अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपने X-59 विमान का सफल परीक्षण किया है. इस विमान ने कैलिफोर्निया में उड़ान के दौरान ध्वनि की गति पार की, लेकिन सामान्य सुपरसोनिक विमानों की तरह तेज सोनिक बूम नहीं हुआ. इस परीक्षण का मकसद कम आवाज के साथ सुपरसोनिक उड़ान की तकनीक को परखना है.
नासा और लॉकहीड मार्टिन ने मिलकर X-59 विमान तैयार किया है. परीक्षण के दौरान इस विमान ने करीब 1729 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल की. यह उड़ान करीब 55,000 फीट की ऊंचाई पर हुई.
यह भी पढ़ें: 'कृत्रिम सूरज' को मिली ताकत, चीन ने बनाया दुनिया का सबसे बड़ा मैग्नेट
आमतौर पर जब कोई विमान ध्वनि की गति से तेज उड़ता है, तो जमीन पर सोनिक बूम यानी तेज धमाके जैसी आवाज सुनाई देती है. लेकिन X-59 ने इसकी जगह सिर्फ हल्की 'सोनिक थंप' जैसी आवाज आई.
X-59 क्यों है खास?
जब कोई विमान ध्वनि की गति से तेज उड़ता है, तो उसके आगे बनने वाली हवा की दबाव तरंगें आपस में मिलकर तेज धमाके जैसी आवाज पैदा करती हैं. इसे सोनिक बूम कहा जाता है. इसकी आवाज इतनी तेज हो सकती है कि लोगों को झटका महसूस हो और खिड़कियां तक हिल जाएं. इसी वजह से अमेरिका में 1973 से जमीन के ऊपर कॉमर्शियल सुपरसोनिक उड़ानों पर रोक लगी हुई है.
X-59 का अगला हिस्सा काफी लंबा और नुकीला बनाया गया है. इससे हवा का दबाव धीरे-धीरे फैलता है. तेज धमाके जैसी आवाज बनने की संभावना कम हो जाती है. इसके अलावा विमान का इंजन ऊपर की तरफ लगाया गया है, जिससे आवाज का असर जमीन तक कम पहुंचता है.
यह भी पढ़ें: 600 भूकंप के झटके, 1700 से ज्यादा मौतें, 58 हजार इमारतें ध्वस्त, वेनेजुएला की तबाही ने झकझोर दिया
नासा के मुताबिक, X-59 की आवाज करीब 75 प्रतिशत ही होगी, जबकि कॉनकॉर्ड की आवाज 100 प्रतिशत से ज्यादा होती थी. आसान शब्दों में कहें तो x-59 की आवाज पहले के सुपरसोनिक विमानों के मुकाबले काफी कम होगी और तेज सोनिक बूम की जगह सिर्फ हल्की आवाज सुनाई देगी.
आगे क्या होगा?
X-59 कोई यात्री विमान नहीं है. इसमें सिर्फ एक सीट है और इसे केवल परीक्षण के लिए बनाया गया है. इस विमान से मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर फ्यूचर में ऐसे सुपरसोनिक यात्री विमान विकसित किए जा सकते हैं, जो कम आवाज के साथ जमीन के ऊपर भी उड़ान भर सकें.
अगर आगे के परीक्षण सफल रहते हैं, तो फ्यूचर में सुपरसोनिक यात्री उड़ानों की वापसी का रास्ता आसान हो सकता है. इससे लंबी दूरी की हवाई यात्रा का समय काफी कम हो सकता है.
आजतक साइंस डेस्क