मोदी को अपमानित करने की बजाय राहुल कांग्रेस को जिताने का सूत्र खोजें

विदेश नीति की आलोचना करना लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन राजनीतिक बहस जब व्यक्तिगत कटाक्ष में बदल जाती है तो उसका लाभ कम और नुकसान अधिक होता है.

Advertisement
Congress leaders Rahul Gandhi and Sandeep Dikshit hug each other. Congress leaders Rahul Gandhi and Sandeep Dikshit hug each other.

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 14 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:50 AM IST

कांग्रेस पार्टी के एक कार्यक्रम में गुरुवार को राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर हमला बोलते हुए कहा कि ‘पता नहीं कहां से इनके दिमाग में घुस गया कि गले पड़ना ही विदेश नीति है’. यह टिप्पणी सिर्फ एक आलोचना नहीं थी, बल्कि व्यक्तिगत अपमान का स्वर लिए हुए थी. भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस पर राहुल गांधी के हमले कोई नई बात नहीं है. वे लगातार इन संगठनों को निशाना बनाते रहे हैं.लेकिन बीच-बीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उनके तेवर काफी तीखे हो जाते हैं.

Advertisement

गले लगाने वाली विदेश नीति वाला यह बयान उसी श्रृंखला की कड़ी है. गले पड़ने वाली बात पर न केवल भारतीय प्रधानमंत्री पर तंज कसा  गया बल्कि बाद में कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने तो हद ही कर दी. दीक्षित ने कहा कि, कहीं मेलोनी( इटली  की प्रधानमंत्री ) समझकर तो गले नहीं लगा रहा हैं? इस बात पर हाल में  मौजूद सभी लोग हंसने लगे.जाहिर है कि किसी भी विदेशी प्रमुख पर इस तरह की टिप्पणी शोभा नहीं देती.वह भी उस नेता पर जो भारत के लिए पॉजिटिव अप्रोच रखता हो. 

राहुल गांधी समय-समय पर मोदी को लेकर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं जो राजनीतिक बहस से आगे बढ़कर व्यक्तिगत स्तर पर अपमानित करने वाले लगते हैं. कभी ‘सूट-बूट की सरकार’ कहकर हमला किया, कभी ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया, कभी विदेश नीति को लेकर व्यंग्य किए और कभी शासन-प्रशासन की शैली को लेकर तीखे शब्दों का सहारा लिया. ये हमले विपक्ष के रूप में उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं. लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जरूरी है. लेकिन जब आलोचना व्यक्तिगत अपमान में बदल जाए तो यह उल्टे नुकसान कर देता है. सवाल उठता है कि क्या इससे कांग्रेस को कोई ठोस फायदा हो रहा है?

Advertisement

आज की राजनीति में सिर्फ विरोध करना पर्याप्त नहीं है. जनता परिणाम देखती है. मोदी सरकार के खिलाफ हमले करने से पहले कांग्रेस को आंतरिक रूप से मजबूत होने की जरूरत है. पार्टी संगठन कमजोर पड़ा हुआ है. कई राज्यों में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता निराश हैं. युवा पीढ़ी से जुड़ाव कमजोर है. वैचारिक स्पष्टता और नीतिगत विकल्प पेश करने में भी कमी दिखती है. राहुल गांधी अगर मोदी को अपमानित करने में उतनी ही ऊर्जा लगाएं जितनी कांग्रेस को फिर से प्रासंगिक बनाने में लगानी चाहिए तो स्थिति अलग हो सकती है.

कांग्रेस को सफलता के सूत्र सबसे पहले अपनी पार्टी  में खोजनी चाहिए. पार्टी में संगठनात्मक सुधार और लोकतंत्रीकरण की जरूरत है. जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक जवाबदेही तय हो. युवाओं को जगह मिले. परिवारवाद के आरोपों से पार्टी को मुक्त करने के ठोस कदम दिखने चाहिए. इसके साथ  ही नीतिगत स्पष्टता भी जरूरत है. कई बार पार्टी लेफ्ट की ओर झुकी नजर आती है , जो कि पार्टी का स्वाभाविक रूप कभी नहीं रहा है. अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विदेश नीति पर कांग्रेस का अपना ठोस एजेंडा तय करना चाहिए. सिर्फ मोदी की आलोचना करने से जनता को विकल्प नहीं मिलता. उन्हें बताना होगा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आए तो क्या अलग करेगी.

Advertisement

मोदी की लोकप्रियता और भाजपा के संगठनात्मक तंत्र को देखते हुए सिर्फ व्यक्तिगत हमले से चुनाव नहीं जीते जा सकते. 2014 के बाद से कई चुनावों में कांग्रेस को यह अनुभव हो चुका है. उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में पार्टी की स्थिति सुधारने के लिए स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करना होगा. दक्षिण भारत में भी निरंतरता बनाए रखने की चुनौती है. राहुल गांधी अगर इन चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करें तो उनका राजनीतिक कद और बढ़ेगा.

इतिहास भी यही बताता है कि सफल विपक्ष केवल सरकार की आलोचना नहीं करता, बल्कि जनता को यह भरोसा दिलाता है कि उसके पास बेहतर विकल्प है. अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस की आलोचना की, लेकिन साथ ही एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि भी प्रस्तुत की. नरेंद्र मोदी ने भी 2014 से पहले तत्कालीन सरकार की कमियों को उजागर किया, पर उसके साथ विकास और सुशासन का अपना मॉडल भी रखा. केवल विरोध कभी पर्याप्त नहीं होता.

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने यह संकेत दिया था कि वे एक सकारात्मक राजनीतिक एजेंडा गढ़ना चाहते हैं. यही वह दिशा है जिसमें कांग्रेस को आगे बढ़ने की आवश्यकता है. यदि पार्टी की पूरी राजनीतिक ऊर्जा प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाने में खर्च होगी तो वह अपने संगठनात्मक और वैचारिक पुनर्निर्माण के महत्वपूर्ण कार्य से भटक सकती है.

Advertisement

भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी एक सशक्त और लोकप्रिय नेता हैं. उनसे असहमति हो सकती है, उनकी नीतियों की आलोचना भी हो सकती है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियां अक्सर उस राजनीतिक बहस को कमजोर कर देती हैं जो नीतियों और विचारों के स्तर पर होनी चाहिए. राहुल गांधी यदि वास्तव में कांग्रेस को सत्ता के करीब लाना चाहते हैं तो उन्हें मोदी को अपमानित करने के बजाय कांग्रेस को मजबूत बनाने के सूत्र खोजने होंगे.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »