ममता बनर्जी और उनके पास बचे हुए साथी भले ही बीजेपी पर टीएमसी को तोड़ने का इल्जाम रहे हों, लेकिन एक सरकारी फैसले ने दोनों विरोधी गुटों को एक सुर में बोलने का मौका दे दिया है. मुद्दा है कोलकाता के सरकारी स्कूलों में मिड डे मील में संभावित बदलाव का. अभी यह साफ नहीं है कि मिड डे मील में अंडा परोसा जाएगा या नहीं, क्योंकि सरकार की तरफ से ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के नेता लगातार आरोप लगा रहे थे कि अगर बीजेपी सत्ता में आई, तो बंगाली समाज की थाली पर पाबंदी लग जाएगी. खान-पान की निगरानी होने लगेगी. मांस-मछली और अंडे खाने को नहीं मिलेंगे.
तृणमूल कांग्रेस के आरोपों को काउंटर करने के लिए बीजेपी के कई उम्मीदवार हाथों में मछली लिए घूम घूमकर वोट मांगने लगे, और बीजेपी के कई बड़े नेताओं को तो खाने की प्लेट में मछली लिए भी दिखाया गया था. चुनाव नतीजे तो यही बताते हैं कि लोगों को ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं के आरोपों में कोई दम नजर नहीं आया, और बीजेपी दिल खोलकर वोट दिया. और, टीएमसी को वैसे वोट दिए जैसे 2021 में बीजेपी को 100 सीटों के अंदर समेट दिया था.
चुनाव नतीजे आने के महीने भर के भीतर टीएमसी कोलकाता से दिल्ली तक टुकड़े टुकड़े हो गई, लेकिन मिड डे मील से अंडा हटाए जाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के फैसले ने इस मुद्दे पर एक साथ खड़ा कर दिया है.
टीएमसी के बागी गुट के विधायक ऋतब्रत बनर्जी से लेकर ममता बनर्जी गुट के नेता कुणाल घोष और डेरेक ओ ब्रायन मिड डे मील से अंडा हटाए जाने पर एक जैसे सवाल उठा रहे हैं. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बने अभी दो महीने भी नहीं हुए हैं - क्या ममता बनर्जी ने चुनावों के दौरान जो आशंका जताई थी, उसके रुझान आने लगे हैं.
बंगाल में अंडे का नया फंडा
पश्चिम बंगाल सरकार का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने घोषणा की थी कि पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में मिड डे मील की जिम्मेदारी इस्कॉन (ISKCON) को दी जाएगी. मिड-डे मील पॉलिसी के तहत प्राइमरी स्कूलों में हर छात्र को दिए जाने वाले भोजन की लागत 6.78 रुपये से बढ़ाकर 10 रुपये कर दी गई है. माना जा रहा है कि कोलकाता में यह व्यवस्था लागू होने में एक से दो महीने लग सकते हैं, क्योंकि ISKCON को शहर में रसोईघर और इंतजाम भी करने होंगे.
सरकारी घोषणा के बाद से ही आशंका जताई जाने लगी है कि जब इस्कॉन ग्रुप मिड डे मील तैयार करेगा तो वह वेजीटेरियन फूड ही होगा. मतलब, आगे से स्कूलों में जब मिड डे मील परोसा जाएगा तो उसमें अंडा नहीं होगा. वैसे इस्कॉन कोलकाता के उपाध्यक्ष राधारमण दास का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा मेन्यू इस्कॉन की ओर से जारी नहीं किया गया है, और अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. राधारमण दास के मुताबिक, मेन्यू तय होने के बाद आधिकारिक घोषणा की जाएगी.
मिड डे मील पर बीजेपी सरकार के फैसले पर विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कड़ा विरोध जताया है. तृणमूल कांग्रेस नेता डेरेक ओ ब्रायन का कहना है कि अंडा लोगों को फेंककर मारने के लिए है, लेकिन बच्चों को पौष्टिकता से वंचित किया जा रहा है.
तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुट हमलावर
तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी का कहना है, जब बात प्रोटीन की हो, तो भोजन से अंडा हटाना सही नहीं है, क्योंकि यह प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत है. बंगाल में लोग परंपरागत रूप से मांसाहारी भोजन करते हैं. अगर इन्हें हटा दिया जाता है, तो केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाएगा, जो बंगाल की खान-पान की परंपराओं के मुताबिक नहीं है. हम इस कदम का कड़ा विरोध करते हैं.
ऋतब्रत बनर्जी कहते हैं, बंगाल की पांच हजार साल पुरानी परंपरा रही है कि यहां के बच्चों के भोजन में एनिमल प्रोटीन शामिल किया जाता है. अगर इस्कॉन मिड-डे मील से मांसाहार हटाता है, तो इससे न केवल अंडे बंद हो जाएंगे, बल्कि मसूर की दाल भी मेन्यू से बाहर हो जाएगी. यह बंगाल की संस्कृति और परंपरा के माफिक नहीं है.
ममता बनर्जी गुट के टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने कहा है, फिलहाल मिड-डे मील में अंडे दिए जाते हैं... लेकिन, अब सरकार की ओर से संकेत मिल रहे हैं कि अंडे शामिल नहीं किए जाएंगे. ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार मिड-डे मील तैयार करने की जिम्मेदारी इस्कॉन को सौंपने पर विचार कर रही है. यह अत्यंत सम्मानित संस्था है, लेकिन समस्या है कि बच्चों को भोजन कराना एक बड़ी चुनौती है.
टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने सोशल साइट X पर लिखा है, चुनाव कैंपेन में मछली खाने के तमाशे के बाद आखिरकार अब गुजरात जिमखाना का असली चेहरा सामने आ गया है. बंगाल में नई भाजपा सरकार काम पर लग गई है. विरोधियों पर अंडे फेंको, लेकिन बच्चों को मिड डे मील से अंडे हटाकर पोषण से वंचित करो, उन पर शाकाहार थोपो. बंगाल इसे स्वीकार नहीं करेगा.
सरकार का पक्ष
बीजेपी सरकार के फैसले का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के कैबिनेट साथी इंद्रनील खान ने कहा कि इस्कॉन की ओर से जो भोजन स्कूली बच्चों को दिया जाएगा, वह पूरी तरह से डाइटीशियन की देखरेख में तैयार होगा. बच्चों के स्वास्थ्य के लिए भोजन में प्रोटीन और विटामिन की मात्रा का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा.
पश्चिम बंगाल के स्कूली शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन का तर्क है, हमारे समाज में, और दुनिया भर में करोड़ों लोग पूरी तरह शाकाहारी भोजन करके स्वस्थ जीवन जी रहे हैं... शाकाहारी भोजन में पर्याप्त पोषण होता है और उसमें शारीरिक विकास के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं... यह कहना तर्कसंगत नहीं है कि बच्चों के पोषण के लिए अंडा खाना अनिवार्य है.
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल विधानसभा में मिड डे मील पर सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा, हमने मिड-डे मील तैयार करने की जिम्मेदारी इस्कॉन को दी है. अगर आपको इस पर आपत्ति है, तो 'हरे कृष्ण' मत बोलिए, कोई आपको मजबूर नहीं करेगा. आपको अच्छा और शुद्ध भोजन मिलेगा. चिंता की कोई बात नहीं है.
ISKCON का क्या कहना है
राधारमण दास के मुताबिक, इस्कॉन फिलहाल 8 राज्यों के 20 से अधिक शहरों में करीब 12 लाख छात्रों को मिड डे मील मुहैया करा रहा है. द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में राधारमण दास ने कहा, पिछले 20-22 साल से हम पूरे भारत में मिड डे मील चला रहे हैं. बड़ी संख्या में लोग इस्कॉन के भोजन की तारीफ करते हैं.
