बॉल लाइटिंग क्या है? वायरल होते रहते हैं इससे जुड़े फेक वीडियो

सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे वीडियो वायरल होते रहते हैं. जिसमें चमकता हुआ बिजली का गोला आसमान या जमीन पर दौड़ता दिखाई देता है. इसे दुर्लभ बॉल लाइटिंग की घटना बताकर शेयर किया जाता है. हकीकत में ये वीडियो एडिटेड या फेक होते हैं. ऐसे में जानते हैं कि असल में बॉल लाइटिंग की घटना क्या होती है?

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बॉल लाइटिंग की घटना बताकर वायरल होते रहते हैं फेक वीडियो (Photo - Instagram/@amansharma12013) बॉल लाइटिंग की घटना बताकर वायरल होते रहते हैं फेक वीडियो (Photo - Instagram/@amansharma12013)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:39 PM IST

आसमान में बिजली चमकते हुए तो आपने कई बार देखी होगी, लेकिन क्या आपने कभी हवा में तैरती हुई गोल आकार की चमकदार बिजली देखी है? इसे  बॉल लाइटिंग कहा जाता है. दावा किया जाता है कि यह गरज-चमक वाले तूफान के दौरान दिखाई दे सकती है और कुछ सेकेंड बाद अचानक गायब हो जाती है. इसका रंग नीला, नारंगी या पीला तक बताया गया है.

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बॉल लाइटिंग की कहानियां काफी पुरानी हैं. लेकिन सोशल मीडिया पर जब भी कोई चमकती हुई गेंद का वीडियो वायरल होता है, उसे बॉल लाइटिंग बताकर शेयर कर दिया जाता है. ऐसे ही एक वीडियो को लेकर भी काफी चर्चा हुई थी. देखने में यह बिल्कुल किसी रहस्यमयी प्राकृतिक घटना जैसा लगता है, लेकिन जांच में पता चला कि वीडियो असल नहीं, बल्कि CGI यानी कंप्यूटर से बनाया गया था.

क्या होती है बॉल लाइटिंग?
बॉल लाइटिंग को एक बेहद दुर्लभ और रहस्यमयी वायुमंडलीय घटना माना जाता है. इसमें आंधी-तूफान के दौरान एक चमकता हुआ गोल गोला दिखाई देने की रिपोर्ट सामने आई हैं. यह चमकती हुई गेंद कुछ सेकेंड तक हवा में तैरती हुई नजर आ सकती है और फिर अचानक गायब हो जाती है. इसके रंग को लेकर अलग-अलग रिपोर्ट हैं. कहीं इसे नीला, कहीं नारंगी और कहीं पीले रंग का बताया गया है.

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कुछ लोगों ने इसके साथ फुफकार जैसी आवाज सुनाई देने और अजीब या तेज गंध महसूस होने की भी बात कही है. हालांकि, बॉल लाइटिंग को लेकर वैज्ञानिकों के सामने अब भी कई सवाल हैं और इसके बनने की प्रक्रिया को पूरी तरह समझा नहीं जा सका है.

कैसे बनती है ये चमकती हुई गेंद?
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बॉल लाइटिंग को समझाने के लिए वैज्ञानिकों ने अलग-अलग सिद्धांत दिए हैं. इनमें से एक लोकप्रिय सिद्धांत बिजली के जमीन पर गिरने के बाद होने वाली रासायनिक प्रक्रिया से जुड़ा है.

इस सिद्धांत के मुताबिक, जब बिजली जमीन से टकराती है तो मिट्टी में मौजूद कुछ सिलिकेट मिनरल्स बेहद गर्म होकर वाष्पीकृत हो सकते हैं. मिट्टी में मौजूद कार्बन रासायनिक प्रतिक्रिया के जरिए इन सिलिकेट्स से ऑक्सीजन अलग कर सकता है.

इससे ऊर्जा से भरी सिलिकॉन गैस बन सकती है. इसके बाद सिलिकॉन के कण दोबारा जुड़कर बेहद छोटे नैनोकण या फिलामेंट बना सकते हैं. जब ये कण हवा में ऑक्सीजन के संपर्क में आते हैं तो रासायनिक प्रतिक्रिया के दौरान गर्मी निकल सकती है और चमक पैदा हो सकती है.हालांकि, यह बॉल लाइटिंग की एक प्रस्तावित व्याख्या है, इसे इस घटना का अंतिम और पूरी तरह सिद्ध कारण नहीं माना जाता.

