टीवी सीरियल की कहानियों में सबसे दिलचस्प होता है- ट्विस्ट. अचानक से पता चलता है कि जिसे विलेन समझा जा रहा है, वो हीरो है. जिसे मरा समझकर छोड़ दिया गया है, वो दरअसल जिंदा है. सीरियल में ‘वापसी’ की इन कहानियों को खूब पसंद किया जाता है. क्योंकि, एक दर्शक के रूप में हमें ‘ट्विस्ट’ पसंद है. स्मृति ईरानी के राजनीतिक सफर को लें, तो वह भी ऐसे ही ट्विस्ट से भरा पड़ा है. जब-जब ये समझा गया कि उनकी राजनीति खत्म हो गई है, वे वापसी करती हैं. पहले से ज्यादा ताकत के साथ. अपने सीरियलों की तरह.
एपिसोड 1: ग्लैमर की जमीनी हकीकत (2003–2014)
भारतीय राजनीति का ट्रेंड रहा है कि यहां ग्लैमर केवल चकाचौंध और क्षणिक कामयाबी के लिए होता है, संजीदा राजनीति के लिए नहीं. साल 2003 में जब टीवी के बेहद लोकप्रिय सीरियल ‘सास भी कभी बहू थी’ की लीड 'तुलसी बहू' यानी स्मृति ईरानी ने राजनीति में कदम रखा, तो लुटियंस दिल्ली के पॉलिटिकल एलीट ने उन्हें तुरंत एक सांचे में ढाल दिया. वही कि एक टीवी एक्ट्रेस ग्लैमरस चेहरे के दम पर लाइमलाइट तो बटोरेगी, लेकिन राजनीति के दांव-पेच दो दिन भी नहीं सह पाएगी.
लेकिन जब स्मृति ईरानी ने टीवी की चकाचौंध छोड़कर चांदनी चौक की तंग गलियों और फिर 2014 में कांग्रेस के अभेद्य गढ़ 'अमेठी' का रुख किया, और पुरानी सभी धारणाओं को चूर-चूर कर दिया. जब उनके बैकग्राउंड और डिग्री पर सवाल उठाए गए, तो उन्होंने 2014 में करारा जवाब दिया-
"जो लोग मेरी एजुकेशन और मेरे एक्टिंग बैकग्राउंड पर सवाल उठा रहे हैं, वे भूल जाते हैं कि लोकतंत्र किसी पारिवारिक रियासत का नाम नहीं है. मुझसे मेरी डिग्री पूछने वाले जरा ये बताएं कि अमेठी के गांवों में 60 साल से सड़कें और स्कूल क्यों गायब हैं? क्या विकास के लिए किसी खास खानदान में पैदा होना जरूरी है?"
भले ही वे 2014 का चुनाव हार गईं, लेकिन राहुल गांधी की जीत के अंतर को 3.7 लाख से घटाकर महज 1.07 लाख पर ला पटका. उन्होंने साबित किया कि ग्लैमर का मतलब सिर्फ टीवी स्क्रीन की चमक नहीं, बल्कि जनता के बीच उतरने का हौसला भी हो सकता है. अमेठी की हार के बाद यह कहा गया कि पार्टी ने उनका इस्तेमाल कर लिया है. अब उनका खेल खत्म. लेकिन बीजेपी नेतृत्व उन्हें मंत्रिमंडल तक ले आया. शिक्षा मंत्रालय (HRD) जैसा अहम महकमा सौंप दिया.
