भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे बल्लेबाज हुए, जिन्होंने अपनी तकनीक और शानदार प्रदर्शन से दुनिया को प्रभावित किया. विजय मर्चेंट ऐसे ही दिग्गज क्रिकेटर थे, जिन्हें भारत के महान बल्लेबाजों में गिना जाता है. उनकी बल्लेबाजी में बेहतरीन फुटवर्क, सटीक टाइमिंग और तकनीकी दक्षता का अनूठा संगम था. महज 5 फीट 7 इंच लंबे मर्चेंट ने अपने खेल से ऐसा मुकाम हासिल किया कि उनकी तुलना महान बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन के बाद आने वाले सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में की जाने लगी.
विजय मर्चेंट का जन्म 12 अक्टूबर 1911 को बॉम्बे (अब मुंबई) में एक संपन्न परिवार में हुआ था. उनका पूरा नाम विजय माधवजी मर्चेंट था. कॉलेज क्रिकेट में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया था. महज 15 साल की उम्र में एक मैच में दो शतक जड़कर उन्होंने क्रिकेट जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा. आगे चलकर वह घरेलू क्रिकेट के सबसे प्रभावशाली बल्लेबाजों में शामिल हो गए.
एवरेज के मामले में ब्रैडमैन को दी टक्कर
विजय मर्चेंट के आंकड़े उनकी असाधारण बल्लेबाजी की गवाही देते हैं. फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उन्होंने 71.64 की औसत से रन बनाए. फर्स्ट क्लास क्रिकेट में इससे बेहतर एवरेज (मिनिमम 50 इनिंग्स) केवल डॉन ब्रैडमैन (95.14) का रहा. रणजी ट्रॉफी में उनका प्रदर्शन और भी शानदार रहा. उन्होंने 47 पारियों में 16 शतक की मदद से 3,639 रन बनाए और उनका औसत 98.75 रहा.
विजय मर्चेंट ने अपने 150 मैचों के फर्स्ट क्लास करियर में 13470 रन बनाए और 45 शतक लगाए. इनमें 11 दोहरे शतक शामिल थे. उनका सबसे बड़ा स्कोर नाबाद 359 रन रहा, जो उन्होंने 1943-44 में महाराष्ट्र के खिलाफ बॉम्बे में बनाया था. यह पारी करीब 10 घंटे 45 मिनट तक चली. इस दौरान उन्होंने रूसी मोदी के साथ छठे विकेट के लिए 371 रन और आरएस कूपर के साथ आठवें विकेट के लिए 210 रनों की साझेदारी की.
उनकी बल्लेबाजी शैली बेहद आकर्षक थी. शानदार कट शॉट, गेंद को जमीन के साथ खेलते हुए ड्राइव, नजाकत भरा ग्लांस और लेट कट उनके पसंदीदा शॉट्स में शामिल थे. शुरुआती दिनों में उन्हें औपचारिक कोचिंग नहीं मिली, लेकिन उन्होंने अपने खेल को लगातार निखारा. वह अपनी बल्लेबाजी की फिल्में बनवाते और बाद में उन्हें ध्यान से देखकर गलतियों को सुधारने की कोशिश करते थे.
इंग्लैंड में जमकर काटा गदर
विजय मर्चेंट ने 1936 में पहली बार इंग्लैंड का दौरा किया और वहां फर्स्ट क्लास मैचो में 1745 रन बनाए. इस दौरान उनका औसत 51.32 रहा और वह भारत की ओर से सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज रहे. मैनचेस्टर टेस्ट में उन्होंने मुश्ताक अली के साथ पहले विकेट के लिए 203 रन की शानदार साझेदारी की. मर्चेंट ने इस मुकाबले में 114 और मुश्ताक अली ने 112 रन बनाए. उनके इस प्रदर्शन ने इंग्लैंड के दिग्गज क्रिकेटर सीबी फ्राई को भी प्रभावित किया.
सीबी फ्राई ने उनकी बल्लेबाजी की तारीफ करते हुए कहा था, 'आइए, इन्हें गोरा रंग दें और ऑस्ट्रेलिया में ओपनर के तौर पर अपने साथ ले चलें.' यह टिप्पणी विजय मर्चेंट की बल्लेबाजी क्षमता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव को दर्शाती है. 1946 में इंग्लैंड के दूसरे दौरे पर भी विजय मर्चेंट का बल्ला खूब चला. उन्होंने उस दौरे पर 2385 रन बनाए और उनका औसत करीब 74 रहा. इस दौरान उन्होंने सात शतक लगाए. बारिश से प्रभावित इंग्लिश समर में लगातार रन बनाना उनकी तकनीक, धैर्य और एकाग्रता का प्रमाण था.
विजय मर्चेंट का टेस्ट करियर उनके घरेलू और फर्स्ट क्लास रिकॉर्ड जितना लंबा नहीं रहा. उन्होंने 1933 से 1951-52 के बीच भारत के लिए सिर्फ 10 टेस्ट मैच खेले. ये सभी मुकाबले इंग्लैंड के खिलाफ थे. इन मैचों में उन्होंने 859 रन बनाए और उनका औसत 47.72 रहा. उनके नाम पर तीन टेस्ट शतक दर्ज हैं. 1951-52 में दिल्ली में इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने अपना सर्वोच्च टेस्ट स्कोर (154 रन) बनाया.
इस पारी में उन्होंने भारतीय कप्तान विजय हजारे के साथ तीसरे विकेट के लिए 211 रन की साझेदारी की. यह उनके टेस्ट करियर का आखिरी शतक भी साबित हुआ. मर्चेंट को अपने करियर में कई बार खराब स्वास्थ्य के कारण महत्वपूर्ण दौरों से बाहर रहना पड़ा. आखिरकार फील्डिंग के दौरान डाइव लगाते हुए उनके कंधे में चोट लग गई, जिसके बाद उन्हें क्रिकेट से संन्यास लेना पड़ा. उस समय उनकी उम्र करीब 40 साल थी.
क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद विजय मर्चेंट ने प्रशासक, लेखक और प्रसारक के तौर पर भारतीय क्रिकेट में योगदान दिया. वह टेस्ट चयनकर्ता भी रहे और भारतीय टीम की कप्तानी से जुड़े फैसलों में उनकी अहम भूमिका रही. क्रिकेट के बाहर वह दिव्यांग लोगों के कल्याण से जुड़े सामाजिक कार्यों के लिए भी सम्मानित थे. 27 अक्टूबर 1987 को बॉम्बे में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. वह 76 वर्ष के थे.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क