3-0 की बढ़त का सत्यानाश, टीम की सरेआम फजीहत... फिर भी गंभीर को नहीं चुभी लगातार दो हार?

न्यूजीलैंड के खिलाफ पांच मैचों की टी20 सीरीज में 3-0 की अजेय बढ़त बनाने के बाद टीम इंडिया ने आखिरी दो मुकाबले गंवा दिए. लगातार दो हार के साथ टीम की कमजोरियां भी उजागर हुईं, लेकिन हेड कोच गौतम गंभीर की ड्रेसिंग रूम स्पीच में हार की चुभन से ज्यादा खिलाड़ियों की तारीफ सुनाई दी. आखिर इस प्रदर्शन पर गंभीर की शाबाशी के क्या मायने हैं?

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टीम की खामियां कौन सुधारेगा? (Screengrab: Instagram@indiancricketteam) टीम की खामियां कौन सुधारेगा? (Screengrab: Instagram@indiancricketteam)

विश्व मोहन मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 03 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:30 AM IST

गौतम गंभीर की कोचिंग में टीम इंडिया का अजीब ही गणित दिख रहा है. तीन मैच जीते तो वाहवाही, लगातार दो मैच गंवाए तो भी खिलाड़ियों की पीठ थपथपाई गई. न्यूजीलैंड ने भारतीय गेंदबाजी की कलई खोल दी, बल्लेबाजी के प्रयोगों पर सवाल खड़े हो गए, लेकिन कोच की ड्रेसिंग रूम स्पीच में गलतियों का हिसाब नहीं, सिर्फ तारीफ सुनाई दी. क्या इसी अंदाज में वर्ल्ड कप की तैयारी होगी?

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गौतम गंभीर की कोचिंग में टीम इंडिया को आक्रामक क्रिकेट खेलना है. निडर होकर खेलना है. किसी भी विरोधी से डरना नहीं है. लेकिन न्यूजीलैंड के खिलाफ पांच मैचों की टी20 सीरीज के आखिरी दो मुकाबलों ने एक अलग ही तस्वीर पेश कर दी. भारत ने सीरीज में 3-0 की अजेय बढ़त बना ली थी. लग रहा था कि न्यूजीलैंड के पास भारतीय टीम के सामने टिकने का कोई रास्ता नहीं है. फिर अचानक कहानी पलट गई. न्यूजीलैंड ने लगातार दो मैच जीतकर सीरीज का अंतर 3-2 कर दिया.

टीम इंडिया सीरीज जीत गई, लेकिन क्या इस प्रदर्शन को लेकर सीना चौड़ा किया जा सकता है? तीन मैच जीतने के बाद लगातार दो मुकाबले गंवाना और उसमें भी जिस तरह टीम की कमजोरियां उजागर हुईं, वह जश्न मनाने से ज्यादा आत्ममंथन का मौका था. मगर हैमिल्टन में गंभीर की ड्रेसिंग रूम स्पीच सुनकर लगा कि जैसे टीम कोई ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करके लौटी हो.

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गंभीर ने खिलाड़ियों से कहा कि उन्हें अपने प्रयास पर गर्व होना चाहिए. उन्होंने न्यूजीलैंड के घर में सीरीज जीतने को बड़ी उपलब्धि बताया और खिलाड़ियों से सिर ऊंचा करके लौटने को कहा. सवाल यह नहीं है कि कोच खिलाड़ियों का हौसला क्यों बढ़ा रहे हैं. यह तो उनकी जिम्मेदारी है.

असली सवाल है कि लगातार दो हार के बाद उन्हें टीम की गलतियों पर बात करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई? क्या खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने के लिए हार की कड़वी सच्चाई को किनारे रखना जरूरी है?

तीन जीत का जश्न, दो हार का हिसाब गायब!

सीरीज का स्कोर 3-2 है, लेकिन इसे सिर्फ जीत के चश्मे से देखना सबसे बड़ी गलती होगी. भारत ने 3-0 की बढ़त बनाई थी. इसके बाद न्यूजीलैंड ने लगातार दो मैच जीतकर भारतीय टीम की रणनीति की परीक्षा ली और भारत उसमें लड़खड़ा गया. चौथे टी20 में न्यूजीलैंड ने 260 रन ठोक दिए. ग्लेन फिलिप्स ने 49 गेंदों पर 107 रन बनाकर भारतीय गेंदबाजी की धज्जियां उड़ा दीं. जवाब में भारतीय बल्लेबाजी भी बुरी तरह बिखरी और टीम 87 रनों से मुकाबला हार गई. पांचवें मैच में भी न्यूजीलैंड ने सात विकेट से जीत दर्ज की.

