संसद का मानसून सत्र जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, विपक्ष एक के बाद एक ऐसे मुद्दे सामने ला रहा है जिनसे सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. सरकार के लिए मुश्किल यह नहीं है कि विपक्ष सवाल पूछ रहा है. लोकतंत्र में सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है. असली चुनौती यह है कि पिछले कुछ समय से विपक्ष के उठाए मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में आते जा रहे हैं और सरकार को उन पर अपना रुख स्पष्ट करना पड़ रहा है. छात्र आंदोलन से लेकर चढ़ावा चोरी के आरोपों तक और अब एफसीआरए कानून को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की तैयारी तक—घटनाक्रम यह संकेत दे रहा है कि विपक्ष संसद में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में सफल हो रहा है.
छात्र आंदोलनों का मुद्दा इसका सबसे ताजा उदाहरण है. देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया को लेकर युवाओं में नाराजगी देखने को मिली है. यह ऐसा मुद्दा है जिसे सरकार के लिए केवल विपक्ष का राजनीतिक हमला बताकर खारिज करना आसान नहीं है. आखिर जिन युवाओं के हाथ में डिग्री है लेकिन रोजगार का भरोसा नहीं, उनके सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं दिया जा सकता. यही वजह है कि सरकार को छात्रों से संवाद, परीक्षा व्यवस्था में सुधार और जांच जैसे मुद्दों पर कदम उठाने पड़ रहे हैं.
दूसरा मुद्दा धार्मिक स्थलों से जुड़े चढ़ावे की चोरी का है. मंदिरों और दूसरे धार्मिक संस्थानों में आने वाले चढ़ावे की सुरक्षा तथा उसके प्रबंधन पर सवाल उठना कोई नया विषय नहीं है. बीजेपी के लिए इस मुद्दे पर बहस करना आसान नहीं था,पर जिस तरह सरकार ने विपक्ष के इस मुद्दे पर बहस की डिमांड को स्वीकार किया गया है वो साफ बताता है कि परिस्थितियां बदली हुईं हैं. जाहिर है कि विपक्ष इसे संसद में चर्चा का मुद्दा बनाएगा और सरकार उस पर चर्चा के लिए तैयार होती है, तो आम लोगों के बीच इसका राजनीतिक महत्व बढ़ जाएगा. सरकार के लिए ऐसे विषयों से बचना आसान नहीं होगा, क्योंकि बीजेपी जैसी पार्टी के लिए धार्मिक आस्था का प्रश्न सीधे उसके करोड़ों समर्थकों की भावनाओं से जुड़ा है. पार्टी के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को केवल राजनीतिक आरोप कहकर टालना ठीक भी नहीं था. यह पार्टी के लिए अधिक मुश्किल पैदा कर सकता है.
इतना ही नहीं एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान विनियमन कानून में बदलाव का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है. यदि इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा जाता है तो इसका अर्थ होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर विपक्ष का साथ लेने को तैयार है. हो सकता है कि एनडीए सरकार ने एफसीआए कानून पर समझौता करके परिसीमन कानून के लिए सौदेबाजी कर लिया हो. वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि एफसीआरए कानून में व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है. विदेशी फंडिंग, गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है. सरकार के लिए यह जरूरी है कि विदेशी धन के दुरुपयोग को रोका जाए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कानून का इस्तेमाल वैध नागरिक गतिविधियों को दबाने के लिए न हो.
इन घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखें तो विपक्ष की रणनीति समझ में आती है. विपक्ष के पास सरकार को हर मुद्दे पर घेरने की ताकत भले न हो, लेकिन वह ऐसे मुद्दे चुन रहा है जिनका सीधा संबंध आम नागरिक से है. युवा रोजगार और परीक्षा व्यवस्था से जुड़ा है. धार्मिक चढ़ावे का सवाल आस्था से जुड़ा है. एफसीआरए का प्रश्न नागरिक समाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़ा है. यानी विपक्ष ऐसे मुद्दों की तलाश में है जिन्हें संसद के बाहर भी जनसमर्थन मिल सकता है.
सरकार के सामने चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि केवल बहुमत के आधार पर हर मुद्दे को दबाना संभव नहीं है. लोकतंत्र में संख्या सरकार को कानून बनाने की ताकत देती है, लेकिन राजनीतिक वैधता केवल संख्या से नहीं आती. सरकार को यह भी दिखाना पड़ता है कि वह असहमति को सुनने और उचित मांगों पर विचार करने के लिए तैयार है.
विपक्ष के लिए भी यह अवसर आसान नहीं है. मुद्दे उठाना और उन्हें राजनीतिक आंदोलन में बदलना दो अलग-अलग बातें हैं. यदि विपक्ष केवल सरकार को घेरने की कोशिश करता रहा और वैकल्पिक समाधान नहीं देता, तो उसकी राजनीति भी आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाएगी. जनता अब केवल यह नहीं देखती कि सरकार की आलोचना कौन कर रहा है, बल्कि यह भी देखती है कि आलोचना करने वाला पक्ष सत्ता में आए तो क्या कर लेगा?
फिर भी मौजूदा घटनाक्रम विपक्ष के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से उस पर यह आरोप लगता रहा है कि वह संसद में सरकार के सामने प्रभावी चुनौती पेश नहीं कर पा रहा है. अब यदि सरकार विपक्ष के उठाए मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार हो रही है, विधेयकों को समितियों के पास भेजने पर विचार कर रही है और छात्र जैसे संवेदनशील मुद्दों पर जवाब दे रही है, तो इसका मतलब है कि विपक्ष ने कम से कम राजनीतिक एजेंडा तय करने की कोशिश जरूर तेज कर दी है.
हालांकि कि इसे सरकार की कमजोरी कहना जल्दबाजी होगी. लोकतंत्र में सरकार का विपक्ष के मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार होना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि संसदीय व्यवस्था की मजबूती भी हो सकती है. लेकिन अगर हर मुद्दे पर सरकार को रक्षात्मक मुद्रा अपनानी पड़े, तो यह जरूर संकेत है कि विपक्ष की रणनीति असर डाल रही है.
दरअसल इस समय विपक्ष को सरकार को घेरने की मजबूरी है और सरकार को विपक्ष को जवाब देने की. दोनों की मजबूरियां लोकतंत्र के लिए बुरी नहीं हैं. बुरा तब होगा जब यह मुकाबला केवल राजनीतिक शोर बनकर रह जाए. संसद की असली सफलता इसी में है कि छात्र के सवाल का जवाब मिले, धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता बढ़े और एफसीआरए जैसे कानूनों पर व्यापक विचार-विमर्श हो. आखिर विपक्ष का काम सरकार को घेरना है और सरकार का काम उन सवालों का जवाब देना. अगर यह प्रक्रिया ईमानदारी से चलती है तो राजनीतिक टकराव लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत बन सकता है.
संयम श्रीवास्तव