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1638 में भी देखी गई थी ऐसी घटना!
बॉल लाइटिंग को लेकर चर्चाएं आज की नहीं हैं. इसकी सबसे पुरानी बताई जाने वाली घटनाओं में से एक साल 1638 की है. इंग्लैंड के एक चर्च में उस समय लोगों ने कथित तौर पर आग के एक बड़े गोले जैसी चीज देखी थी, जो खिड़की के रास्ते अंदर आई थी.

इस घटना को बॉल लाइटिंग से जुड़ी शुरुआती रिपोर्ट्स में गिना जाता है. हालांकि, सदियों पुरानी ऐसी घटनाओं को आज के वैज्ञानिक मानकों से दोबारा सत्यापित करना आसान नहीं है.

सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं फेक वीडियो 
अब आते हैं उस वीडियो पर, जिसने सोशल मीडिया पर खूब लोगों का ध्यान खींचा. वीडियो में रेलवे ट्रैक के पास पेड़ों के बीच से एक नीली चमकती हुई गेंद निकलती दिखाई देती है. यह गेंद हवा में तैरते हुए आगे बढ़ती है और इससे बिजली जैसी चमकदार धारियां निकलती नजर आती हैं.

इनमें से एक चमक पास के बिजली के खंभे से टकराती है और जोरदार स्पार्क दिखाई देता है.वीडियो देखने पर पहली नजर में ऐसा लगता है कि कैमरे में बॉल लाइटिंग की कोई दुर्लभ घटना कैद हो गई है. लेकिन मामला कुछ और निकला.

असल में ये CGI से बनाया गया वीडियो था. इस वीडियो की जांच के बाद पता चला कि यह कोई वास्तविक बॉल लाइटिंग नहीं थी. वीडियो को CGI यानी कंप्यूटर जनरेटेड इमेजरी की मदद से बनाया गया था.

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इसे आंद्रेई ट्रुखोनोवेट्स नाम के CGI आर्टिस्ट ने तैयार किया था, जो पूर्वी यूरोप के देश बेलारूस से हैं. इस वीडियो की पड़ताल कई एजेंसियों ने की. जिसमें बॉल लाइटिंग की ये घटना फेक साबित हुई. दिसंबर 2021 में ट्रुखोनोवेट्स  ने एक इंटरव्यू में बताया भी था कि उन्होंने यह वीडियो एडोब आफ्टर इफेक्ट की मदद से  बनाया था.

बाल लाइटिंग के वायरल वीडियो हैं फेक
उन्होंने यह भी बताया था कि वीडियो में दिखाई देने वाले रेलवे ट्रैक का फुटेज बेलारूस की राजधानी मिन्स्क के पास शूट किया गया था. यानी सोशल मीडिया पर जिस वीडियो को असली बॉल लाइटिंग बताकर शेयर किया जाता रहा, वह वास्तव में एक CGI आर्टवर्क था.

बॉल लाइटिंग को लेकर लोगों के अनुभव और रिपोर्ट जरूर मौजूद हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल होने वाला हर चमकता हुआ गोला असली बॉल लाइटिंग नहीं होता. खासकर CGI और वीडियो एडिटिंग तकनीक इतनी बेहतर हो चुकी है कि कंप्यूटर से बनाई गई चीज को असली घटना समझना आसान है. इसलिए किसी वीडियो में चमकती हुई गेंद देखकर तुरंत यह मान लेना सही नहीं है कि वह बॉल लाइटिंग ही है.

यह भी पढ़ें: फलों से लिपटे मिले 500 के नोटों के कतरन! वायरल हो रहा ये वीडियो

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बॉल लाइटिंग आज भी विज्ञान की दिलचस्प पहेलियों में से एक है, जबकि इसके नाम पर वायरल होने वाले कई वीडियो बाद में फेक या एडिटेड निकल चुके हैं. इसलिए अगली बार बॉल लाइटिंग की दुर्लभ घटना बताते हुए कोई वायरल वीडियो दिख जाए, तो समझ लें कि ये किसी आर्टिस्ट का कमाल है. 

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