'सिर्फ मेले में आता हूं, रोज 2000 कमा लेता हूं...' गुब्बारे बेचने वाले ने बताया कमाई का सिस्टम

मेला में गुब्बारा बेचने वाले लोग सालभर सिर्फ यही काम करते हैं. लेकिन, ये सड़क के किनारे बैलून नहीं बेचते, सिर्फ मेला में ही अपनी चलती- फिरती दुकान लगाते हैं. ऐसे ही एक गुब्बारे वाले ने बातचीत में अपनी कमाई का पूरा सिस्टम बताया. साथ ही इस काम में होने वाली परेशानियों से वाकिफ कराया.

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मेला में गुब्बारा बेचने वाले ने बताया अपनी कमाई का सिस्टम (Photo - ITG) मेला में गुब्बारा बेचने वाले ने बताया अपनी कमाई का सिस्टम (Photo - ITG)

सिद्धार्थ भदौरिया

  • नई दिल्ली,
  • 16 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 4:20 PM IST

इन दिनों नवरात्रि, दशहरा और राम लीला के कई मेले जगह- जगह लगे हैं. यहां बड़े- बड़े झूले, खिलौने और झुमकों के दुकान, निशाना लगाने वाले, चाट- पकौड़े और छोला भटुरा बेचने वालों के ढेर सारे दुकान लगे होते हैं. इन सबके बीच मेले में घूम- घूमकर गुब्बारा बेचते कई लोग दिख जाएंगे. 

जब ये गुब्बारे वाले हमारे पास आकर एक खरीद लेने की रिक्वेस्ट करते हैं तो कई बार हम इग्नोर करके आगे बढ़ जाते हैं. हमें बस यही लगता है कि मेला लगा है तो गुब्बारे वाले भी जमा हो गए हैं. भीड़ देखी तो कमाई के लिए 10- 20 बैलून लेकर आ गए. हम इनके बारे में जो कुछ भी इतनी आसानी से सोच लेते है.  ये गुब्बारा बेचना उतना आसान काम नहीं होता है. 

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हां, मेले में भीड़ होती है, तो कमाई के लिहाज से ही लोगों को देखकर बैलून बेचने आते हैं.  लेकिन, मेला ग्राउंड में घुस जाना आसान नहीं होता है. इसके लिए इन्हें भारी- भरकम रकम चुकानी होती है. तब जाकर ये मेला परिसर में घूम- घूमकर गुब्बारे बेच पाते हैं. अगर ये ग्राउंड से बाहर भी हैं, फिर भी आराम से गुब्बारे नहीं बेच सकते.  बाहर भी पुलिस वाले या मेला ऑर्गनाइजर या स्थानीय बाजार समिति को 400 से 500 रुपये देने होते हैं. 

क्यों पीछे पड़ जाते हैं गुब्बारे वाले?
यही वजह है कि मेला जाने पर अगर साथ में छोटे बच्चे हैं तो गुब्बारे वाले पीछे पड़ जाते हैं. नोएडा स्टेडियम  में इन दिनों रामलीला मेला लगा हुआ है. दोपहर 1 बजे के करीब   स्टेडियम के बाहर एक शख्स दिखाई दिया जो एक छोटे से तंबू में बैठकर गुब्बारे में हवा भर रहा था. अभी मेला शुरू होने में काफी वक्त था. क्योंकि, मेला करीब 5 बजे से परवान चढ़ता है.   उसे देखकर मेरे मन में कुछ सवाल आए, मैंने पूछा भाई आप क्या शाम में ग्राउंड के अंदर गुब्बारे बेचते हो. उसका जवाब था - नहीं. 

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फिर, कुछ उत्सुकता हुई तो मैंने उसका नाम पूछा. उसने अपना नाम ब्रजमोहन बताया. वह संभल का रहने वाला है और यहां गुब्बारा बेचने आया है. मैंने पूछा इतनी दूर से सिर्फ गुब्बारा बेचने आए हो? इस पर ब्रजमोहन ने गुब्बारा बेचने का पूरा अंकगणित समझाया. उसने बताया कि वह सिर्फ मेले में ही गुब्बारा बेचता है. मेरठ, बुलंदशहर, संभल, अलीगढ़, दिल्ली, नोएडा जैसी जगहों पर हमेशा कोई न कोई मेला लगा रहता है.

मेला के अंदर बेचने की नहीं मिलती परमिशन
ब्रजमोहन ने बताया मैं मेला में गुब्बारा जरूर बेचता हूं, लेकिन कई बार मेला परिसर के बाहर रहकर काम करना पड़ता है. क्योंकि, अंदर ग्राउंड में या मेला परिसर में गुब्बारा बेचने के लिए अच्छा- खासा कमीशन देना पड़ता है. उसने बताया कि नोएडा स्टेडियम के अंदर भी गुब्बारा बेचने के लिए एक दिन का कमीशन 1500 रुपये देना पड़ता है. इसलिए वह बाहर ही अपनी दुकान लगा लेता है. बाहर कुछ लोग हैं, जो सिर्फ 300 रुपया लेकर दुकान लगाने दे देते हैं. 

ब्रजमोहन ने बताया कि वह शाम में गुब्बारा बेचने के लिए दिनभर गुब्बारे में हवा भरता है. फिर उसे सजाता है. तब तक शाम हो जाती है. उसके बाद वह मेला परिसर के बाहर रोड के किनारे 10- 11 बजे रात तक यानी जबतक लोग आते जाते रहते है गुब्बारे बेचता है. वह एक जोड़ा वाला गुब्बारा 50 रुपये की बेचता है. साथ में 20 से 100 रुपये तक के छोटे खिलौने भी रखे हुए हैं. लगे हाथ उसे भी सेल कर देता है. 

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हर दिन कितनी हो जाती है कमाई?
ब्रजमोहन के मुताबिक, एक दिन में करीब 1000 से 1500 रुपये का गुब्बारा वह मेले में बेच लेता है. कभी- कभी दिन अच्छा होता है तो 2000 से 2500 रुपये तक के गुब्बारे बिक जाते हैं. कभी 500 रुपये का आंकड़ा भी नहीं पहुंच पाता है. ऐसे में मेला परिसर के अंदर अगर बेचने जाएं तो पूरे कमाई कमेटी या ठेकेदार को दे देनी पड़ेगी. इसलिए हमलोग मेला ग्राउंड से बाहर गुब्बारा बेचते हैं. 

इसलिए अब अगली बार किसी मेले की गेट पर कोई गुब्बारा बेचने वाला मिल जाए, तो समझ लेना चाहिए कि यहां तक आने में उसे कितनी मेहनत लगी है. इसलिए वह हमारा रास्ता रोककर एक गुब्बार खरीदन लेने की रिक्वेस्ट कर रहा है. क्योंकि, हम मेले में जा रहे हैं, इसलिए वह भी वहां पैसे देकर गुब्बारा बेचने के लिए खड़ा है.  

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