Hindu Dharam: कलयुग का सबसे बड़ा चमत्कार! जानें कौन थे वो संत, जिन्हें भगवान ने दिए थे साक्षात दर्शन?

Hindu Dharam: कलयुग के इस दौर में भले ही लोग ईश्वर के अस्तित्व को केवल कल्पना मानते हों, लेकिन सनातन परंपरा में कई ऐसी महान आत्माएं हुई हैं जिन्हें प्रभु के साक्षात दर्शन प्राप्त हुए हैं. आइए जानते हैं उन सभी के बारे में.

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हिंदू धर्म (Photo: ITG) हिंदू धर्म (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:56 AM IST

Hindu Dharam: आज का दौर ऐसा है जिसमें कई लोग पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं. लोगों के मन से भगवान का भय कम होता जा रहा है और कुछ लोग ईश्वर से जुड़ी बातों को केवल कल्पना मानते हैं. लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलयुग में भी भगवान ने कई भक्तों को साक्षात दर्शन दिए हैं. ऐसे में हम आपको ऐसे ही कुछ महान संतों और भक्तों के बारे में बताएंगे, जिनके बारे में मान्यता है कि उन्हें अपने आराध्य के दिव्य दर्शन हुए थे. 

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महर्षि अरविंद घोष

महर्षि अरविंद घोष के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वह केवल एक महान योगी और आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि देश की आजादी के आंदोलन से भी जुड़े रहे थे. साल 1905 में बंगाल विभाजन के बाद वह क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा बने. इसके बाद साल 1908 से 1909 के बीच अलीपुर बम कांड के मामले में उन पर मुकदमा चला और अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया.

मान्यता है कि जेल में रहने के दौरान वह गहन साधना और ध्यान किया करते थे. इसी दौरान उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात दर्शन हुए थे. कहा जाता है कि इस आध्यात्मिक अनुभव के बाद उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई थी. धीरे-धीरे उन्होंने क्रांतिकारी जीवन से दूरी बनाई और अपना पूरा जीवन योग, साधना और आध्यात्मिक चिंतन को समर्पित कर दिया.

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गोस्वामी तुलसीदास

अगला नाम है महान संत और रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास का. मान्यता है कि बचपन में उनका नाम रामबोला था. उनका विवाह रत्नावली से हुआ था और कहा जाता है कि तुलसीदास अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे.

एक बार रत्नावली अपने मायके चली गईं. पत्नी से बिछड़ने के बाद तुलसीदास इतने व्याकुल हो गए कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनसे मिलने निकल पड़े. जब वह किसी तरह अपनी पत्नी के पास पहुंचे, तो उनकी हालत देखकर रत्नावली ने उन्हें समझाया कि जिस प्रेम और आसक्ति से वह उनके पीछे आए हैं, अगर उसका कुछ हिस्सा भी भगवान श्रीराम के प्रति होता तो उनका जीवन धन्य हो जाता.

पत्नी की यह बात तुलसीदास के हृदय में गहराई तक उतर गई. कहा जाता है कि उसी क्षण उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया. उन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग किया और प्रभु श्रीराम की भक्ति में लीन हो गए. इसके बाद उन्होंने अपना जीवन राम भक्ति और धर्म के प्रचार में समर्पित कर दिया. तुलसीदास जी को लेकर एक और प्रसिद्ध मान्यता है कि उन्हें हनुमान जी के दर्शन हुए थे. कहा जाता है कि जब वह राम कथा सुनाया करते थे, तब स्वयं बजरंगबली भी किसी न किसी रूप में वहां उपस्थित होते थे.

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रामकृष्ण परमहंस

तीसरा नाम आता है रामकृष्ण परमहंस का. स्वामी रामकृष्ण परमहंस मां काली के परम भक्त थे. उनके लिए मां काली केवल एक देवी नहीं, बल्कि साक्षात मां के समान थीं. मान्यता है कि वह मां काली से उसी तरह बात करते थे, जैसे कोई व्यक्ति अपनी मां से करता है. कहा जाता है कि उनकी भक्ति और साधना इतनी गहरी थी कि उन्हें मां काली के दिव्य दर्शन हुए. आगे चलकर स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अपना गुरु बनाया.

एक बार जब स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से पूछा कि क्या उन्होंने कभी परमात्मा को देखा है, तो उन्होंने कहा था कि हां, उन्होंने भगवान को देखा है और वह उन्हें उतनी ही स्पष्टता से देख सकते हैं, जितनी स्पष्टता से वह सामने मौजूद व्यक्ति को देख रहे हैं.

कान्हा की दीवानी मीराबाई

अब बात करते हैं भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त मीराबाई की. धार्मिक मान्यताओं में मीराबाई को श्रीकृष्ण की सबसे अनन्य भक्तों में गिना जाता है. कहा जाता है कि बचपन से ही उनका मन श्रीकृष्ण की भक्ति में रम गया था और समय के साथ उनकी भक्ति इतनी गहरी होती चली गई कि उनके लिए कान्हा ही सब कुछ बन गए थे. मीराबाई दिन-रात श्रीकृष्ण के भजन और भक्ति में लीन रहती थीं. उनकी कृष्ण भक्ति के कारण उन्हें अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने आराध्य का साथ कभी नहीं छोड़ा.

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मीराबाई के बारे में एक प्रसिद्ध मान्यता है कि अपने जीवन के अंतिम समय में वह द्वारका पहुंचीं और श्रीकृष्ण मंदिर में भगवान की मूर्ति के सामने भक्ति में लीन हो गईं. कहा जाता है कि एक दिन मंदिर के दरवाजे बंद हो गए और जब बाद में उन्हें खोला गया, तो मीराबाई वहां नहीं थीं. केवल उनकी साड़ी भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति से लिपटी हुई दिखाई दी. मान्यता है कि मीराबाई अपने आराध्य श्रीकृष्ण में विलीन हो गई थीं.

केवल महर्षि अरविंद, तुलसीदास, रामकृष्ण परमहंस और मीराबाई ही नहीं, बल्कि गुरु गोरखनाथ, समर्थ रामदास, वल्लभाचार्य और कई अन्य संतों के बारे में भी ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं. ये सभी संत हमारी ही तरह इस संसार में जन्मे, लेकिन अपनी गहरी साधना, तपस्या और अटूट भक्ति के कारण उन्होंने आध्यात्मिक जगत में विशेष स्थान प्राप्त किया. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की भक्ति सच्ची और निस्वार्थ हो, तो ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग स्वयं खुलने लगता है.

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