Guru Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत में इस कथा को पढ़ना न भूलें, वरना अधूरी रह सकती है पूजा!

Guru Pradosh Vrat Katha: कहा जाता है कि प्रदोष व्रत की पूजा के बाद व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. माना जाता है कि कथा पढ़ने या सुनने से व्रत का पुण्य फल प्राप्त होता है.

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गुरु प्रदोष व्रत पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा (Photo: ITG) गुरु प्रदोष व्रत पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 3:03 PM IST

Guru Pradosh Vrat Katha: आज यानी 8 अक्टूबर को गुरु प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है. यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है. इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं. साथ ही, शिवलिंग पर जल, दूध, फूल और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन और श्रद्धा के साथ गुरु प्रदोष व्रत रखने और भगवान शिव की पूजा करने से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होते हैं. इसके साथ ही व्यक्ति के जीवन की बाधाएं भी दूर होती हैं. 

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कहा जाता है कि प्रदोष व्रत की पूजा के बाद व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. माना जाता है कि कथा पढ़ने या सुनने से व्रत का पुण्य फल प्राप्त होता है. ऐसे में आइए जानते हैं प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा. 

गुरु प्रदोष व्रत कथा (Guru Pradosh Vrat Katha)

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार देवराज इंद्र और असुरराज वृत्रासुर के बीच छिड़ गया था. इस संघर्ष में देवताओं ने असुरों की सेना को काफी हद तक परास्त कर दिया. अपनी सेना को संकट में देखकर वृत्रासुर स्वयं रणभूमि में उतर आया. उसने अपनी मायावी शक्ति का इस्तेमाल कर बेहद भयावह रूप धारण कर लिया. उसका विकराल रूप देखकर देवता घबरा गए और मार्गदर्शन के लिए देवगुरु बृहस्पति के पास पहुंचे. 

देवताओं की बात सुनने के बाद बृहस्पति ने उन्हें वृत्रासुर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात बताई. उन्होंने कहा कि वह केवल एक शक्तिशाली असुर ही नहीं, बल्कि भगवान शिव का परम भक्त और कठोर तप करने वाला साधक भी है. बताया जाता है कि पूर्व जन्म में वृत्रासुर चित्ररथ नाम का राजा था. 

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एक बार चित्ररथ कैलाश पर्वत पहुंचा. वहां उसने भगवान शिव को माता पार्वती के साथ देखा और ऐसी बात कह दी, जो माता पार्वती को बेहद अनुचित लगी. चित्ररथ ने भगवान शिव के गृहस्थ रूप को लेकर व्यंग्य किया. भगवान शिव ने उसके शब्दों को सहजता से लिया, लेकिन माता पार्वती उसके व्यवहार से क्रोधित हो गईं. 

माता पार्वती ने चित्ररथ को उसके अहंकार और अनुचित व्यवहार के लिए शाप दे दिया. उनके श्राप के प्रभाव से चित्ररथ को असुर योनि में जन्म लेना पड़ा.  आगे चलकर ऋषि त्वष्टा की तपस्या और साधना से वृत्रासुर का जन्म हुआ. बचपन से ही वह भगवान शिव की भक्ति में लीन रहा और उसने कठोर तपस्या करके महादेव को प्रसन्न किया. 

देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र को सलाह दी कि वृत्रासुर शिव का भक्त है, इसलिए भगवान शिव की आराधना और गुरु प्रदोष व्रत का पालन करना उनके लिए फलदायी रहेगा. इंद्र ने बृहस्पति की बात मानकर श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत किया और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की. धार्मिक मान्यता है कि व्रत और भगवान शिव की उपासना के प्रभाव से इंद्र को वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली.  

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