एपिसोड 2: नाज़ुक छवि, लेकिन संसद में ज्वालामुखी (2014–2018)
जब 2014 में स्मृति ईरानी को जब शिक्षा मंत्री बनाया गया, तो विरोधियों ने एक नई धारणा बनाई कि 'इन्हें सिर्फ सजावटी पद दिए जा सकते हैं, संकट और भारी दबाव में ये बिखर जाएंगी.' हैदराबाद यूनिवर्सिटी (रोहित वेमुला सुसाइड) और जेएनयू विवाद (कन्हैया कुमार-उमर खालिद नारेबाजी प्रकरण) के दौरान जब पूरे विपक्ष ने उन्हें संसद में घेरने की रणनीति बनाई, तो यह माना जा रहा था कि वे बैकफुट पर आ जाएंगी. लेकिन फरवरी 2016 में लोकसभा में खड़े होकर स्मृति ईरानी ने जिस आक्रामक अंदाज में पलटवार किया, उसने इस धारणा की धज्जियां उड़ा दीं-
"My name is Smriti Irani. I challenge you to tell me my caste! (मेरा नाम स्मृति ईरानी है, मैं तुम्हें चुनौती देती हूं कि मेरी जाति बताकर दिखाओ.)"
"रोहित वेमुला के शव का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार की तरह किया गया. Do not play politics with me. शिक्षा को अपनी राजनीति की प्रयोगशाला मत बनाइए. मैं राजनीति छोड़ दूंगी अगर कोई भी यह साबित कर दे कि मैंने शिक्षा का भगवाकरण किया है. मैं आपकी इंडिया की परिभाषा को प्रमाणित नहीं कर रही, लेकिन मेरी इंडिया की परिभाषा को नीचा दिखाने का हक भी आपको नहीं है."
हालांकि विपक्ष ने इसे स्मृति ईरानी का 'ड्रामा' करार दिया, लेकिन समर्थकों ने माना कि उन्होंने राजनीति में महिलाओं को 'कमजोर या नाजुक' समझने की मानसिकता पर करारी चोट की है. यूनिवर्सिटीज़ में हो रही कलह के बीच जुलाई 2016 में उन्हें HRD मिनिस्टर के पद से हटा दिया गया.
एपिसोड 3: अमेठी का 'किला' और गांधी परिवार का तिलस्म भंग (2019)
देश के राजनीतिक पंडितों की सालों पुरानी धारणा थी कि अमेठी जैसे पारंपरिक गढ़ों को हिलाया नहीं जा सकता और गांधी परिवार को वहां कोई हरा नहीं सकता. स्मृति ईरानी को 2014 में हराने के बाद माना जा रहा था कि वे अब हार मानकर वापस लौट जाएंगी.
लेकिन लगातार 5 साल तक अमेठी के गांवों की धूल फांककर उन्होंने इस धारणा को भी चूर-चूर कर दिया. मई 2019 में जब उन्होंने राहुल गांधी को 55,120 वोटों से हराकर इतिहास रचा, तो वे देश की सबसे बड़ी 'जायंट किलर' बनकर उभरीं. जीत दर्ज करने के बाद उनका बयान इस धारणा के टूटने का प्रतीक बना-
"अमेठी ने आपको जादू दिखा दिया. जो लोग पचास साल तक अमेठी पर राज करने के बाद भी यहां एक बस स्टैंड और अस्पताल नहीं बनवा सके, वे देश को विकास का भाषण दे रहे थे. आपने अमेठी को सिर्फ अपना वोट बैंक समझा, लेकिन अमेठी ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र में हुकूमत जनता की होती है, किसी नामदार परिवार की नहीं."
एपिसोड 4: महिला नेतृत्व के दोहरे मानक और बेबाक प्रहार (2020–2023)
अमेठी विजेता स्मृति ईरानी मोदी सरकार की दूसरी पारी में जब संसद पहुंचीं तो वे बहुत आक्रामक रहीं. जबकि राजनीतिक गलियारों में महिला नेताओं को केवल सौम्य, रक्षात्मक और सीमित दायरों में रहकर बोलने वाला ही समझा गया. जब भी स्मृति ईरानी ने आक्रामक होकर विपक्ष के शीर्ष नेताओं पर सीधा हमला बोला, उन्हें 'घमंडी' या 'अहंकारी' की लेबलिंग दी गई. राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा-
"जो लोग भारत को जोड़ने निकले हैं, वे पहले यह बताएं कि उन्होंने उस गिरोह का समर्थन क्यों किया था जिसने कहा था 'भारत तेरे टुकड़े होंगे'? जो लोग कन्याकुमारी से कश्मीर तक टहल रहे हैं, वे अपनी ही पार्टी को बिखरने से नहीं रोक पा रहे."
