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NASA के टॉप साइंटिस्ट का दावा- मंगल पर 'कीड़े जैसी आकृति' वाली जिंदगी दिखी

aajtak.in
  • वॉशिंगटन,
  • 15 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 6:09 PM IST
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NASA के टॉप साइंटिस्ट का दावा है कि उन्होंने मंगल ग्रह पर जीवन के सबूत खोजे हैं. वो लगातार इस बात के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय समूहों के सामने समझाने पर लगे हैं. 97 वर्षीय इस साइंटिस्ट की इस बात पर उनके कई साथियों ने उनकी आलोचना भी की लेकिन उनका कहना है कि मैं मरते दम तक यह बात कहता रहूंगा कि मैंने लाल ग्रह पर कीड़े जैसी आकृति वाला जीवन देखा है. (फोटोः गेटी)

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नासा के इस साइंटिस्ट का नाम है गिलबर्ट वी. लेविन (Gilbert V. Levin). 97 वर्षीय गिलबर्ट ने बताया कि 45 साल पहले उन्हें नासा के वाइकिंग मार्स प्रोब (Viking Mars Probe) के प्रयोग को सुपरवाइज किया था. इसे लेबल्ड रिलीज एक्सपेरीमेंट (Labelled Release Experiment) नाम दिया गया था. इसका मकसद था मंगल ग्रह की मिट्टी में सूक्ष्म जीवों द्वारा छोड़े जा रहे गैसों की जांच करना. (फोटोः गिलबर्ट वी. लेविन)

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डेली स्टार की खबर के अनुसार 20 जुलाई 1976 को गिलबर्ट वी. लेविन ने लिखा था कि LR यानी लेबल्ड रिलीज टेस्ट से जो डेटा मिले थे, वो हैरतअंगेज थे. वो लेविन की जांच को सकारात्मक नतीजे की ओर ले जा रही थी. यानी उन्हें मंगल की सतह पर जीवन के सबूत मिल रहे थे. यह एक्सपेरीमेंट चार बार किया गया. मंगल ग्रह के चार अलग-अलग स्थानों पर. लेकिन चारों स्थानों से एक ही परिणाम सामने आया. सभी प्रयोगों के LR टेस्ट के रिजल्ट एक जैसे थे. इन टेस्ट के परिणा धरती पर होने वाले टेस्ट से मिलते जुलते थे. (फोटोः गेटी)

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गिलबर्ट लेविन कहते हैं कि उस समय यह एक खुशी का मौका था लेकिन नासा पूरी तरह से पुख्ता नहीं था. वाइकिंग मार्स प्रोब पर लगे दूसरे यंत्र वाइकिंग मॉलीक्यूलर एनालिसिस एक्सपेरीमेंट (Viking Molecular Analysis Experiment) मंगल ग्रह पर किसी भी तरह के जैविक यानी ऑर्गेनिक सबूत खोजने में विफल रहा था. इसलिए नासा ने रिजल्ट के तौर पर जो रिपोर्ट बनाई, उसमें लिखा गया कि मंगल ग्रह पर जिंदगी की नकल हो रही है, असल जिंदगी नहीं है. (फोटोः गेटी)

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हालांकि, गिलबर्ट वी. लेविन नासा की इस रिपोर्ट से सहमत नहीं थे. उन्होंने कहा कि वो पूरी जिंदगी यानी मरते दम तक यह मानते रहेंगे कि उनकी जांच में किसी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं थी. उन्होंने लाल ग्रह पर जीन के सबूत खोजे थे. 2019 में लेविन ने लिखा कि पिछले 43 सालों से नासा द्वारा भेजे गए सभी मार्स रोवर, प्रोब या लैंडर ने वाइकिंग जैसे सकारात्मक परिणाम नहीं भेजे. उसके परिणाम बेहतरीन थे. (फोटोः गेटी)

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गिलबर्ट ने कहा कि मैंने अपनी बात और वाइकिंग से मिले डेटा को अंतरराष्ट्रीय समूहों के सामने रखा लेकिन उनकी बात कोई मानने को तैयार नहीं था. गिलबर्ट ने नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में यह बात कही थी कि मंगल ग्रह पर जीवन के सबूत मिले हैं, तब एकेडमी के लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे. उनका मजाक बनाया गया. उनके ऊपर खाने की टेबल से झींगा मछली फेंकी गई. (फोटोः गेटी)

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एकेडमी में बैठे एक दर्शक ने कहा कि मंगल ग्रह पर जीवन की बात करके गिलबर्ट आपने खुद को बेइज्जत किया है. आपने विज्ञान की इज्जत मिट्टी में मिलाई है. लेकिन लेविन अपनी बात पर टिके रहे. गिलबर्ट कहते हैं कि उन्होंने और उनकी टीम ने जांच में जो पाया वो रिपोर्ट में सच-सच लिखा. उनकी रिपोर्ट सौ फीसदी सही थी. उन्होंने रिपोर्ट में लिखा था कि नासा वाइकिंग द्वारा यह भी पता चला था कि मंगल पर सूक्ष्मजीवों के पनपने के लिए पर्याप्त पानी है. इसके बाद पाथफाइंडर, फीनिक्स और क्यूरियोसिटी ने भी ऐसे ही सबूत दिए थे. (फोटोः गेटी)

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गिलबर्ट ने कहा कि मंगल ग्रह पर अचानक से मीथेन के गायब होने की वजह यह दिखाती है कि वहां पर मीथेन को लेकर असंतुलन है. यानी मीथेन पैदा हो रहा है और खत्म हो रहा है. उन्होंने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए कहा कि क्यूरियोसिटी रोवर द्वारा ली गई कीड़े जैसी आकृति यह बताती है कि मंगल ग्रह पर जीवन है या था. हालांकि बहुत से प्लैनेटरी साइंटिस्ट गिलबर्ट की इस बात से सहमत नहीं हैं. (फोटोः गेटी)

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साल 2012 में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम में भी गिलबर्ट वी. लेविन शामिल थे. उन लोगों ने दोबारा से वाइकिंग मार्स प्रोब के परिणामों की जांच की. जिसमें यह बात सामने आई कि मंगल ग्रह पर माइक्रोबियल लाइफ यानी सूक्ष्मजीव मौजूद हैं. गिलबर्ट ने कहा कि हो सकता है कि सूक्ष्म जीव धरती से मंगल और मंगल से धरती के बीच उल्कापिंडों के जरिए यात्रा करते हों. क्योंकि इन दोनों ग्रहों के बीच सदियों से एस्टेरॉयड और उल्कापिंडों की आवाजाही होती रही है. (फोटोः गेटी)

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NASA के वैज्ञानिक क्रिस मैक्के भी गिलबर्ट वी. लेविन की बात से सहमत हैं. क्रिस कहते हैं कि धरती करोड़ों सालों से अपने आसपास के ग्रहों पर जीवन फेंकने का काम कर रही है. क्योंकि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के बाहर सूक्ष्मजीवों के जिंदा रहने का प्रयोग सफल रहा था. उसमें पता चला था कि सूक्ष्मजीव स्पेस की सर्दी और रेडिएशन से बचकर दूसरे ग्रहों तक जा सकते हैं. (फोटोः गेटी)

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अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि यह स्टडी इस बात को लेकर जागरुकता फैलाती है कि हमें ग्रहों की सुरक्षा को लेकर स्टडी करनी चाहिए. क्योंकि मंगल ग्रह का वायुमंडल 190-200 nm यूवी रेडिएशन सोखता है. इसी रेडिएशन के लेवल पर इंसानों ने सौर मंडल में कई स्थानों पर कुछ सूक्ष्मजीवों की खोज कर रखी है लेकिन लेविन की बात मानने को कोई तैयार नहीं है. अगर उनकी बात सही है तो यह वैज्ञानिक इतिहास की बड़ी खोज साबित होगी. (फोटोः गेटी)

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