'धुरंधर' में दिखा पाकिस्तान का खौफनाक ल्यारी, रूह कंपा देने वाला है खूनी इतिहास

फिल्म 'धुरंधर' के ट्रेलर ने एक बार फिर ल्यारी की उस तस्वीर को जिंदा कर दिया है, जिसे कभी कराची का सबसे खौफनाक इलाका माना जाता था. लेकिन क्या वाकई ल्यारी सिर्फ वही है, जो फिल्मों में दिखाया जाता है? या हकीकत इससे कहीं ज्यादा गहरी है.

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कराची की वो रूह जिसे 'पाकिस्तान का ब्राजील' कहा जाता है (Image: Trailer screengrab/JioStudios) कराची की वो रूह जिसे 'पाकिस्तान का ब्राजील' कहा जाता है (Image: Trailer screengrab/JioStudios)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 03 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:28 PM IST

फिल्म 'धुरंधर 2' के टीज़र ने एक बार फिर पाकिस्तान के ल्यारी को सुर्खियों में ला दिया है. टीज़र में दिखाई गई गोलियों की गूंज, गैंगवार का खौफ और उज़ैर बलोच व बाबा लाडला जैसे किरदारों की झलक उस दौर की याद दिलाती है, जब ल्यारी की तंग गलियां पुलिस के लिए भी 'नो-गो ज़ोन' बन गई थीं लेकिन क्या ल्यारी का वजूद सिर्फ अपराध और हिंसा तक सीमित है. ल्यारी को अक्सर 'पाकिस्तान का लिटिल ब्राजील' कहा जाता है.

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यहां की धूल भरी गलियों में बच्चों के पैरों में जूते हों न हों, लेकिन उनके पास फुटबॉल जरूर होता है.  यहां की रगों में फुटबॉल दौड़ता है और इसी मिट्टी ने पाकिस्तान को उसके कई बेहतरीन खिलाड़ी दिए हैं. अपराध की परछाई से दूर, ल्यारी मुक्केबाजों और सूफी गायकों की नर्सरी रही है. यहां की 'स्ट्रीट वाइब' इतनी सशक्त है कि यहां के रैपर्स और कलाकारों की कला आज न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर तक अपनी धमक पहुंचा चुकी है. यह इलाका कराची की सांस्कृतिक रूह है.

वहां के नौजवान बंदूकों को पीछे छोड़कर हिप-हॉप संगीत और फुटबॉल के जरिए एक नई इबारत लिख रहे हैं. जिन टॉर्चर सेल्स में कभी चीखें गूंजती थीं, आज वहां लाइब्रेरी और कैफे खुल चुके हैं जहां अमन की बातें होती हैं.  आखिर क्या है ल्यारी का इतिहास और कैसे इस ऐतिहासिक इलाके ने खौफनाक गैंगवार से निकलकर सुनहरे सपनों की तरफ कदम बढ़ाया है.

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कराची की कोख से निकला ल्यारी

इतिहास के पन्नों को पलटे तो ल्यारी कराची के सबसे पुराने बाशिंदों का घर है. 1729 में जब कराची का नक्शा बन रहा था, तब ल्यारी नदी के किनारे सिंधी मछुआरे और बलूच खानाबदोशों ने यहां अपना ठिकाना बनाया. 19वीं सदी आते-आते ये इलाका मजदूरों का केंद्र बन गया. डॉक वर्कर्स, ट्रक ड्राइवर्स और मेहनतकश लोगों की इस बस्ती में एक ऐसी संस्कृति पनपी, जिसमें भाईचारा और सादगी थी. 1890 की जनगणना बताती है कि यहां की आबादी तब भी सघन थी. ये वो ल्यारी है जिसने कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना की बीमारी के दौर में उनकी कार रुकने पर बेमिसाल खिदमत की थी.

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पाकिस्तान का मिनी ब्राजील

ल्यारी की असली पहचान खेल रहे हैं. यहां के बच्चे बहुत कम उम्र में मैदान से जुड़ जाते हैं और फुटबॉल उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है. इस इलाके ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज और बेहतरीन फुटबॉलर दिए हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से पहचान बनाई. वर्ल्ड कप के दिनों में यहां की गलियां किसी लैटिन अमेरिकी शहर जैसी दिखने लगती हैं दीवारों पर दिग्गज खिलाड़ियों की तस्वीरें, झंडों से सजी गलियां और हर मोड़ पर फुटबॉल की चर्चा. लेकिन इस खेल दीवानगी पर भी एक दौर में हिंसा की परछाईं पड़ गई. कहा जाता है कि जब गैंगवार अपने चरम पर था, तब खेल के मैदान भी सुरक्षित नहीं रहे. कई जगह धमाकों की घटनाओं के बाद फुटबॉल अकादमियां सूनी हो गईं और बच्चों का मैदान से रिश्ता टूटने लगा.

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गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसा खौफनाक मंजर (Image: Reuters)

जब ल्यारी बना नो-गो जोन
 
साल 2000 के बाद ल्यारी का वो काला अध्याय शुरू हुआ जिसे 'गैंगवार' कहा जाता है. रहमान डकैत और पीपुल्स अमन कमेटी (PAC) ने यहां अपनी समानांतर सरकार चलानी शुरू कर दी. सियासतदानों के संरक्षण और ड्रग्स के काले कारोबार ने ल्यारी को दो हिस्सों में बांट दिया. कलरी और शाह बेग लाइन जैसी सीमाओं पर बंकर बन गए. हर गली का अपना हीरो यानी गैंगस्टर था. हालात इतने बदतर थे कि ल्यारी के नौजवानों को बाहर नौकरी नहीं मिलती थी और उनके पते को ही अपराध का सर्टिफिकेट मान लिया जाता था.

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फिल्म धुरंधर बनाम ल्यारी की मौजूदा हकीकत

अक्सर फिल्मों में अपराध को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि ल्यारी उस 'ब्लैक एरा' से अब काफी आगे निकल चुका है. एक दौर में यहां 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की तरह ही जुर्म का भयावह मंजर रहा है, जिससे इस इलाके की छवि दुनिया भर में खराब हुई. हालांकि, अब तस्वीर बदल रही है. आज यहां गर्ल्स कैफे जैसे संस्थान खुल चुके हैं, जहां लड़कियां न सिर्फ फुटबॉल के मैदान में उतर रही हैं बल्कि समाज में अपनी नई पहचान बनाने के लिए संघर्ष भी कर रही हैं. साल 2012 के कड़े सुरक्षा ऑपरेशन के बाद अपराधियों का सफाया किया गया, जिसके बाद यहां की फिजाओं में धीरे-धीरे अमन लौटा है.

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आज भी ल्यारी में गरीबी है, सड़कों और पानी की समस्या है, लेकिन वहां अब पहचान का संकट खत्म हो रहा है. दीवारों पर गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं, लेकिन उन निशानों के ऊपर अब कलाकारों ने रंग भर दिए हैं. ल्यारी के नौजवानों ने साबित कर दिया है कि किसी इलाके को पहले अपनाना पड़ता है, उसकी कमियों को गले लगाना पड़ता है, तभी उसकी पहचान बदली जा सकती है. आज का ल्यारी 'धुरंधर' फिल्म वाला ल्यारी नहीं है.

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