पितृसत्ता पर राहुल की अच्छी पहल, फिर मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद की एंट्री से जरूरी बहस हुई बेपटरी

पितृसत्ता के मुद्दे पर राहुल गांधी का कार्यक्रम मौजूदा राजनीतिक माहौल में हवा का ताजा झोंका था. लेकिन, महिलाओं से जुड़े इस बेहद जरूरी मुद्दे पर तब धूल पड़ने लग गई जब राहुल और उनकी टीम इस मुद्दे को मनुस्मृति से जोड़ते हुए ‘ब्राह्मणवाद’ तक ले गई. क्या पितृसत्ता का दायरा सिर्फ खास जाति, धर्म या इलाके तक सीमित है?

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राहुल गांधी ने पितृसत्ता पर जो बहस शुरू की, वह उनके ही नैरेटिव में उलझकर रह गई. (Photo- PTI) राहुल गांधी ने पितृसत्ता पर जो बहस शुरू की, वह उनके ही नैरेटिव में उलझकर रह गई. (Photo- PTI)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 26 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:30 AM IST

पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की शुरुआत जिस तरह से हुई, उसने एक पल के लिए यह उम्मीद जगाई थी कि राहुल गांधी उन बुनियादी सामाजिक बुराइयों पर बात करने जा रहा है, जिन्हें अक्सर राजनीतिक रैलियों में नजरअंदाज कर दिया जाता है. मंच पर राहुल के साथ महाराष्ट्र के अलग-अलग कोनों से आईं युवा लड़कियां और छात्राएं खड़ी थीं.

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जब इन युवतियों ने माइक थामा, तो ऑडिटोरियम में राजनीति नहीं, बल्कि महिलाओं का जमीनी दर्द गूंज उठा. एक छात्रा ने खुलकर बताया कि कैसे प्रतियोगी परीक्षाओं के लटकने और पेपर लीक की अनिश्चितता के बीच लड़कियों को पढ़ाई बीच में ही छोड़कर शादी करने का पारिवारिक दबाव झेलना पड़ता है. दूसरी छात्राओं ने बसों, सड़कों पर रोज होने वाली छेड़खानी, फाइनेंशियल इनसिक्योरिटीज और समाज में महिलाओं को देखने की संकीर्ण मानसिकता को लेकर अपनी आपबीती साझा की, जिसमें उन्हें केवल तीन बॉक्सों में रखा जाता है- ‘बेटी, पत्नी या मां’. पुरुषों की तरह उनका कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है.

इन आपबीतियों ने एक बहुत ही जीवंत और संवेदनशील बहस का आधार तैयार किया. राहुल गांधी ने भी उनकी बातों को ध्यान से सुनते हुए देश की 70 करोड़ महिलाओं की आजादी, सुरक्षा और हक के लिए “पितृसत्ता को उखाड़ फेंकने” (Smash the Patriarchy) का आह्वान किया.

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इसी बातचीत के दौरान राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक हालिया बयान पर भी सवाल उठाया. प्रधानमंत्री ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रही छात्राओं द्वारा आक्रोश में कही गई तीखी बातों पर ‘कल्चरल शॉक’ व्यक्त किया था. राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के बयान से ‘गाली’ के पूरे संदर्भ को धीरे से हटाकर उसे दोहरे मापदंड का मुद्दा बना दिया. उन्होंने दलील दी कि उसी प्रदर्शन में लड़के और लड़कियां दोनों आक्रोशित थे, लेकिन समाज और सरकार का सारा ध्यान सिर्फ लड़कियों के बोलने पर गया- मानो लड़कों का गुस्सा स्वाभाविक हो और लड़कियों का गुस्सा समाज की संस्कृति पर खतरा बन जाता हो.

यहां तक सब कुछ एक सार्थक पहल जैसा लग रहा था. लैंगिक असमानता और समाज के दोहरे रवैये पर बात होना आज के भारत के लिए एक बेहद जरूरी कदम था.

फिर हुई मनुस्मृति की एंट्री

लेकिन, समस्या तब शुरू हुई जब इस बहुआयामी और जमीनी मुद्दे को एक बहुत ही संकीर्ण राजनीतिक फ्रेम में ढालने की कोशिश की गई. कार्यक्रम आगे बढ़ते ही राहुल गांधी ने ऑडिटोरियम की बड़ी स्क्रीन पर ‘मनुस्मृति’ के श्लोक प्रदर्शित किए और यह साबित करने की कोशिश की कि भारत में पितृसत्ता की पूरी समस्या इसी एक ग्रंथ और मानसिकता से निकलती है. उन्होंने कहा कि महिला को हर उम्र में पुरुषों के अधीन रखने वाली यह सोच ही आज के उत्पीड़न का कारण है.

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और यहीं से यह बेहद जरूरी कार्यक्रम पटरी से उतरने लगा. पितृसत्ता की इस सतही और भटकी हुई व्याख्या ने पूरी बहस को ऐसा रूप दे दिया मानो यह समस्या केवल हिंदू धर्म के भीतर ही मौजूद है.

यह दलील इस सच्चाई से आंखें मूंद लेती है कि उस दिन ऑडिटोरियम में कई मुस्लिम युवतियां भी मौजूद थीं, जिनके लिए पितृसत्ता किसी धर्म ग्रंथ का विषय नहीं, बल्कि उनके अपने घरों और समाज में फैसले न ले पाने की रोजमर्रा की बेबसी थी.

