जिंदा लोगों का श्राद्ध! जानें क्यों इस जगह जीवित लोग करने आते हैं अपना पिंडदान

गया में पिंडदान के लिए कई वेदियां और धार्मिक स्थल बताए गए हैं. लेकिन जनार्दन मंदिर वेदी में आत्मश्राद्ध की परंपरा बताई गई है. यह स्थान भस्मकूट पर्वत पर मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित बताया जाता है. मान्यता है कि यहां लोग जीते जी अपना श्राद्ध करने आते हैं.

Advertisement
गया के जनार्दन मंदिर वेदी में आत्मश्राद्ध की परंपरा बताई गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर) गया के जनार्दन मंदिर वेदी में आत्मश्राद्ध की परंपरा बताई गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:12 PM IST

पितृपक्ष में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. काशी, बद्रीनाथ से लेकर हरिद्वार, उज्जैन तक देश में कई पवित्र स्थलों पर श्राद्ध, पिंडदान किए जाते हैं. लेकिन बिहार के गयाजी में श्राद्धकर्म करने का महत्व विशेष माना गया है. यहां दूर-दूर से लोग आते हैं और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध करते हैं. आपको जानकर हैरानी होगी की गयाजी की पवित्र स्थली पर जीवित लोगों का श्राद्ध भी किया जाता है. आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं.

Advertisement

गया में पिंडदान के लिए कई वेदियां और धार्मिक स्थल बताए गए हैं. लेकिन जनार्दन मंदिर वेदी में आत्मश्राद्ध की परंपरा बताई गई है. यह स्थान भस्मकूट पर्वत पर मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित बताया जाता है. मान्यता है कि यहां लोग जीते जी अपना श्राद्ध करने आते हैं. इसे ही आत्मश्राद्ध कहा जाता है. भगवान विष्णु जनार्दन स्वामी के रूप में विराजमान हैं और उन्हें पिंड अर्पित करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो जाता है.

क्यों जीवित लोग करते हैं अपना श्राद्ध?
मान्यता के अनुसार, आत्मश्राद्ध की परंपरा विशेष परिस्थितियों में अपनाई जाती है. ऐसा कहा जाता है कि जिन लोगों की संतान नहीं है या जिन्हें यह आशंका रहती है कि मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध और पिंडदान करने वाला कोई नहीं होगा. वो लोग यहां आकर मृत्यु से पहले ही अपना श्राद्ध, पिंडदान कर जाते हैं. ताकि मृत्यु के बाद उनकी आत्मा पर कोई बोझ न रहे और उन्हें मोक्ष मिल सके.

Advertisement

इसके अलावा, वैराग्य जीवन अपनाने वाले साधु-संत या सांसारिक जीवन से दूर हो चुके लोग भी आत्मश्राद्ध करते हैं. इसके पीछे मुख्य मान्यता यह बताई जाती है कि व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपने अंतिम संस्कार से जुड़े धार्मिक कर्म को पूरा कर ले.

3 दिन चलती है आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया
आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया को तीन दिनों में पूरा किया जाता है. गया पहुंचने के बाद सबसे पहले तीर्थ से संबंधित संकल्प लिया जाता है और प्रायश्चित की प्रक्रिया की जाती है. इसके बाद जनार्दन स्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना और मंत्र-जाप किया जाता है. फिर विधिवत भगवान को पिंड अर्पित किए जाते हैं.

दही-चावल से बनाए जाते हैं तीन पिंड
आत्मश्राद्ध की इस प्रक्रिया में दही और चावल से तीन पिंड तैयार किए जाने की परंपरा बताई जाती है. इन्हें भगवान जनार्दन स्वामी को अर्पित किया जाता है. गौर करने वाली बात यह है कि इन पिंडों में तिल का इस्तेमाल नहीं किया जाता. जबकि सामान्य श्राद्ध में तिल का विशेष महत्व बताया गया है. आत्मश्राद्ध में पिंड अर्पित करते समय व्यक्ति भगवान से अपने जीवन के बाद मोक्ष की कामना करता है.

आत्मश्राद्ध का अंतिम चरण
भगवान को पिंड अर्पित करते समय व्यक्ति प्रार्थना करता है कि वह जीवित रहते हुए स्वयं के लिए यह पिंड अर्पित कर रहा है. मृत्यु के बाद ईश्वर की कृपा से उसकी आत्मा को सद्गति और मोक्ष प्राप्त हो, ऐसी कामना है. इस तरह आत्मश्राद्ध की परंपरा सामान्य श्राद्ध से अलग होती है. इसमें किसी दिवंगत व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि जीवित व्यक्ति स्वयं अपने लिए धार्मिक कर्म करता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »