स्पेसएक्स ने शनिवार 25 जुलाई को दुनिया के सबसे बड़े रॉकेट स्टारशिप की 13वीं टेस्ट फ्लाइट सफलतापूर्वक लॉन्च की. भारतीय समय के मुताबिक सुबह 4:21 बजे यह रॉकेट टेक्सास के स्टारबेस (बोका चिका) से उड़ान भरी. इस मिशन में 20 नए स्टारलिंक वर्शन 3 सैटेलाइट अंतरिक्ष में छोड़े गए. मिशन का मकसद नई तकनीकों की जांच करना, सैटेलाइट तैनात करना और फ्यूचर में चांद और मंगल मिशनों की तैयारी करना था. हालांकि बूस्टर की लैंडिंग पूरी तरह सफल नहीं रही, लेकिन मिशन के ज्यादातर अहम लक्ष्य पूरे हो गए.
लॉन्च से पहले काउंटडाउन बिना किसी दिक्कत के पूरा हुआ. कुछ दिन पहले इंजन में आई तकनीकी दिक्कत की वजह से लॉन्च आखिरी समय पर रोक दिया गया था. इस बार रॉकेट तय समय पर उड़ा और मिशन की शुरुआत सफल रही.
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उड़ान के करीब ढाई मिनट बाद सुपर हैवी बूस्ट और ऊपर का हिस्सा स्टारशिप अलग हो गए. इसके बाद बूस्टर ने मैक्सिको की खाड़ी में कंट्रोल्ड स्प्लैशडाउन की कोशिश की, लेकिन लैंडिंग के समय सभी Raptor इंजन सही तरह से चालू नहीं हो पाए. इसी वजह से बूस्टर की सॉफ्ट लैंडिंग नहीं हो सकी. वहीं स्टारशिप अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ती रही.
अंतरिक्ष में छोड़े गए 20 स्टारलिंक सैटेलाइट
अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद Starship ने अपने इंजन बंद कर दिए और कुछ समय तक बिना इंजन के आगे बढ़ती रही. इसी दौरान उसने 20 स्टारलिंक वर्शन 3 सैटेलाइट अंतरिक्ष में तैनात किए. पहली बार स्टारशिप इस तरह असली स्टारलिंक V3 सैटेलाइट लेकर उड़ान भरी.
स्टारलंक V3 सैटेलाइट पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर हैं. ये तेज इंटरनेट सेवा देने में सक्षम हैं और लेजर लिंक तकनीक की मदद से एक-दूसरे से सीधे संपर्क कर सकते हैं. फ्यूचर में इनका इस्तेमाल दुनिया के दूर-दराज के इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए किया जाएगा.
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हिंद महासागर में हुआ स्प्लैशडाउन
उड़ान के एक घंटे से ज्यादा समय बाद स्टारशिप वापस पृथ्वी के वातावरण में दाखिल हुई. तय प्लानिंग के मुताबिक इसका स्प्लैशडाउन हिंद महासागर में कराया गया. इस दौरान वैज्ञानिकों ने रॉकेट की हीट शील्ड, कंट्रोल सिस्टम और दोबारा पृथ्वी के वातावरण में लौटने की क्षमता की भी जांच की.
हालांकि बूस्टर की लैंडिंग पूरी तरह सफल नहीं रही, लेकिन स्टारशिप ने सैटेलाइट तैनाती, री-एंट्री और बाकी कई अहम टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे किए. इससे स्पेसएक्स को अगली उड़ानों के लिए जरूरी जानकारी मिलेगी.
यह मिशन क्यों है अहम?
स्टारशिप दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ताकतवर रॉकेट है. इसकी ऊंचाई करीब 123 मीटर (403 फीट) है. स्पेसएक्स इसे पूरी तरह दोबारा इस्तेमाल होने वाला रॉकेट बनाना चाहता है, ताकि अंतरिक्ष मिशनों की लागत कम हो और बार-बार नए रॉकेट बनाने की जरूरत न पड़े.
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नासा अपने अर्टिमिस मिशन में इंसानों को फिर से चांद पर भेजने के लिए स्टारशिप के एक खास मॉडल का इस्तेमाल करना चाहता है. वहीं स्पेसएक्स का बड़ा लक्ष्य इसी रॉकेट की मदद से फ्यूचर में इंसानों और भारी सामान को मंगल तक पहुंचाना है.
अब स्पेसएक्स इस मिशन से मिले सभी डेटा का अध्ययन करेगी. खास तौर पर बूस्टर की लैंडिंग, स्टारशिप की री-एंट्री, सैटेलाइट तैनाती और दूसरे सिस्टम की जांच की जाएगी. इन नतीजों के आधार पर अगली टेस्ट फ्लाइट में सुधार किए जाएंगे. हर नई उड़ान के साथ सटारशिप चांद और मंगल मिशनों की तैयारी के और करीब पहुंच रही है.
आजतक साइंस डेस्क