करीब 38 साल पहले रेप और अपहरण के मामले में दोषी ठहराए गए सुभाष को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष (आरोपी का अपराध साबित करने वाला पक्ष) आरोपों को साबित नहीं कर पाया. मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों से भी आरोपों की पुष्टि नहीं हुई. जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने 7 अक्टूबर को यह फैसला सुनाते हुए मेरठ की अदालत का पुराना फैसला रद्द कर दिया.
यह मामला 1986 का है. मेरठ की सत्र अदालत ने 26 सितंबर 1988 को सुभाष को अपहरण, शादी के लिए मजबूर करने के इरादे से महिला का अपहरण और रेप के आरोपों में दोषी ठहराया था. सुभाष ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुभाष के वकील ने अदालत में कहा कि घटना 25 फरवरी 1986 की थी, जबकि एफआईआर अगले दिन दर्ज कराई गई. बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि महिला के शरीर पर चोट के निशान नहीं थे और मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि करने वाला स्पष्ट सबूत नहीं मिला. वकील ने यह भी कहा कि महिला कई जिलों में गई, लेकिन उसने उस दौरान किसी से शिकायत नहीं की. इन दलीलों के हवाले से वकील ने कहा कि उस दिन महिला अपनी मर्जी से गई थी.
हाई कोर्ट ने मामले के सबूतों की जांच के बाद कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी भरोसा पैदा नहीं करती. गवाहों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट भी आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे.
महिला की गवाही का हवाला
राज्य सरकार के वकील ने सुभाष की अपील का विरोध किया. उन्होंने कहा कि महिला की गवाही भरोसेमंद थी और उसके बयान के आधार पर सजा बरकरार रखी जा सकती थी. हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के समय महिला की उम्र 19 साल से ज्यादा थी और इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह अपने फैसले को समझते हुए अपनी मर्जी से गई हो.
यह भी पढ़ें: BMW से लेकर लैंड क्रूजर तक... सचिन वाजे की लग्जरी कारों की लिस्ट देखकर बॉम्बे हाईकोर्ट भी हैरान
सुभाष को सरेंडर से भी छूट
हाई कोर्ट ने सुभाष को सभी आरोपों से बरी करते हुए कहा कि चूंकि वह मुकदमे के दौरान जमानत पर था, इसलिए उसे अब सरेंडर करने की जरूरत नहीं है. उसके जमानतदारों की जिम्मेदारी भी खत्म कर दी गई.
करीब 38 साल बाद आए इस फैसले में अदालत ने साफ किया कि किसी को दोषी ठहराने के लिए आरोपों के साथ ठोस सबूत भी जरूरी हैं. इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, इसलिए सुभाष को बरी कर दिया गया.
aajtak.in