Sharad Purnima 2026: शरद पूर्णिमा पर पंचक और भद्रा, किस समय रखें चांदनी में खीर?

Sharad Purnima 2026: शरद पूर्णिमा 2026 पर पंचक और भद्रा का समय क्या है? जानें खीर रखने का शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय और मां लक्ष्मी की पूजा का महत्व.

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शरद पूर्णिमा 2026 पर पंचक और भद्रा का समय क्या है? (Photo: AI Generated) शरद पूर्णिमा 2026 पर पंचक और भद्रा का समय क्या है? (Photo: AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:44 PM IST

शरद पूर्णिमा की रात को हिंदू धर्म में बेहद खास माना जाता है. मान्यता है कि आश्विन महीने की पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी चांदनी अमृत के समान मानी जाती है.  यही वजह है कि इस रात दूध और चावल से बनी खीर तैयार करके चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा है.  इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने और रात में जागरण करने का भी विशेष महत्व बताया गया है. 

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साल 2026 में शरद पूर्णिमा का पर्व 25 अक्टूबर, रविवार को मनाया जा रहा है.  इस बार पूर्णिमा के दिन भद्रा और पंचक को लेकर भी लोगों के मन में सवाल हैं.  ऐसे में पूजा करने, चंद्र दर्शन करने और खीर रखने से पहले तिथि और शुभ समय जानना जरूरी है.  आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा की तिथि, चंद्रोदय का समय, भद्रा-पंचक का समय और खीर रखने से जुड़ी जरूरी बातें. 

शरद पूर्णिमा 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर शरद पूर्णिमा मनाई जाती है.  इस साल पूर्णिमा तिथि दो दिन तक रहने के कारण पूजा और स्नान-दान की तारीखों में अंतर है.  चंद्रमा की पूजा और रात्रि में खीर रखने की परंपरा को देखते हुए शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को मनाई जा रही है. 
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2026, सुबह 11:55 बजे
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर 2026, सुबह 9:41 बजे
- शरद पूर्णिमा: रविवार, 25 अक्टूबर 2026
- पूर्णिमा स्नान-दान: सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
- चंद्रोदय का समय: शाम 5:40 बजे के आसपास
चंद्रोदय के समय में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है. 

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शरद पूर्णिमा 2026 पर खीर रखने का शुभ मुहूर्त
शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है.  धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा की किरणों के नीचे खीर रखने से उसमें अमृत तुल्य गुण आ जाते हैं.  बाद में इसे भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. 

इस साल शरद पूर्णिमा पर खीर रखने के लिए निशिता काल का समय महत्वपूर्ण बताया गया है. 
- खीर रखने का शुभ समय: रात 11:40 बजे से 12:31 बजे तक
- समय अवधि: 25 अक्टूबर की रात से 26 अक्टूबर की मध्यरात्रि तक
यह समय निशिता मुहूर्त के आधार पर दिया गया है.  अलग-अलग पंचांगों और स्थानीय परंपराओं में खीर रखने के समय को लेकर अंतर हो सकता है.  इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि कर लें. 

शरद पूर्णिमा पर भद्रा का समय क्या है?
इस साल शरद पूर्णिमा के दिन भद्रा काल भी रहेगा.  पंचांग के अनुसार, 25 अक्टूबर को भद्रा सुबह 11:55 बजे शुरू होकर रात 10:52 बजे तक रहेगी. 

धार्मिक मान्यताओं में भद्रा के दौरान कुछ मांगलिक कार्यों को करने से बचने की सलाह दी जाती है.  हालांकि, हर धार्मिक कार्य के लिए नियम एक जैसे नहीं होते. इसलिए पूजा और खीर रखने के लिए निर्धारित मुहूर्त  का ध्यान रखना चाहिए. ध्यान देने वाली बात यह है कि बताए गए निशिता मुहूर्त की शुरुआत भद्रा काल समाप्त होने के बाद होती है. 

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शरद पूर्णिमा पर कब तक रहेगा पंचक?
25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के दिन पंचक भी रहेगा.  उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार, पंचक का समय सुबह 6:28 बजे से शाम 7:22 बजे तक बताया गया है. 

ज्योतिष में पंचक को पांच नक्षत्रों की अवधि माना जाता है.  इस दौरान कुछ विशेष कार्यों को लेकर सावधानी बरतने की परंपरा है. हालांकि, पंचक के दौरान सभी धार्मिक कार्य वर्जित नहीं माने जाते.  शरद पूर्णिमा की पूजा और चंद्र दर्शन के लिए अपनी स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार निर्णय लिया जा सकता है. 

शरद पूर्णिमा पर क्यों रखी जाती है चांदनी में खीर?
शरद पूर्णिमा पर खीर रखने के पीछे धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं.  माना जाता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणें अमृत के समान होती हैं.  इसी विश्वास के चलते दूध, चावल और चीनी से बनी खीर को खुले आसमान के नीचे चांदनी में रखा जाता है. 

मान्यता है कि चंद्रमा की रोशनी में रखी गई खीर को अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना पूरी होती है.  

शरद पूर्णिमा को मां लक्ष्मी की आराधना के लिए भी विशेष माना जाता है.  कहा जाता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी पूजा करने वाले भक्तों पर कृपा करती हैं.  इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है. 

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