6 नवंबर से पंचदिवसीय दीपोत्सव शुरू हो रहा है. इस दौरान अभ्यंग स्नान की परंपरा निभाई जाती है. मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान न करने वाले व्यक्ति को नरक की प्राप्ति होती है. इस बार अभ्यंग स्नान 8 नवंबर को सुबह होगा. मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले शरीर पर तिल का तेल लगाकर स्नान करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और अलक्ष्मी से मुक्ति मिलती है. इस परंपरा के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि शरीर को स्वस्थ, ऊर्जावान और दीर्घायु बनाए रखने का आयुर्वेदिक विज्ञान भी छिपा हुआ है.
धार्मिक मान्यता है कि तिल के तेल में मां लक्ष्मी और जल में मां गंगा का वास होता है. इसलिए दीपावली के पंचदिवसीय पर्व में सूर्योदय से पहले तिल के तेल से शरीर की मालिश करके स्नान करना विशेष फलदायी माना गया है. अभ्यंग स्नान का अर्थ है- शरीर पर तेल लगाकर विधिपूर्वक स्नान करना. ऐसा करने से व्यक्ति के शरीर की नकारात्मकता दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है. स्नान के बाद यमराज के 14 नामों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करने और संध्या काल में यमराज के नाम का दीपक जलाने की भी परंपरा है. इसे अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और परिवार की सुख-समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है.
तिल के तेल की मालिश से क्या लाभ होता है?
आयुर्वेद में अभ्यंग यानी तेल मालिश को स्वस्थ शरीर रखने के लिए महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. तिल का तेल वात दोष को शांत करने वाला होता है. आयुर्वेदिक दृष्टि से नियमित तेल मालिश थकान, रूखापन और वात संबंधी परेशानियों को कम करने में सहायक मानी जाती है. इससे त्वचा में नमी बनी रहती है. शरीर को आराम मिलता है और मांसपेशियों को पोषण मिलता है. नियमित अभ्यंग करने से शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है. नींद अच्छी आती है और त्वचा कोमल रहती है. चरक संहिता में अभ्यंग के लाभों का उल्लेख करते हुए इसे जरा यानी बुढ़ापे के प्रभाव को कम करने, श्रम से उत्पन्न थकान दूर करने और वात को शांत करने वाला बताया गया है. इसी कारण नियमित तेल मालिश को शरीर की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के प्रभावों से बचाव का एक पारंपरिक उपाय माना गया है.
शनि के तीन कारक और तेल का संबंध
ज्योतिषीय मान्यताओं में जरा, श्रम और वात को शनि से संबंधित माना जाता है. शनि को उम्र, परिश्रम, हड्डियों, जोड़ों और दीर्घकालिक परेशानियों का कारक ग्रह कहा जाता है. शरीर में रूखापन, जकड़न, थकान और समय से पहले आने वाली कमजोरी को भी प्रतीकात्मक रूप से शनि के प्रभाव से जोड़ा जाता है. वहीं तिल का तेल शनि से संबंधित प्रमुख पदार्थों में गिना जाता है. यही कारण है कि शनि की शांति के लिए तिल के तेल का दान, दीपदान और शरीर पर तेल लगाने से लाभ होता है.
क्या है नरक और शरीर का संबंध?
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से नरक को केवल मृत्यु के बाद मिलने वाली यातना के रूप में नहीं देखा गया है. शरीर में अत्यधिक रूखापन, जकड़न, थकान, असहजता और समय से पहले बुढ़ापे के लक्षण भी जीवन को कष्टमय बना सकते हैं. इस दृष्टि से अभ्यंग स्नान शरीर को स्वस्थ रखने और जीवन में सुख का अनुभव कराने वाली परंपरा है. शास्त्रों में यम के भय से मुक्ति के लिए अभ्यंग का विधान इसी धार्मिक और स्वास्थ्य संबंधी सोच से जुड़ा हुआ है.
इस प्रकार दीपावली के दौरान अभ्यंग स्नान की परंपरा हमें धार्मिक आस्था के साथ शरीर की देखभाल का भी संदेश देती है. तिल के तेल से मालिश, स्नान, यम के नामों का स्मरण और दीपदान के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में स्वास्थ्य, दीर्घायु, मानसिक शांति और समृद्धि की कामना करता है.
अंशु पारीक