भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बैद्यनाथ धाम पर इन दिनों श्रावणी मिला लगा हुआ है. सावन के महीने में भक्त यहां दूर-दूर से आते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं. यहां स्थित शिवलिंग को कामना लिंग जाता है. कहते हैं कि इस शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भोलेनाथ अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण कर देते हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि बैद्यनाथ धाम में दूसरे मंदिरों, शिवालयों की तरह त्रिशूल नहीं है. यहां पंचशूल स्थापित है. मान्यताएं हैं कि यह पंचशूल मंदिर की रक्षा करता है और इसे एक दिव्य सुरक्षा कवच के रूप में भी देखा जाता है.
क्यों खास है बैद्यनाथ का पंचशूल?
धर्म-शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि बैद्यनाथ के पंचशूल के दर्शन करना बहुत शुभ होता है. मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं. भगवान शिव ने अपने प्रिय शिष्य शुक्राचार्य को पंचशूल बनाने की विधि बताई थी. बाद में पंचशूल बनाने की यह विधि रावण तक पहुंच गई थी.
कहा जाता है कि रावण ने अपने सोने की लंका की चारों दिशाओं में पंचशूल स्थापित करवाए थे. इसी वजह से लंका की सुरक्षा इतनी मजबूत हो गई थी कि भगवान राम के लिए भी उसे भेदना आसान नहीं था. बाद में जब विभीषण ने इसका इस रहस्य से पर्दा उठाया तो अगस्त्य मुनि ने पंचशूल को निष्क्रिय करने का उपाय बताया. मान्यता है कि रावण ने बाबा बैद्यनाथ मंदिर पर भी पंचशूल स्थापित करवाया था. ताकि मंदिर को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे.
पंचशूल का धार्मिक महत्व
भगवान शिव का प्रिय मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' पांच अक्षरों का है, जिसे पंचाक्षरी मंत्र कहा जाता है. शिव के पंचमुख स्वरूप का भी विशेष महत्व है. कई विद्वान पंचशूल को इन्हीं पांच दिव्य शक्तियों से जोड़कर देखते हैं. कुछ धर्माचार्या पंचशूल इंसान के पांच प्रमुख विकारों- काम, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या का नाश करने का भी दावा करते हैं. कुछ इसे पंचतत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु का प्रतीक भी मानते हैं.
दर्शन न हो पाएं तो पंचशूल के दर्शन भी शुभ
मान्यता है कि यदि किसी कारण श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ के गर्भगृह तक नहीं पहुंच पाता, तो केवल पंचशूल के दर्शन करने से भी उसे पुण्य की प्राप्ति होती है.
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