अब जरा सोचिए. जिस टीम को सीरीज में 3-0 की बढ़त हासिल थी, वह अचानक लगातार दो मुकाबले कैसे हार गई? क्या न्यूजीलैंड ने भारतीय टीम की कमजोरियां पकड़ ली थीं? क्या गेंदबाजों के पास विपक्षी बल्लेबाजों को रोकने का कोई दूसरा प्लान नहीं था? क्या बल्लेबाजी क्रम को लेकर टीम प्रबंधन खुद ही उलझा हुआ था?

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इन सवालों का जवाब ढूंढना जरूरी था. लेकिन गंभीर की स्पीच में इन सवालों की जगह खिलाड़ियों के प्रयास की तारीफ ने ले ली. जीत का मतलब सिर्फ ट्रॉफी उठाना नहीं होता. जीत के बाद भी यह देखना पड़ता है कि टीम कहां कमजोर है. वरना अगली बार यही कमजोरियां बड़ी कीमत वसूल सकती हैं.

गेंदबाज पिटे, रन लुटे... कोच की जवाबदेही कौन तय करेगा?

टीम इंडिया की बल्लेबाजी में धमाका करने वाले खिलाड़ियों की कमी नहीं है. अभिषेक शर्मा, संजू सैमसन, ईशान किशन जैसे बल्लेबाज बड़े स्कोर खड़े कर सकते हैं. लेकिन टी20 क्रिकेट सिर्फ छक्कों और चौकों से नहीं जीता जाता. अगर गेंदबाज हर दूसरे मुकाबले में विपक्षी बल्लेबाजों को खुलकर खेलने का मौका देंगे तो बल्लेबाजों के लिए भी हर बार चमत्कार करना संभव नहीं होगा.

न्यूजीलैंड के खिलाफ आखिरी दो मैचों में भारतीय गेंदबाजी की कमजोरियां खुलकर सामने आईं. चौथे मुकाबले में 259 रन लुटाना किसी भी लिहाज से सामान्य बात नहीं है. फिलिप्स ने भारतीय आक्रमण को जिस तरह निशाना बनाया, उससे साफ था कि टीम के पास उन्हें रोकने की ठोस योजना नहीं थी. गेंदबाजों की लाइन-लेंथ बिगड़ी, रन रोकने का दबाव नहीं बना और न्यूजीलैंड ने मैदान के हर हिस्से में रन बटोरे.

सवाल है कि क्या टीम प्रबंधन इस प्रदर्शन से संतुष्ट है? क्या गेंदबाजी कोच और हेड कोच ने इस पर गंभीर समीक्षा की है? क्या डेथ ओवरों की रणनीति पर काम होगा? सिर्फ खिलाड़ियों को फिट रहने की सलाह देने से गेंदबाजी की ये कमजोरियां दूर नहीं होने वालीं.

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वैभव की छुट्टी, टॉप ऑर्डर में खिचड़ी... गंभीर का प्लान क्या है?

गंभीर की कोचिंग में टीम के बल्लेबाजी संयोजन को लेकर भी कई सवाल हैं. भारत के पास अभिषेक शर्मा, संजू सैमसन, ईशान किशन और वैभव सूर्यवंशी जैसे विकल्प हैं. लेकिन इन विकल्पों के बीच टीम प्रबंधन अपनी प्राथमिकताएं साफ करता नहीं दिखा.

वैभव को शुरुआती मैचों में मौका मिला, फिर उन्हें बाहर बैठना पड़ा. ईशान की वापसी के बाद टीम का समीकरण फिर बदला. यहां सवाल यह नहीं है कि वैभव को हर मैच में खिलाया जाना चाहिए था या नहीं. सवाल यह है कि आखिर टीम का फिक्स टॉप ऑर्डर कौन-सा है? किस खिलाड़ी की भूमिका क्या है? किसे किस नंबर पर उतरना है?

एक तरफ टीम में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की भरमार है, दूसरी तरफ संयोजन को लेकर प्रयोग जारी हैं. गंभीर को समझना होगा कि हर सीरीज को प्रयोगशाला बनाकर टीम तैयार नहीं की जा सकती. खिलाड़ियों को यह पता होना चाहिए कि वे टीम में किस भूमिका के लिए चुने गए हैं. लगातार बदलती योजनाएं खिलाड़ियों के आत्मविश्वास और टीम के तालमेल दोनों को प्रभावित कर सकती हैं.

दूसरी टीमों को टोन सेट करने की नसीहत, अपनी टीम का क्या?