सोशल मीडिया पर तुरंत यह सवाल उठने लगा कि अगर पितृसत्ता को समझाने के लिए बिग स्क्रीन पर मनुस्मृति के श्लोक दिखाए जा सकते हैं, तो क्या राहुल गांधी में साहस है कि वे अन्य धर्मों के ग्रंथों या कानूनों में महिलाओं के दर्जे और अधिकारों को लेकर लिखी गई बातों को भी सार्वजनिक रूप से दिखा सकें? इस एकतरफा दृष्टिकोण ने पितृसत्ता जैसी वैश्विक सामाजिक बुराई को महज एक धर्म-विशेष के विरोध का राजनीतिक औजार बना दिया.

पॉलिटिकल नैरेटिव का भटकाव

बहस में भटकाव का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका. कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के X पोस्ट ने रही-सही कसर पूरी कर दी और आग में घी डालने का काम किया. उनकी दलीलों का सीधा संदेश यह निकला कि जिन भी घरों में पितृसत्तात्मक सोच है, वे असल में मनुस्मृति की मान्यताओं पर ही चल रहे हैं.

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अगर इस राजनीतिक नैरेटिव को सच मान लिया जाए, तो इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि भारत के उन करोड़ों दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग (OBC) के परिवारों में पितृसत्ता होनी ही नहीं चाहिए थी, जो ऐतिहासिक रूप से मनुस्मृति के विरोध में रहे हैं और बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को मानते हैं.

लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. क्या दलित या आदिवासी समाज की महिलाओं को अपने घरों के भीतर पुरुषों के दबदबे, घरेलू हिंसा या करियर के फैसलों में अनदेखी का सामना नहीं करना पड़ता? सच यह है कि पितृसत्ता का दायरा किसी एक जाति, वर्ग या विचारधारा तक सीमित नहीं है.

लेकिन, राजनीति में कोई बात बेमतलब नहीं होती. राहुल गांधी और उनकी टीम यदि पितृसत्ता के लिए मनुस्मृति को टारगेट कर रही है, तो उनका पॉलिटिकल टारगेट बिल्कुल सटीक है. वे अच्छी तरह जानते हैं कि इससे मनुस्मृति-विरोधी दलित-आदिवासी तबका उनके पक्ष में आ जाएगा. जिसकी आगामी चुनावों में उन्हें जरूरत है.

मनुस्मृति से 'आदम और हव्वा' तक पितृसत्ता एक जैसी

इतिहास और मानव सभ्यता के विकासक्रम को देखें तो श्रम का बंटवारा और लैंगिक असमानता केवल एक ग्रंथ का परिणाम नहीं रही है. चाहे मनुस्मृति का दौर हो या फिर पश्चिमी और अब्राहमिक परंपराओं में ‘आदम और हव्वा’ से जुड़ी पुरानी अवधारणाएं- हर जगह पुरुष को ‘रक्षक और भरण-पोषण करने वाला’ और महिला को ‘घर संभालने और संतान उत्पन्न करने वाली’ भूमिका में सीमित किया गया. ये प्राचीन धारणाएं हैं. हां, उनके अवशेष आज भी समाज में किसी न किसी रूप में मौजूद हैं. लेकिन इनका दायरा न तो किसी विशेष धार्मिक बैकग्राउंड तक सीमित है, न ही किसी खास देश या संस्कृति से बंधा हुआ.

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पश्चिमी और विकसित देशों में, जहां मनुस्मृति का कोई प्रभाव नहीं है, वहां भी महिलाओं को समान काम के लिए पुरुषों से कम वेतन दिया जाता है और कॉर्पोरेट में शीर्ष पदों तक पहुंचने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है. पितृसत्ता एक वैश्विक सामाजिक ढांचा है, जिसे केवल एक राजनीतिक नैरेटिव में बांधना समस्या की गहराई को नजरअंदाज करना है.

बहस का ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ तक गिर जाना

पुणे के मंच से शुरू हुई यह चर्चा अब अपने सबसे निराशाजनक चरण में पहुंच गई है. सोशल मीडिया पर एक तबका पितृसत्ता को ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ (Brahmanical Patriarchy) करार देने पर उतारू है. भारत के लेफ्ट-लिबरलों की यह पुरानी परिपाटी रही है कि जब तक समाज की किसी भी जटिल बुराई को खींचकर 'ब्राह्मणवाद' से न जोड़ दिया जाए, तब तक उन्हें समाधान अधूरा लगता है. इस मामले में भी यही हुआ. मीडिया और अकादमिक बहसों में आम लड़कियों के मुद्दे पीछे छूट गए और पूरा ध्यान जातिगत घेराबंदी पर केंद्रित हो गया.

राहुल गांधी का जो कार्यक्रम छात्राओं की सुरक्षा, पढ़ाई के मौकों और रोजमर्रा के भेदभाव पर आधारित था, वह पूरी तरह से एक विचारधाराओं के युद्ध का मैदान बन गया. पितृसत्ता के खिलाफ पुरुषों और महिलाओं को एकजुट करने के बजाय, इस बहस को एक खास वर्ग और धर्म के खिलाफ खड़ा कर दिया गया, जिससे समाज का एक बड़ा वर्ग इस संवाद से पूरी तरह कट गया.

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राहुल गांधी ने पुणे में महिलाओं की आपबीती सुनकर एक बेहद जरूरी और साहसिक शुरुआत की थी. लेकिन अफसोस कि भटकी हुई व्याख्याओं, कांग्रेस के उथले राजनीतिक नैरेटिव और वामपंथी बौद्धिक जुगाली के चक्कर में यह अच्छी पहल आखिरकार एक बदतरीन और बेनतीजा बहस में बदलकर रह गई है.

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