बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कैडिला फार्मास्यूटिकल्स की याचिका पर सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) को नसीहत दी. अदालत ने प्रशासनिक कड़ाई पर टिप्पणी करते हुए पूछा- “मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?” कानून की किताब में इसे 'Principle of Proportionality' कहा जाता है, यानी कार्रवाई उतनी ही होनी चाहिए जितना बड़ा अपराध हो.
सवाल यह है कि एक दवा कंपनी की कथित अनियमितता को 'मच्छर' जितना मामूली क्यों मान लिया गया? क्योंकि इतनी ऊंच-नीच को ‘सिस्टम’ मान लिया गया है. जबकि हर 25 में से एक दवा का सैंपल फेल होता है. सब-स्टैंडर्ड होने की वजह से, मिलावट की वजह से, और कई अन्य कारणों से. अब आप पूछेंगे कि महाराष्ट्र FDA की सख्ती को 'तलवारबाजी' क्यों करार दिया गया? जबकि महाराष्ट्र में FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे कर वही रहे हैं, जो उस पद पर रहने वाले अधिकारी को करना चाहिए. लेकिन, सिस्टम कहता है कि इतना तेज होने की क्या जरूरत है. थोड़ा धीरे चलो. थोड़ा झुककर चलो.
बात दवाओं की गुणवत्ता और मरीज की सेहत से जुड़ी क्यों न हो. जब देश में बेहतर इलाज पाना आम नागरिक के लिए एक लक्जरी हो, तब दवा कंपनियों के गिरेबां में झांकना बेअदबी ही कहा जाएगा.
अनियमितताओं के ‘मच्छर’
1. बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कैडिला फार्मा को एक महीने में राहत मिल गई है. कंपनी पर आरोप था कि उसकी कुछ दवाओं के नाम दूसरी दवाओं से मिलते-जुलते हैं, जो कि मरीज के लिए गफलत पैदा कर सकते हैं. FDA पर आरोप लगा कि उसने कार्रवाई करने में जल्दबाजी दिखाई. बिक्री पर रोक लगा दी, और करीब ढाई करोड़ की दवा जब्त कर ली. अब कोर्ट के आदेश के बाद FDA की तलवार म्यान में आ गई है. और कैडिला फार्मा का ‘मच्छर’ फुर्र हो गया है.
2. कैडिला फार्मा के मुकाबले जैक्सन लेबोरेटरीज को राहत के लिए तीन महीने इंतजार करना पड़ा. ये वही कंपनी है, मई महीने में जिसके ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाने के बाद राजस्थान में पांच गर्भवती महिलाओं की मौत हो गई थी. जांच में सामने आया था कि जीवन रक्षक इंजेक्शन में दवा की जगह, पानी भरा था. जनता के दबाव में कंपनी की पंजाब और हरियाणा फैक्ट्री पर ताला लगा दिया गया. लेकिन, हिमाचल वाली फैक्ट्री का जून में रद्द हुआ लाइसेंस जुलाई में बहाल कर दिया गया. पंजाब वाली फैक्ट्री को खोलने की अपील पर सुनवाई 14 अगस्त को होगी. उम्मीद कीजिए कि यहां भी हिमाचल की तरह मच्छर को राहत मिल जाए.
3. अब आते हैं स्रीसन फार्मास्यूटिकल्स के मामले पर. इसका ‘मच्छर’ जरा ज्यादा खतरनाक साबित हुआ था. कंपनी के जहरीले 'कोल्ड्रिफ' कफ सिरप से मध्य प्रदेश में 21 मौतों के बाद तमिलनाडु में कंपनी का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था. दस महीने हो गए हैं, ये लाइसेंस अब तक बहाल नहीं हो पाया है. क्या पता, स्रीसन को नए नाम से पुनर्जन्म लेना पड़े. मच्छरों का तो पता नहीं, लेकिन फार्मा कंपनियों में ये बहुत कॉमन है.
मच्छरों की वैरायटी और उनका दायरा
किसी को मलेरिया, चिकनगुनिया और डेंगू हो न हो, लेकिन मच्छर के काटने भर से इन बीमारियों का ख्याल तो आ ही जाता है. जो जानलेवा तक साबित हो जाती हैं. ग्लोबल फार्मेसी कहे जाने वाले हिंदुस्तान में दवा कंपनियों की कारगुजारियां नकली दवा से लेकर सब-स्टैंडर्ड दवा बनाने तक फैली हुई हैं. अब आपको कौन सा कैप्सूल मिल रहा है, ये आपकी किस्मत. राजस्थान के कोटा में जिन गर्भवती महिलाओं को ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाया गया था, उन्होंने तो यही सोचा था कि उन्हें दर्द और अत्यधिक खून के रिसाव से राहत मिलेगी. वैसे ही जैसे जम्मू-कश्मीर से लेकर गांबिया और उज्बेकिस्तान में 200 बच्चों को भारत में बना कफ सीरप यही सोचकर दिया गया था कि उससे उनकी सांसें सामान्य होंगी. क्या पता था कि सांसें उखड़ ही जाएंगी.
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2014-2025 के बीच देश भर में जांचे गए दवा नमूनों में से लगभग हर 25 में से 1 सैंपल (4% से 5%) गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे. और उस पर भी खरी बात ये कि आम आदमी को इसका पता ही नहीं चला कि कौन सी दवा की कौन सी बैच का सैंपल फेल हुआ. जानकार मानते हैं कि दवा कंपनियां इसलिए भी अनियमितता कर पा रही हैं कि इतनी विशालकाय इंडस्ट्री पर नजर रखने के लिए पर्याप्त ड्रग इंस्पेक्टर्स और मान्यता प्राप्त टेस्टिंग लैब्स हैं ही नहीं.
जहां नकली या सब-स्टैंडर्ड दवा पकड़ी भी जा रही है, तो अदालती प्रक्रिया इतनी धीमी है कि फैसला आते-आते उसका असर ही खो जा रहा है. कौन सी दवा का कौन सा बैच फेल हुआ है, इसकी जानकारी आम नागरिक तक सीधे और आसान तरीके से पहुंचने का कोई स्थायी जरिया नहीं है.
मच्छरों की कृपा बनी रहे
जब अदालत 'मच्छर मारने के लिए तलवार न चलाने' की बात करती है, तो वह विभागीय अति-उत्साह पर अंकुश लगाने का कानूनी तर्क हो सकता है. परंतु आम आदमी के नजरिये से देखें तो बड़ा सवाल यही है कि बीमार की सेहत से जुड़ी ढिलाई को 'मच्छर' मानकर छोड़ दिया जाएगा, तो फिर 'गंभीर अपराध' किसे माना जाएगा?
जब तक नकली और सब-स्टैंडर्ड दवाएं नॉर्मली बनाई और बेची जा रही हैं, दवा कंपनियों की अनियमितता को मामूली उल्लंघन माना जा रहा है, तब तक तुकाराम मुंढे जैसे अधिकारियों का एक्शन असंतुलित ही दिखता रहेगा. और एक आम मरीज के पास दवा की खुराक लेते समय सिर्फ यही प्रार्थना करने का विकल्प बचेगा कि पर्ची पर लिखा नाम कम से कम नुकसान पहुंचाए.
धीरेंद्र राय