NTA : एग्जाम लेने में फेल, पेपर लीक ‘पोस्टमॉर्टम’ में बेस्ट

भारत में कई अहम परीक्षाओं की जिम्मेदारी संभालने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) फिर फेल हो गई. प्री-मेडिकल परीक्षा NEET का पेपर लीक हुआ. इस परीक्षा को देने वाले देश के 22 लाख छात्र मायूस हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार और एजेंसी सिर्फ दिलासा दे रही है और जांच का आश्वासन दे रही है. ये सिलसिला एक परंपरा बन चुका है.

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NEET पेपर लीक के बाद सरकार और NTA खानापूर्ति कर रही है, जबकि छात्र असंतुष्ट और नाराज हैं. NEET पेपर लीक के बाद सरकार और NTA खानापूर्ति कर रही है, जबकि छात्र असंतुष्ट और नाराज हैं.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 13 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:28 PM IST

मोदी सरकार की एक खास पहचान उसकी गोपनीयता रही है. नोटबंदी से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक तक, सब सीक्रेट. मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसकी भनक भी कई बार विधायक दल तक को नहीं लगी. लेकिन, विडंबना देखिए कि देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाएं कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) अपने पेपर्स की गोपनीयता नहीं बचा पा रही.

ऐसा नहीं है कि पहली बार पेपर लीक हुआ हो. बल्कि, अब यह ‘घटना’ कम और ‘प्रक्रिया’ ज्यादा लगने लगी है. हर साल लाखों बच्चे तैयारी करते हैं. घरों में तनाव बढ़ता है. कोचिंग संस्थानों के बाहर रैंकर्स के पोस्टर लगते हैं. माता-पिता अपनी उम्मीदों का वजन बच्चों के बैग में रख देते हैं. फिर परीक्षा होती है. उसके बाद कुछ घंटे का सन्नाटा. और फिर अचानक खबर आती है- ‘पेपर लीक.’

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इस बार तो कहानी और भी विचित्र निकली. खबर आई कि NEET 2026 का पेपर जहां छपा, वहीं से बाहर आ गया. यानी जिस जगह से गोपनीयता शुरू होनी थी, वहीं उसका अंतिम संस्कार हो गया. 22 लाख बच्चे महीनों से नहीं, कई-कई सालों से इस परीक्षा की तैयारी कर रहे थे. किसी ने दूसरा ड्रॉप लिया था, कोई तीसरे प्रयास में था. किसी किसान पिता ने जमीन गिरवी रखकर कोटा की फीस भरी थी. किसी मां ने अपने गहने बेचे थे. लेकिन, असली खेल कहीं और चल रहा था. वहां सवाल फिजिक्स, कैमेस्ट्री या जूलॉजी का नहीं था. वहां सवाल था- ‘पेपर चाहिए या नहीं?’

पेपर लीक के बाद NTA की ‘अद्भुत सक्रियता’

NTA की सबसे बड़ी खूबी परीक्षा कराने में नहीं, परीक्षा बिगड़ने के बाद सक्रिय होने में है. एजेंसी का असली कौशल ‘डैमेज कंट्रोल’ में दिखाई देता है. घटना के पहले वह अक्सर अनुपस्थित रहती है, लेकिन घटना के बाद इतनी तत्परता से सामने आती है कि लगता है मानो पूरी तैयारी उसी चरण की थी.

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ईमानदारी : ‘हां, पेपर लीक हुआ है’

NTA की ईमानदारी की दाद देनी होगी. जब तक पुलिस छापे मार चुकी होती है, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम चैट वायरल हो चुकी होती है और आधा देश समझ चुका होता है कि परीक्षा की विश्वसनीयता खत्म हो गई है, तब एजेंसी सामने आकर स्वीकार करती है- ‘हमें अनियमितताओं की जानकारी मिली है.’

फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान गंभीर चेहरा बनाकर कहते हैं- ‘सरकार छात्रों के साथ अन्याय नहीं होने देगी.’ यह बयान अब इतना नियमित हो चुका है कि इसे NTA के लोगो के नीचे टैगलाइन की तरह छाप देना चाहिए.

मुस्तैदी : परीक्षा रद्द करने की तेज़ी

पेपर लीक की खबर के बाद NTA जिस गति से परीक्षा रद्द करती है, उसे देखकर लगता है कि एजेंसी ने कम से कम इस हिस्से का अभ्यास बहुत अच्छे से कर रखा है.

22 लाख छात्रों के लिए परीक्षा सिर्फ तीन घंटे का टेस्ट नहीं होती. वह एक साल की नींद, परिवार की कमाई और मानसिक संतुलन का कुल योग होती है. लेकिन, परीक्षा रद्द करने वाले नोटिस में यह सब सिर्फ एक लाइन में बदल जाता है- ‘Due to certain irregularities…’

कर्मठता : फिर से परीक्षा कराइए

परीक्षा रद्द हुई नहीं कि एजेंसी दोबारा परीक्षा कराने की तैयारी में लग जाती है. जैसे किसी ने कहा हो- ‘ट्रॉमा अधूरा रह गया था, इसे फिर से दोहराना जरूरी है.’

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छात्र फिर से वही किताबें खोलेंगे. वही चैप्टर दोहराएंगे. वही कटऑफ की चर्चा होगी. वही डर कि ‘इस बार सीटें और कम पड़ जाएंगी.’