शाकाहारी मेन्यू से स्कूली बच्चों के पोषण पर असर से जुड़ी आशंकाओं को खारिज करते हुए राधारमण दास कहते हैं, स्थानीय खान-पान की पसंद को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की मदद से स्कूलों का मेन्यू अभी तय किया जाना बाकी है. उनका तर्क है, चैतन्य महाप्रभु बंगाली थे. और हम गौड़ीय परंपरा का पालन करते हैं. हम दुनिया भर में बंगाली थाली परोसते हैं. यह कहना गलत है कि बंगाली थाली केवल अंडे या मांस से ही पूरी होती है. मेन्यू में चावल, दाल, खिचड़ी और सब्जी होगी. यह सोचना गलत है कि थाली में प्रोटीन की कमी होगी. सोया-चंक्स और राजमा जैसी कई चीजें प्रोटीन से भरपूर होती हैं.
राधारमण दास का कहना है कि पहले भी कुछ जगहों पर शुरू में लोगों की तरफ से चिंता जताई गई, लेकिन बाद में सभी आशंकाएं खत्म भी हो गईं. राधारमण दास ने बताया, शुरू में कुछ जगहों पर विरोध हुआ था, लेकिन जब हमने भोजन देना शुरू किया और लोगों ने उसे खाया, तो सभी ने उसके स्वाद और क्वालिटी की प्रशंसा की.
स्कूली शिक्षकों की फिक्र
सरकार और विपक्ष की राजनीति अपनी जगह है, इस्कॉन का आश्वासन भी अपनी जगह ठीक हो सकता है, लेकिन स्कूली शिक्षकों की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. कुछ स्कूली शिक्षक आशंका जता रहे हैं कि अंडा न मिलने पर कहीं बच्चे स्कूल आना बंद न कर दें. वैसे मिड डे मील बच्चों को स्कूल की तरफ आकर्षित करने के लिए ही शुरू की गई थी. ऐसे शिक्षकों का कहना है कि लंबे समय से अंडा बच्चों के पोषण के साथ-साथ उनकी स्कूल में उपस्थिति बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता रहा है.
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में नेताजी सुभाष प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर देबब्रत पंती कहते हैं, मिड डे मील स्कीम में अंडा बच्चों के सबसे पसंदीदा खाद्य पदार्थों में से एक रहा है. देबब्रत पंती ने बताया, हमारे स्कूल में मछली कभी नहीं दी गई, क्योंकि यह प्राइमरी स्कूल है. बच्चों को अंडे बहुत पसंद हैं, जो हफ्ते में एक बार दिए जाते हैं... जिस दिन अंडा मिलता है, उस दिन स्कूल में उपस्थिति हमेशा ज्यादा रहती है.
देबब्रत पंती के अनुसार, पश्चिम बंगाल के बच्चे शाकाहारी भोजन को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं नजर आते हैं. एक अन्य शिक्षक का कहना था, यह खान-पान की आदतें थोपने जैसा है... कई छात्र पनीर, राजमा और छोले जैसे खाद्य पदार्थों से परिचित नहीं हैं, क्योंकि ये उनकी नियमित फूड कल्चर का हिस्सा नहीं हैं... जिन स्कूलों में अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों की संख्या ज्यादा है, वहां अभिभावकों की ओर से भी विरोध हो सकता है... मेरा मानना है कि कम-से-कम विकल्प तो दिया जाना चाहिए था. मिड-डे मील बच्चों को स्कूल लाने का अहम माध्यम है.
स्कूल शिक्षकों का मानना है कि बच्चों के साथ साथ मिड डे मील में बदलाव का असर महिला रसोइयों पर भी पड़ सकता है. रसोइयों को करीब 2,000 रुपये महीने मिलते हैं, और उनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है. एक शिक्षक का कहना है, हमारे स्कूल में तीन महिलाएं यह काम करती थीं... अब उनका रोजगार छिन सकता है.
मृगांक शेखर