आ रहा है खतरनाक अल-नीनो, कमजोर होगा मॉनसून- WMO की चेतावनी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने कन्फर्म किया है कि इस साल मजबूत अल-नीनो डेवलप हो रहा है. इससे दुनिया भर में गर्मी और सूखे का खतरा होगा. भारत में मॉनसून कमजोर होगा.

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कर्नाटक के चिकमंगलूर में 2 जून 2026 को प्री-मॉनसूनी बारिश से बचते लोग. (Photo: PTI) कर्नाटक के चिकमंगलूर में 2 जून 2026 को प्री-मॉनसूनी बारिश से बचते लोग. (Photo: PTI)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 02 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:39 PM IST

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की बेहद महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने दुनिया भर के पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं को सतर्क कर दिया है. डब्ल्यूएमओ ने आधिकारिक पुष्टि की है कि प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थितियां तेजी से विकसित हो रही हैं. आने वाले महीनों में यह मौसमी बदलाव वैश्विक तापमान और बारिश के पैटर्न को पूरी तरह से बदलने को तैयार है. वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान मॉडल बताते हैं कि साल 2026 में आने वाला यह अल-नीनो सामान्य नहीं होगा, बल्कि इसके 'मध्यम से बहुत मजबूत' होने की पूरी संभावना है.

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भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना इस संकट को और बढ़ा रहा है. संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने एक वीडियो बयान जारी कर चेतावनी दी है कि अल-नीनो पहले से ही गर्म हो रही दुनिया की आग में घी डालने का काम करेगा. इसके प्रभाव बेहद गंभीर होंगे, जो बहुत तेजी से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार कर वैश्विक अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था को तहस-नहस कर सकते हैं.

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क्या है अल-नीनो और यह कैसे बदलता है दुनिया का मौसम?

सरल शब्दों में कहें तो, अल-नीनो एक प्राकृतिक रूप से घटित होने वाली जलवायु घटना है, जो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण पैदा होती है. यह 'अल-नीनो साउदर्न ऑसीलेशन' का हिस्सा है, जिसके दूसरे छोर या ठंडे चरण को ला-नीना कहा जाता है. आमतौर पर अल-नीनो हर दो से सात साल में एक बार आता है. लगभग 9 से 12 महीनों तक सक्रिय रहता है.

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यह साइकिल आमतौर पर मार्च और जून के बीच विकसित होना शुरू होता है. नवंबर से फरवरी के बीच अपनी चरम तीव्रता पर पहुंच जाता है. विज्ञान के अनुसार, अल-नीनो का सबसे खतरनाक असर इसके विकसित होने के दूसरे वर्ष में दिखाई देता है. 

इस बार, समुद्र के भीतर की स्थितियां इतनी गर्म हैं कि सतह से नीचे का तापमान औसत से 6 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है. यह गर्मी का एक बहुत बड़ा जलाशय है, जो आने वाले समय में भयंकर सूखे, भीषण गर्मी और विनाशकारी बाढ़ का कारण बनेगा.

जून से अगस्त 2026 के लिए मौसम का पूर्वानुमान: 90% की बड़ी चेतावनी

डब्ल्यूएमओ की नई अपडेट के अनुसार, जून से अगस्त 2026 के दौरान अल-नीनो के सक्रिय होने की 80 प्रतिशत संभावना है, जबकि नवंबर तक इसके जारी रहने की उम्मीद 90 प्रतिशत से भी अधिक है. इस दौरान पूरी दुनिया में एक अजीब मौसमी बदलाव देखा जाएगा.  ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट की रिपोर्ट कहती है कि जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में दुनिया के लगभग हर हिस्से में तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहेगा.

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तापमान में होने वाली यह अप्रत्याशित वृद्धि सीधे तौर पर इंसानों में 'हीट स्ट्रेस' (गर्मी के कारण होने वाला शारीरिक तनाव) को बढ़ाएगी और कई क्षेत्रों में गंभीर सूखे की स्थिति पैदा करेगी. 

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डब्ल्यूएमओ की महानिदेशक सेलेस्टे साउलो का कहना है कि हमें एक संभावित रूप से बेहद मजबूत अल-नीनो के लिए तैयार रहना होगा. इससे पहले साल 2023-24 में आया अल-नीनो इतिहास के पांच सबसे मजबूत अल-नीनो में से एक था, जिसने साल 2024 को अब तक का सबसे गर्म साल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. अब 2026 में फिर से वैसा ही खतरा मंडरा रहा है.

भारत और दक्षिण एशिया पर इसका क्या होगा असर?

भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण एशिया के लिए यह रिपोर्ट किसी बड़े झटके से कम नहीं है. साउथ एशियन क्लाइमेट आउटलुक फोरम के पूर्वानुमानों का हवाला देते हुए डब्ल्यूएमओ ने स्पष्ट किया है कि अल-नीनो के प्रभाव के कारण दक्षिण एशिया में इस साल मानसून की बारिश सामान्य से कम होने की आशंका है.

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भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए मॉनसून लाइफलाइन की तरह है. यदि मानसून कमजोर रहता है, तो इसका सीधा असर फसलों के उत्पादन, पानी की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा. कम बारिश के कारण सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी.

इसके विपरीत, दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों जैसे दक्षिणी अमेरिका, अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और मध्य एशिया में सामान्य से बहुत अधिक बारिश और विनाशकारी बाढ़ आने की आशंका जताई गई है. वहीं ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मध्य अमेरिका और कैरिबियाई देशों में मौसम पूरी तरह शुष्क और गर्म रहेगा.

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क्या जलवायु परिवर्तन के कारण आ रहा है अल-नीनो?

वैज्ञानिकों ने इस बात को स्पष्ट किया है कि इस बात का कोई सीधा सबूत नहीं है कि जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल-नीनो आने की फ्रीक्वेंसी या इसकी ताकत बढ़ी है. अल-नीनो प्राकृतिक साइकिल है जो सदियों से चल रही है. इंसानों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग ने वातावरण और समुद्रों को पहले ही बहुत गर्म कर दिया है.

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जब यह प्राकृतिक अल-नीनो इंसानी गतिविधियों से गर्म हुई धरती से टकराता है, तो इसका असर कई गुना बढ़ जाता है. गर्म वातावरण में ऊर्जा और नमी सोखने की क्षमता ज्यादा होती है, जिसके कारण अल-नीनो से जुड़ी आपदाएं- जैसे अचानक आने वाली भयंकर बाढ़ या हफ्तों तक चलने वाली जानलेवा हीटवेव और अधिक हिंसक और विनाशकारी रूप ले लेती हैं.

तैयारियों का समय अभी है: डब्ल्यूएमओ की देशों से अपील

डब्ल्यूएमओ की ओर से जारी इन चेतावनियों का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर की सरकारों और मानवीय सहायता एजेंसियों को समय रहते कदम उठाने का मौका देना है. अग्रिम मौसमी पूर्वानुमानों की मदद से कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक योजनाएं बनाई जा सकती हैं.

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संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इस संकट से निपटने का एकमात्र प्रभावी तरीका यही है कि दुनिया जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता को तुरंत खत्म करे, रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ बढ़े और दुनिया के हर नागरिक तक 'अर्ली वार्निंग सिस्टम'की पहुंच सुनिश्चित करे ताकि समय रहते बहुमूल्य जान-माल की रक्षा की जा सके.

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