चांद पर इंसानों के लिए रहना आसान नहीं है. वहां सांस लेने के लिए हवा नहीं है, तापमान बहुत ज्यादा बदलता है. सूरज से आने वाली तेज किरणों और रेडिएशन का सामना करना पड़ता है. लेकिन नासा की एक नई स्टडी में पता चला है कि धरती के कुछ छोटे माइक्रोब्स चंद्रमा की सतह पर भी कुछ समय तक जिंदा रह सकते हैं. कुछ जगहों पर ये जीव हफ्तों से लेकर महीनों तक टिक सकते हैं.
यह स्टडी नासा के वैज्ञानिकों ने की है. इसमें चांद के साउथ पोल के तीन इलाकों- नोबिल रिम, कनेक्टिंग रिज और डे गर्लेश रिम को देखा गया. वैज्ञानिकों ने नासा के लूनर रीकॉन्सेंस ऑर्बिटर से मिले आंकड़ों और चांद पर रेडिएशन की जानकारी का इस्तेमाल किया. उन्होंने पांच तरह के माइक्रोब्स पर कंप्यूटर मॉडल के जरिए जांच की. इनमें दो फंगस और तीन बैक्टीरिया शामिल थे.
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कौन से जीव ज्यादा मजबूत निकले?
स्टडी में शामिल दोनों फंगस ने बैक्टीरिया के मुकाबले ज्यादा मजबूती दिखाई. इनमें एस्परजिलस नाइगर सबसे ज्यादा मजबूत रहा. इसे आम तौर पर ब्लैक मोल्ड कहा जाता है. यह गर्म और नमी वाली जगहों पर पाया जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के अंदर भी पाया जा चुका है.
दूसरा फंगस फ्यूजेरियम था. यह आमतौर पर मिट्टी में पाया जाता है. इसने भी मुश्किल हालात में टिकने की क्षमता दिखाई, लेकिन एस्परजिलस से कम. तीन बैक्टीरिया में डाइनोकोकस रेडियोडूरान्स, स्टेफाइलोकोकस ऑरेयस और बैसिलस सबटिलिस शामिल थे. इनमें डाइनोकोकस सबसे मजबूत रहा. बाकी दो बैक्टीरिया पर चांद की UV किरणों का ज्यादा असर पड़ा.
चांद पर कहां बच सकते हैं ये माइक्रोब्स?
चंद्रमा पर माइक्रोब्स के लिए सबसे बड़ी परेशानी तेज UV किरणें, रेडिएशन और बहुत ज्यादा गर्मी है. चांद पर दिन के समय तापमान करीब 127 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. लेकिन चांद की हर जगह एक जैसी नहीं है. दक्षिणी ध्रुव के कुछ गड्ढों में सूरज की रोशनी सीधे नहीं पहुंचती.
इन जगहों पर माइक्रोब्स के कुछ समय तक बचने की संभावना ज्यादा है. कंप्यूटर मॉडल के मुताबिक कुछ इलाकों में ये जीव हफ्तों से महीनों तक जिंदा रह सकते हैं.
जिंदा रहना और बढ़ना अलग बात है
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस स्टडी में सिर्फ यह देखा गया कि माइक्रोब्स कितने समय तक जिंदा रह सकते हैं. यह नहीं देखा गया कि वे चांद पर बढ़ सकते हैं या अपनी संख्या बढ़ा सकते हैं. अगर कोई माइक्रोब चांद की मिट्टी के नीचे दब जाए तो उसे तेज रेडिएशन से कुछ बचाव मिल सकता है.
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चांद के कुछ इलाकों में पानी बर्फ के रूप में भी मौजूद है. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह समझना जरूरी है कि धरती से पहुंचे माइक्रोब्स भविष्य में चांद की मिट्टी और पानी से जुड़े रिसर्च को प्रभावित तो नहीं करेंगे.
भविष्य के चंद्र मिशनों के लिए क्यों जरूरी है यह स्टडी?
नासा के अर्टिमिस मिशनों के तहत इंसानों को चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास भेजने की तैयारी है. इंसानों के साथ धरती के माइक्रोब्स भी अनजाने में चांद तक पहुंच सकते हैं. ये स्पेससूट, उपकरणों या मशीनों के जरिए वहां पहुंच सकते हैं.
इससे भविष्य के वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी समस्या आ सकती है. अगर चांद की मिट्टी या बर्फ में कोई माइक्रोब मिलता है, तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि वह चांद पर पहले से था या धरती से वहां पहुंचा.इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्र मिशनों में धरती से ले जाए गए माइक्रोब्स का पूरा रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा.
इससे बाद में चांद से मिले सैंपल की सही जांच करने में मदद मिलेगी. इस स्टडी का मतलब यह नहीं है कि ये माइक्रोब्स चांद पर आराम से रह सकते हैं. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि चांद की कुछ खास जगहों पर धरती के कुछ छोटे जीव उम्मीद से ज्यादा समय तक जिंदा रह सकते हैं.
आजतक साइंस डेस्क