विपक्ष ने जब उनके तेवरों को मुद्दा बनाया, तो उन्होंने इस दोहरे मानदंड को ध्वस्त करते हुए अपना चर्चित बयान दिया-
"जब एक पुरुष नेता आक्रामक होता है, तो उसे मजबूत और निर्णायक (decisive) कहा जाता है. लेकिन जब एक महिला नेता अपने हक के लिए मजबूती से बोलती है, तो उसे 'घमंडी' या 'अहंकारी' घोषित कर दिया जाता है. I try to behave like a lady, but when you work like a horse, you do tend to kick around a bit! (मैं एक महिला की तरह व्यवहार करने की कोशिश करती हूं, लेकिन जब आप घोड़े की तरह दिन-रात काम करते हैं, तो कभी-कभी दुलत्ती भी चलती है.)"
एपिसोड 5: हार का मतलब 'राजनीतिक अंत' का भ्रम (2024)
जून 2024 के लोकसभा चुनाव में जब अमेठी से स्मृति ईरानी को किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार का सामना करना पड़ा और उन्हें नई सरकार के मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, तो विरोधियों ने तुरंत मान लिया कि 'स्मृति ईरानी का राजनीतिक करियर अब समाप्त हो चुका है, वे अब अप्रासंगिक हो गई हैं.'
विरोधी खेमे ने कहा कि बड़बोलेपन का अंत ऐसा ही होता है. लेकिन इस धारणा के विपरीत, उन्होंने कोई जल्दबाजी या हताशा दिखाने के बजाय गहरी परिपक्वता और संयम का परिचय दिया-
"मैंने अमेठी में 10 साल दिए, हर गांव में विकास पहुंचाने की कोशिश की. जीवन में जीत और हार दोनों का स्वागत होना चाहिए. संगठन का कार्यकर्ता होना मेरी पहली पहचान थी और रहेगी. जो लोग सोच रहे हैं कि मेरी यात्रा समाप्त हो गई, वे भूल रहे हैं कि संघर्ष ही मेरी असल पहचान है."
एपिसोड 6: फिर वापसी (2026)
दो साल से स्मृति ईरानी खामोश रहीं. उन्हें संगठन में छुटपुट दायित्व मिले. आखिर सोमवार को ऐलान किया गया कि भाजपा की नई केंद्रीय टीम में स्मृति ईरानी भी शामिल की गई हैं. उन्हें 'राष्ट्रीय महासचिव' की बड़ी और अहम जिम्मेदारी सौंपी गई. इस नियुक्ति ने उन सभी कयासों और धारणाओं को एक झटके में खारिज कर दिया कि हार के बाद उनका राजनीतिक वजूद खत्म हो गया है.
संगठन के शीर्ष पद पर वापसी करते हुए उन्होंने अपनी पूरी यात्रा का सार कुछ यूं रखा-
"एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के पद तक की यह यात्रा मुझे अत्यंत विनम्र बनाती है. पद आते हैं और जाते हैं, चुनाव जीते और हारे जाते हैं. लेकिन संगठन के प्रति निष्ठा और जमीनी संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता. राजनीतिक जीवन में आपकी तपस्या और धैर्य ही आपकी सबसे बड़ी ताकत होती है."
स्मृति ईरानी की पूरी कहानी असल में उनके बारे में हर बनाई गई धारणाओं के ढहने की दास्तान है. चाहे वह ग्लैमर का भ्रम हो, अभेद्य किलों का घमंड हो, या फिर हार के बाद किसी नेता के 'खत्म' हो जाने का कयास. उनका सबसे चर्चित सीरियल ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ रहा है, जिसका दूसरा सीजन पिछले साल ही शुरू हुआ है. भाजपा संगठन में ईरानी की नई नियुक्ति को भी उनके नए पॉलिटिकल सीजन के रूप में देखा जा रहा है.
धीरेंद्र राय