गंभीर की स्पीच का एक और हिस्सा ध्यान खींचता है. उन्होंने कहा कि भारतीय टी20 टीम ने पूरे दौरे का टोन सेट कर दिया है और अब वनडे तथा टेस्ट टीमों की जिम्मेदारी है कि वे इसे आगे बढ़ाएं.

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यहां गंभीर से एक सवाल बनता है. आखिर यह कैसा टोन सेट किया गया है? क्या 3-0 की बढ़त बनाकर आखिरी दो मैच गंवाना वह मिसाल है जिसे बाकी टीमें आगे बढ़ाएं? क्या गेंदबाजों का 259 रन लुटाना और फिर बल्लेबाजों का लक्ष्य से 87 रनों दूर रह जाना टीम के लिए कोई आदर्श प्रदर्शन है?

बेशक, सीरीज जीतना बड़ी बात है. लेकिन जीत के साथ कमजोरियां भी सामने आई हैं. गंभीर को बाकी टीमों को संदेश देने से पहले अपनी टी20 टीम की कमियों पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए. दूसरों के लिए मानक तय करने से पहले अपनी टीम को उस मानक पर खरा उतारना जरूरी है.

एक महीने का ब्रेक, लेकिन तैयारी किस बात की होगी?

गंभीर ने खिलाड़ियों को एक महीने के ब्रेक में फिट रहने और श्रीलंका के खिलाफ अगली टी20 सीरीज की तैयारी करने को कहा है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत को ज्यादा टी20 मुकाबले खेलने का मौका नहीं मिलेगा. श्रीलंका के खिलाफ 22 से 27 दिसंबर तक तीन मैचों की सीरीज होनी है.

यहां भी सवाल गंभीर की योजना को लेकर है. जब मुकाबले कम हैं तो टीम का संयोजन तय करने की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. बल्लेबाजी क्रम की उलझन दूर करनी होगी. गेंदबाजों की कमजोरियों पर काम करना होगा. खिलाड़ियों की भूमिकाएं तय करनी होंगी. क्या इस ब्रेक में इन सभी सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे या फिर अगली सीरीज में एक बार फिर नए प्रयोग शुरू होंगे?

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श्रीलंका को हल्के में न लेने की गंभीर की नसीहत बिल्कुल सही है. लेकिन न्यूजीलैंड के खिलाफ जो हुआ, उससे सबसे बड़ा सबक यह होना चाहिए कि अपनी ताकत के साथ अपनी कमजोरियों को भी पहचानना पड़ेगा. विपक्षी को हल्के में लेने से बचने की सलाह देने से पहले अपनी टीम को आत्ममुग्धता से बचाना भी जरूरी है.

कोच साहब, तारीफ के साथ जवाबदेही भी तय कीजिए!

गंभीर को यह समझना होगा कि खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने और उनकी गलतियों पर सवाल उठाने में कोई टकराव नहीं है. एक अच्छा कोच वही है जो जीत के बाद खिलाड़ियों को जमीन पर रखे और हार के बाद उन्हें अपनी गलतियों का एहसास कराए. सिर्फ प्रेरक भाषणों से टीम की कमजोरियां दूर नहीं होतीं. उसके लिए रणनीति, सही चयन और जवाबदेही की जरूरत होती है.

भारत ने न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज जरूर जीत ली, लेकिन आखिरी दो मैचों ने गंभीर के सामने कई सवाल छोड़ दिए हैं. गेंदबाजी की कमजोरी, बल्लेबाजी क्रम की उलझन और दबाव में बिखरने की आदत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वर्ल्ड कप की तैयारी के नाम पर इन सवालों को टालना और भी खतरनाक होगा.

आखिर 3-0 की बढ़त बनाना जितना अहम है, उतना ही जरूरी उसे बरकरार रखना भी है. सीरीज जीतने के बाद खिलाड़ियों को बधाई मिलनी चाहिए, लेकिन लगातार दो हार के बाद आत्ममंथन भी होना चाहिए. गंभीर अगर हर बार तारीफों के सहारे ड्रेसिंग रूम का माहौल संभालेंगे तो मैदान पर नतीजे नहीं बदलेंगे.

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टीम इंडिया को सिर्फ ऐसा कोच नहीं चाहिए जो जीत के बाद शाबाशी दे और हार के बाद हौसला बढ़ाए. उसे ऐसा कोच भी चाहिए जो अपनी रणनीति की नाकामी स्वीकार करे, गलतियों का हिसाब मांगे और अगली बार वही गलती दोहराने से रोके. गंभीर को अब भाषण से आगे बढ़कर मैदान पर जवाब देना होगा.

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