जिंदगी में आखिर क्या ज्यादा जरूरी है-पैसा या उसे कमाने के बाद जिंदगी जीने के लिए वक्त? एक टेकी के सामने इन दिनों यही सवाल खड़ा है. उनके पास दो ऑप्शन हैं-एक तरफ 57 लाख रुपये की नौकरी, जिसमें घर से काम करते हुए परिवार और खुद के लिए ज्यादा वक्त है. दूसरी तरफ करीब 84 लाख रुपये का पैकेज, लेकिन इसके लिए हर हफ्ते बेंगलुरु का सफर करना होगा. ये स
अभी मदुरै से कर रहे हैं पूरी तरह रिमोट काम
टेकी के मुताबिक, वह फिलहाल एक मुनाफे में चल रहे अमेरिकी सीरीज-एफ स्टार्टअप में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. उनकी मौजूदा जॉब में 57 लाख रुपये की बेस सैलरी है और कोई बोनस नहीं मिलता. वह मदुरै से पूरी तरह घर से काम करते हैं और हर महीने करीब 3.24 लाख रुपये टेक-होम सैलरी पाते हैं.
अब उन्हें एक बड़ी अमेरिकी सॉफ्टवेयर कंपनी से स्टाफ सॉफ्टवेयर इंजीनियर का ऑफर मिला है. इसमें 62 लाख रुपये की बेस सैलरी के अलावा 6.2 लाख रुपये का टारगेट बोनस और करीब 50,000 डॉलर यानी लगभग 48 लाख रुपये के आरएसयू तीन साल में मिलने हैं.इस ऑफर के साथ उनका मासिक टेक-होम करीब 3.76 लाख रुपये बताया गया है.
ज्यादा सैलरी के साथ आया बड़ा पेंच
नई नौकरी में एक शर्त है. टेकी को बेंगलुरु के बेलंदूर स्थित ऑफिस से हफ्ते में दो दिन काम करना होगा.यहीं से पूरा मामला दिलचस्प हो गया.
टेकी बेंगलुरु में शिफ्ट होने के बजाय अपना फैमिली बेस मदुरै में ही रखना चाहते हैं. उनका प्लान है कि हर सोमवार रात ओवरनाइट ट्रेन लेकर बेंगलुरु जाएं. मंगलवार और बुधवार ऑफिस से काम करें और बुधवार रात फिर ट्रेन से मदुरै लौट आएं.उनके हिसाब से साल में करीब 40 राउंड ट्रिप होंगी और हर हफ्ते लगभग 20 घंटे ट्रेन में गुजरेंगे.
सवाल सैलरी का नहीं, जिंदगी पर असर का है
रेडिट पर अपनी परेशानी बताते हुए टेकी ने पूछा कि क्या एक-दो साल तक ऐसा सफर उनकी सेहत और काम करने की क्षमता पर असर डालेगा.उनकी सबसे बड़ी चिंता नींद को लेकर है. लगातार रात की ट्रेन यात्रा के कारण नींद का पैटर्न बिगड़ने की आशंका उन्हें परेशान कर रही है.
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रेडिट पर भी बंट गई लोगों की राय
टेकी के सवाल पर रेडिट यूजर्स की राय एक जैसी नहीं रही.कुछ लोगों ने साप्ताहिक सफर को बेहद थकाऊ बताया. एक यूजर ने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि हफ्ते में दो दिन ऑफिस जाने के लिए लंबा सफर करने से काम के अलावा किसी और चीज के लिए ऊर्जा नहीं बचती.एक अन्य यूजर ने रात की ट्रेन से हर हफ्ते आने-जाने को सेहत और मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं बताया.
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कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि बेंगलुरु में हर हफ्ते दो दिन रहने पर ट्रेन टिकट के अलावा रहने और खाने का खर्च भी जुड़ जाएगा. उनके मुताबिक, सैलरी में दिखने वाला अंतर यात्रा और दूसरे खर्चों के बाद उतना बड़ा नहीं रह सकता.
हालांकि, कुछ रेडिट यूजर्स ने दूसरी तस्वीर भी रखी. उनका कहना था कि सैलरी का अंतर काफी बड़ा है और अगर सफर कुछ समय के लिए संभाला जा सकता है, तो बेंगलुरु वाला ऑफर भी विचार करने लायक है.
एक यूजर ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि वह भी दूसरे शहर से बेंगलुरु की नौकरी के लिए लंबे समय तक सफर कर चुका है. उसके मुताबिक यह थकाने वाला जरूर था, लेकिन करीब एक साल तक इसे संभाला जा सकता है.
अब असली सवाल 84 लाख रुपये का नहीं...
इस पूरे मामले में दिलचस्प बात सिर्फ 57 लाख रुपये और 84 लाख रुपये के बीच का अंतर नहीं है. असली सवाल यह है कि ज्यादा पैकेज के बदले हर हफ्ते करीब 20 घंटे का सफर किसी की लाइफस्टाइल, नींद और खाली समय को कितना बदल सकता है.
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