भारत में मेडिकल सीटें पहले ही इतनी सीमित हैं कि NEET सिर्फ परीक्षा नहीं, सामूहिक बेचैनी का राष्ट्रीय आयोजन बन चुकी है. ऊपर से पेपर लीक इस बेचैनी को अविश्वास में बदल देता है. छात्र पूछ रहे हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि अगली परीक्षा का पेपर लीक नहीं होगा?

NTA से ज्यादा अपग्रेड होते गए पेपर लीक करने वाले

बार-बार NEET पेपर लीक के साथ यह तो तय हो गया है कि NTA यदि डाल-डाल है, तो पेपर लीक करने वाले ‘हुनरमंद’ पात-पात. उन्होंने ये बार-बार साबित किया है. अपनी मेहनत से. जोरदार जुगाड़ से. चार-पांच साल पहले तक खबरें आती थीं ‘मुन्नाभाई’ वाली. NEET परीक्षा के कुछ सेंटर्स पर पेपर सॉल्विंग गैंग एक्टिव होती. रोल नंबर में हेरफेर कर कुछ होशियार छात्रों को क्लाइंट के एवज में पेपर सॉल्व करने के लिए भेजा जाता है. लेकिन, इस बिजनेस में रिस्क ज्यादा और कमाई कम थी. पैसा कई बार रिजल्ट के बाद मिलता था. पेपर लीक वाला काम कॉर्पोरेट लेवल का है. एकदम नेशनल. सीकर का आदमी तमिलनाडु में ट्रेड कर सकता है. और ये बिजनेस B2B है, ना कि B2C. यानी पेपर लीक वाले सीधे बड़े कोचिंग संस्थानों से डील कर रहे थे, ना कि छुट्टे छात्रों से.

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सबसे भयावह बात यह है कि इस पूरे कारोबार ने शिक्षा व्यवस्था के भीतर एक समानांतर व्यवस्था बना दी है. मेहनत और प्रतिभा के समानांतर ‘एक्सेस’ और ‘नेटवर्क’ की व्यवस्था.

NTA शुरू करे ‘बग बाउंटी’, और CBI को बना ले परमानेंट मेंबर

दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां अपने सिस्टम और सॉफ्टवेयर की खामियां खोजने वालों को इनाम देती हैं. Google जैसी कंपनियां ‘बग बाउंटी प्रोग्राम’ चलाती हैं. अगर कोई उनके सॉफ्टवेयर की कमजोरी पकड़ ले, तो उसे सम्मान भी मिलता है और पैसा भी. तो NTA क्यों पीछे रहे? जब एजेंसी अपने पेपर्स की गोपनीयता बचाने में बार-बार असफल हो रही है, तो क्यों न खुला ऐलान कर दे- ‘जो पेपर लीक का सोर्स पकड़वाएगा, उसे पुरस्कार दिया जाएगा.’

कम से कम देश को यह तो पता चलेगा कि सिस्टम की कमजोरियां आखिर हैं कहां. हालांकि, यहां भी समस्या वही है. कहीं ऐसा न हो कि पुरस्कार पाने वालों की सूची और आरोपियों की सूची एक ही निकल आए. ताकि, धंधा चलता रहे.

हर बार पेपर लीक होता है. हर बार जांच सीबीआई को सौंप दी जाती है. हर बार बयान आता है- ‘दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.’ लेकिन, सवाल यह है कि यह सिलसिला आखिर कब तक? यदि हर साल परीक्षा के बाद CBI को ही आना है, तो क्यों न उसे NTA की स्थायी स्ट्रक्चर का हिस्सा बना दिया जाए? कम से कम औपचारिकता का समय बचेगा.

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डॉक्टर बनने निकले बच्चे, सिस्टम के मरीज बन गए

इस पूरी कहानी का सबसे दुखद हिस्सा यह नहीं कि पेपर लीक हुआ. दुखद यह है कि अब किसी को बहुत आश्चर्य नहीं होता. छात्रों ने मान लिया है कि परीक्षा के साथ अनिश्चितता मुफ्त मिलेगी.

माता-पिता ने मान लिया है कि मेहनत पर्याप्त नहीं है. और व्यवस्था ने शायद मान लिया है कि कुछ दिनों के शोर के बाद सब सामान्य हो जाएगा.

लेकिन, सामान्य कुछ भी नहीं होता. 22 लाख बच्चे डॉक्टर बनने निकले थे. उनकी तमन्ना थी कि वे परीक्षा पास करके मरीज का ट्रीटमेंट करना सीखेंगे. लेकिन, NTA खुद एक मरीज था. उसकी बीमारी का नाम है ‘कमजोर परीक्षा तंत्र’. जिसका एक पहलू सबसे ताकतवर है- एग्जाम सिस्टम का पोस्टमॉर्टम अनाउंस करना. क्योंकि वो जानते हैं कि ‘NTA परीक्षा कराने में नहीं, पेपर लीक के पोस्टमॉर्टम में बेस्ट है.’

चलते-चलतेः NTA की परीक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने पिछले साल सिफारिश की थी कि पेपर लीक से निजात पाने के लिए राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को लागू किया जाए. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राधाकृष्णन समिति की सिफारिशें 2024 से फाइलों में बंद हैं. कुल मिलाकर, सरकार के भीतर पेपर लीक होने के बाद चिंता बहुत होती है. फिर बैठकें होती हैं. कमेटियां बनती हैं. और सिफारिश भी होती हैं. बस, नहीं होती है तो सिस्टम की सफाई.

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