अगर रणथंभौर की पहचान किसी एक बाघिन से जुड़ी है, तो वह है मछली... टाइगर कोड T-16 वाली इस बाघिन को पहली बार 1996 में देखा गया था. उसके चेहरे पर बने मछली जैसे निशान की वजह से उसका नाम 'मछली' पड़ गया. धीरे-धीरे मछली रणथंभौर की पहचान बन गई. पर्यटक दुनिया के अलग-अलग देशों से सिर्फ उसकी एक झलक पाने आते थे. उसे 'रणथंभौर की रानी', 'झीलों की रानी' और 'मगरमच्छ का शिकार करने वाली बाघिन' जैसे नाम मिले.
वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, 1998 से 2009 के बीच मछली की लोकप्रियता ने रणथंभौर के पर्यटन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उसके कारण देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक आए और इससे भारत के वन्य पर्यटन को आर्थिक मजबूती भी मिली. संरक्षण और पर्यटन में योगदान के लिए उसे 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया. भारत सरकार ने उसके सम्मान में डाक टिकट और विशेष पोस्टल कवर भी जारी किया.
मछली ने करीब 20 साल की उम्र तक जंगल में जीवन बिताया, जो सामान्य बाघों की औसत उम्र से काफी अधिक है. उसके जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री 'The World's Most Famous Tiger' को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला.
और फिर आया 'डॉलर'... जिसने बाघ होने की परिभाषा ही बदल दी
रणथंभौर की दूसरी सबसे चर्चित कहानी है डॉलर (T-25) की... डॉलर को उसके शरीर पर बने डॉलर जैसे निशान की वजह से यह नाम मिला. लेकिन उसकी असली पहचान उस व्यवहार से बनी, जिसकी कल्पना भी शायद किसी ने नहीं की थी.
साल 2011 में कचीदा क्षेत्र में एक बाघिन की मौत हो गई. उसके पीछे करीब तीन महीने की दो मादा शावक बीना-1 (ST-9) और बीना-2 (ST-10) अनाथ रह गईं. जंगल के नियम कहते हैं कि ऐसे शावकों का बचना बेहद मुश्किल होता है. लेकिन यहां कहानी बदल गई.
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नेचर गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष यादवेन्द्र सिंह बताते हैं कि डॉलर ने इन दोनों शावकों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाया. उल्टा, वह उनके साथ रहने लगा. वन विभाग शावकों के लिए भोजन की व्यवस्था करता था, जबकि डॉलर हर वक्त उनके आसपास मौजूद रहता था. दूसरे बाघों और जंगली जानवरों से उनकी रक्षा करता, उन्हें अकेला नहीं छोड़ता और धीरे-धीरे शिकार करना भी सिखाता रहा.
करीब ढाई साल तक डॉलर ने इन शावकों की ऐसे देखभाल की, जैसे कोई पिता अपने बच्चों की करता है. बाद में जब दोनों शावक बड़ी हो गईं, तो वर्ष 2014 में उन्हें सरिस्का टाइगर रिजर्व भेज दिया गया.
वन अधिकारियों को भी चौंका गया यह व्यवहार
रणथंभौर टाइगर रिजर्व के डीएफओ मानस सिंह कहते हैं कि सामान्य तौर पर बाघ एकाकी (Solitary) स्वभाव का जीव होता है. ढाई से तीन साल बाद वह अपने शावकों से भी दूरी बना लेता है. कई बार टेरिटरी को लेकर अपने ही परिवार के बाघों से संघर्ष भी होता है.
ऐसे में डॉलर का व्यवहार वन्यजीव विज्ञान के लिहाज से बेहद अलग और दुर्लभ माना जाता है. बिना जैविक संबंध के दो शावकों की रक्षा करना, उन्हें बड़ा करना और शिकार सिखाना असाधारण है.
जनवरी 2020 में डॉलर की मौत एक दूसरे नर बाघ T-66 के साथ टेरिटोरियल संघर्ष में हो गई. पोस्टमार्टम में उसके सिर की हड्डियां टूटी हुई मिली थीं. उसकी उम्र करीब 15 वर्ष थी. आज रणथंभौर में 77 बाघ हैं. नई पीढ़ी के कई टाइगर पर्यटकों का आकर्षण हैं. लेकिन जब भी इस जंगल के इतिहास की बात होगी, मछली और डॉलर के बिना वह कहानी अधूरी रहेगी.
एक ने पूरी दुनिया को रणथंभौर की ओर आकर्षित किया. दूसरे ने यह साबित किया कि जंगल के अपने नियम होते हैं, लेकिन कभी-कभी प्रकृति भी ऐसे अपवाद रच देती है, जिन्हें देखकर इंसान भी हैरान रह जाता है.
सुनील जोशी