दशहरे पर जलने से पहले गल गए 'रावण', कारीगर बोले- पुतलों का इंश्योरेंस होना चाहिए

सोमवार सुबह-सुबह हुई बे-मौसम बरसात ने रावण के पुतले बनाने वालों को भारी संकट में डाल दिया. रावण के पुतलों के सबसे बड़े बाजार तितारपुर में बारिश की मार से कारीगर परेशान हैं. करीब 5 दशक से इस काम से जुड़े कारोबारी का कहना है पिछले कुछ सालों से नवरात्र में बरसात का चलन ऐसा शुरू हुआ है कि पुतले भीगने से नुकसान हो रहा है.

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सोमवार सुबह-सुबह हुई बेमौसम बरसात ने रावण के पुतले बनाने वालों को भारी संकट में डाल दिया है. (Photo: ITG) सोमवार सुबह-सुबह हुई बेमौसम बरसात ने रावण के पुतले बनाने वालों को भारी संकट में डाल दिया है. (Photo: ITG)

मनोरंजन कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 12 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:33 PM IST

राजधानी दिल्ली में नवरात्र की शुरुआत हो चुकी है. दशहरे पर रावण दहन को लेकर एशिया के सबसे बड़े बाजार तितारपुर में पुतले बनाने का काम तेज था. लेकिन सोमवार सुबह-सुबह हुई बे-मौसम बरसात ने रावण के पुतले बनाने वालों को भारी संकट में डाल दिया. पार्क में रखे हुए पुतले बारिश के कारण गल गए, जिससे रावण के पुतले बनाने वाले कारोबारी बेहद परेशान हैं. हालांकि अब इन पुतलों को दुरुस्त करने की कवायद जारी है. कारीगर पूरी मेहनत के साथ इन्हें फिर से तैयार करने में जुट गए हैं.

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बाजार में रावण के कुछ पुतले पूरी तरह तैयार भी हो गए थे. बस उन पर ऊपरी परत चढ़ाने का काम बाकी था, जिस पर पानी का असर कम होता है. लेकिन दुर्भाग्यवश यह काम पूरा नहीं हो सका था. ऐसे कारीगरों को बहुत ज्यादा नुकसान झेलना पड़ रहा है. अब इन्हें पुतलों को सूखने के लिए इंतजार करना पड़ेगा. इसके बाद फिर से कागज की लेयर चढ़ाई जाएगी और आखिरी चरण में साज-सज्जा का काम किया जाएगा.

करीब 5 दशक से इस काम से जुड़े एक कारोबारी का कहना है पिछले कुछ सालों से नवरात्र में बरसात का चलन ऐसा शुरू हुआ है कि पुतले भीगने से नुकसान हो रहा है. बे-मौसम बरसात की वजह से अब लागत और कमाई दोगुनी हो गई है. हमें दिन रात मेहनत करनी पड़ेगी. जबकि खरीदने वाले ग्राहक इस नुकसान की कीमत देने के लिए तैयार नहीं होते हैं.

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पुतलों के इंश्योरेंस की मांग
उनकी सरकार से मांग है कि उनके लिए कुछ ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे इन पुतलों का भी इंश्योरेंस हो सके. ताकि नुकसान होने पर सरकार की तरफ से कुछ मुआवजा मिल जाए, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में रावण के पुतलों को ढकना संभव नहीं है. कारीगरों का कहना है कि सालों से चली आ रही हिंदुओं के इस परंपरा को जीवित रखने में उनकी अहम भूमिका रही है. इसलिए सरकार को ऐसी किसी भी स्थिति और आपदा में उनकी कुछ तो मदद करनी चाहिए.

वेस्ट दिल्ली के टैगोर गार्डन के तितारपुर में 5 फुट से लेकर 50 फीट तक के रावण के पुतले बनाए जाते हैं और यहां के पुतले न सिर्फ देश के अलग-अलग राज्यों में बल्कि विदेशों तक जाते हैं. हालांकि इस बार विदेश से कोई ऑर्डर नहीं आया है. लेकिन दिल्ली के अलावा, हरियाणा, राजस्थान, यूपी सहित कई राज्यों से रावण के पुतलों का ऑर्डर मिला है.

बढ़ती महंगाई से टूटी कमर
कारीगरों का यह भी कहना है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार महंगाई ने कमर तोड़ रखी है. पिछले साल इसे बनाने में जो बांस इस्तेमाल किया जाता है, वह डेढ़ सौ रुपए प्रति पीस मिलता था जो इस बार बढ़कर 200 रुपए हो गया है. वहीं पुतले बनाने में जो कागज इस्तेमाल होते हैं, उसकी कीमत भी पिछले साल के मुकाबले 150 से बढ़कर 180 और 190 रुपए प्रति किलो तक हो गई है. जबकि तार की कीमत 75 रुपए से बढ़कर 90 रुपए से ज्यादा हो चुकी है.

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