पितृपक्ष चल रहा है और इन दिनों लोग अपने पितरों का श्राद्ध करने पवित्र जगहों की ओर रुख कर रहे हैं. उत्तराखंड के चमोली स्थित भगवान विष्णु के बद्रीनाथ को मोक्ष धाम भी कहा जाता है. इसलिए यहां ब्रह्मकपाल में पितरों का श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं. मंगलवार को रूस के मॉस्को से भी कुछ विदेशी श्रद्धालु यहां आए और पूरी श्रद्धा के साथ ब्रह्मकपाल तीर्थ में पितरों का श्राद्ध किया.
रूस से भारत आए इस दल में सात रूसी तीर्थयात्रियों ने ब्रह्मकपाल में विधि-विधान से अपने पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण किया. इस दौरान उन्होंने पितरों की आत्मशांति और मोक्ष की कामना की. विदेश से बदरीनाथ पहुंचे इन तीर्थयात्रियों ने ब्रह्मकपाल में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर यहां की परंपराओं और मान्यताओं के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की. उन्होंने कहा कि ब्रह्मकपाल में पितरों का पिंडदान कर उन्हें बहुत अच्छा महसूस हो रहा है.
क्यों खास है ब्रह्मकपाल में पिंडदान?
देशभर के अलग-अलग तीर्थों पर पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान किए जा रहे हैं. लेकिन उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम स्थित ब्रह्मकपाल में पिंडदान का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यता है कि यहां पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है. बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रमुख धामों में शामिल होने के साथ-साथ पितृ कर्म और मोक्ष की भूमि के रूप में भी सनातन आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है.
अलकनंदा नदी के तट पर स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ में सालभर श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण करने पहुंचते हैं. खासतौर पर पितृपक्ष के 15 दिनों में देश के अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालुओं के बद्रीनाथ पहुंचने का सिलसिला और तेज हो जाता है. मान्यता है कि ब्रह्मकपाल में किए गए पिंडदान और तर्पण से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार पितृ ऋण से मुक्त होता है.
ब्रह्मकपाल की कथा
ब्रह्मकपाल को पुराणों में भी विशेष धार्मिक मान्यता दी गई है. मान्यता के अनुसार, ब्रह्माजी के पांच शीश थे. भगवान शिव ने ब्रह्माजी के पांचवें शीश को काट दिया. लेकिन वह शीश भगवान शिव के त्रिशूल से अलग नहीं हुआ. तीनों लोकों में भ्रमण करने के बाद जब भगवान शिव बदरिकाश्रम पहुंचे तो ब्रह्मा का पांचवां शीश उनके त्रिशूल से अलग हुआ. इसी स्थान को ब्रह्मकपाल के रूप में विशेष धार्मिक मान्यता मिली. कहते हैं कि भगवान शिव ने यहां ब्रह्मा के पांचवें शीश का पिंडदान किया और वरदान दिया कि कलियुग में जो भी श्रद्धालु इस पवित्र भूमि पर अपने पितरों का पिंडदान करेगा, उसके पितरों को मुक्ति प्राप्त होगी.
कमल नयन सिलोड़ी