का लक्ष्य दिया गया है. इसके तहत विभाग द्वारा गोष्ठी कर किसानों को जैविक खेती के प्रति प्रेरित किया जा रहा है. इसके साथ ही, उन्हें जैविक खेती करने के लिए विभाग द्वारा दो हजार का अनुदान भी दिया जा रहा है. बताया गया है कि, जैविक खेती में पहले उत्पादन कम होता है लेकिन जैसे-जैसे देशी खादों के इस्तेमाल से ज़मीन की उर्वरक क्षमता बढ़ती है वैसे-वैसे उत्पादन क्षमता भी बढ़ जाती है.

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