अल-नीनो साल भर किस-किस महीने करेगा परेशान, जानिए 2027 जून तक का हाल

साल 2026 के अंत में आने आएगा सुपर अल-नीनो मॉनसून की कमी, खरीफ फसलों को नुकसान, महंगाई, सर्दियों में गर्मी और 2027 में जानलेवा हीटवेव के साथ बिजली का गंभीर संकट पैदा कर सकता है.

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अल-नीनो की वजह से पूरे साल का मौसम खराब होने वाला है. (Photo: ITG) अल-नीनो की वजह से पूरे साल का मौसम खराब होने वाला है. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 23 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:37 AM IST

जलवायु वैज्ञानिकों और मौसम विज्ञानियों ने भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी जारी की है. ताजा पूर्वानुमानों के अनुसार, 2026 के आखरी महीनों में एक अत्यधिक शक्तिशाली अल नीनो उभरने की पूरी आशंका है. यदि ये भविष्यवाणियां सच साबित होती हैं, तो आने वाले 12 महीने भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल प्रबंधन और बिजली ग्रिड के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण साबित होंगे. 

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प्रशांत महासागर की सतह का असामान्य रूप से गर्म होना भारत के मॉनसून चक्र को पूरी तरह से पटरी से उतार सकता है, जिससे कृषि प्रधान ग्रामीण भारत में मंदी का खतरा मंडराने लगा है. यह अल नीनो मुख्य रूप से भारत के खाद्य उत्पादन और पानी के स्रोतों पर सीधा प्रहार करेगा. इस मौसमी बदलाव के कारण देश को कम बारिश, फसलों की बर्बादी, जल संकट और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का एक खतरनाक चेन रिएक्शन झेलना पड़ सकता है.

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भारत के पास इससे निपटने के लिए मजबूत फूड स्टोरेज और सौर ऊर्जा जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन अगले कुछ महीनों में की जाने वाली प्रशासनिक तैयारी ही यह तय करेगी कि यह संकट सामान्य चुनौती बनकर रह जाता है या फिर एक बड़ी मानवीय और आर्थिक त्रासदी में बदल जाता है.

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अल-नीनो का 12 महीनों का क्रूर चक्र: जानिए कब, कहां और क्या होगा असर?

वैज्ञानिकों ने भारत पर पड़ने वाले इस संभावित अल नीनो के प्रभाव को चार प्रमुख तिमाहियों में विभाजित किया है, जो देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने पर असर डालेगा...

जून से सितंबर 2026: मॉनसून पर संकट और बुवाई में देरी

इस अवधि के दौरान भारत में सामान्य से कम मॉनसून रहने का जोखिम है. देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्य जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, गुजरात और मध्य भारत के कई हिस्से गंभीर बारिश की कमी का सामना कर सकते हैं. समय पर बारिश न होने के कारण किसानों के लिए खरीफ फसलों (जैसे धान, मक्का, दालें और कपास) की बुवाई के फैसले टल सकते हैं, जिससे फसल के साइकिल पर असर पड़ेगा. 

अक्टूबर से दिसंबर: खरीफ फसलों को नुकसान और बढ़ती महंगाई

इस तिमाही के दौरान दुनिया भर में अल नीनो अपने चरम पर होगा. भारत में मॉनसून की कमी के कारण देश के बड़े बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर चिंताजनक रूप से नीचे चला जाएगा. पर्याप्त सिंचाई न मिलने से खरीफ फसलों के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है. बाजार में खाद्यान्न की कमी होने के कारण देश में खाने-पीने की चीजों की कीमतें धीरे-धीरे ऊपर की ओर रेंगना शुरू कर देंगी, जो आम जनता की जेब पर भारी पड़ेगा.

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जनवरी से मार्च 2027: गर्म सर्दियां और रबी फसलों पर तनाव

साल 2027 की शुरुआत भारत के लिए एक 'असामान्य रूप से गर्म सर्दियों' के रूप में होगी. ठंड के मौसम में तापमान बढ़ने के कारण गेहूं, सरसों और अन्य रबी फसलों को आवश्यक नमी नहीं मिल पाएगी, जिससे वे 'नमी के तनाव' का शिकार हो जाएंगी. इस दौरान देश के प्रमुख शहरों में भूमिगत जल स्तर घटने के कारण शहरी जल प्रबंधन एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दा बन जाएगा.

अप्रैल से जून: जानलेवा हीटवेव और बिजली का महा-संकट

यह अल नीनो चक्र का सबसे खतरनाक चरण होगा, जब भारत के अधिकांश हिस्से भीषण और जानलेवा लू यानी हीटवेव की चपेट में होंगे. अत्यधिक गर्मी के कारण देश में कूलर और एयर कंडीशनर चलाने के लिए बिजली की मांग अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती है. इसके साथ ही देश के संवेदनशील जिलों और शहरों में पानी की भारी किल्लत खड़ी हो जाएगी, जिससे टैंकर माफियाओं और जल संकट की खबरें आम हो सकती हैं.

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संकट के बीच राहत: भारत के पास क्या हैं मजबूत हथियार?

अल-नीनो की यह तस्वीर काफी डरावनी है, लेकिन भारत के लिए कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं जो इस संकट की तीव्रता को कम कर सकते हैं. सबसे बड़ा फायदा यह है कि कम बादलों और सूखे मौसम के कारण देश में धूप ज्यादा समय तक रहेगी, जिससे सौर ऊर्जा और अन्य रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेस का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ सकता है. यह बिजली संकट से निपटने में ग्रिड की मदद करेगा.

इसके अलावा, पहले बताए जाने पूर्वानुमानों के कारण सरकार को पहले से योजना बनाने का पर्याप्त समय मिल गया है. भारत के सरकारी गोदामों में मौजूद अनाज का विशाल स्टॉक किसी भी संभावित कमी की स्थिति में खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने और आपूर्ति बनाए रखने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम करेगा. साथ ही, पिछले कुछ सालों में बेहतर हुई सिंचाई और ड्रिप इरिगेशन तकनीक पानी के नुकसान को कम करने में मददगार साबित होगी.

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