किसी महिला ने क्या पहना है, यह सवाल जब उसके चरित्र, संस्कार और धर्म से जोड़ दिया जाता है तो मामला कपड़े का नहीं रह जाता है. फिर यह सवाल बन जाता है कि समाज महिला के शरीर और उसकी पसंद पर कितना अधिकार चाहता है. कृति सेनन के रक्षाबंधन वाले विज्ञापन पर छिड़ी बहस को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है.
एक ज्वेलरी ब्रांड के रक्षाबंधन विज्ञापन में कृति सेनन ब्रालेट-स्टाइल ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट में दिखाई देती हैं. विज्ञापन में वह अपने ऑनस्क्रीन भाई को राखी बांधती हैं. सोशल मीडिया के एक वर्ग को यह पहनावा रक्षाबंधन के अनुरूप नहीं लगा. कुछ लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया, तो कुछ ने पूछा कि पूजा की थाली और तिलक कहां हैं. कुत्ते को राखी बांधने के दृश्य ने भी कुछ लोगों को नाराज किया.
यहां तक तो असहमति स्वाभाविक है. किसी विज्ञापन की रचनात्मकता, उसकी प्रस्तुति या उसके संदेश पर सवाल उठाने का अधिकार हर किसी को है. यह भी कहा जा सकता है कि किसी धार्मिक-सांस्कृतिक पर्व को बाजार के लिए इतना आधुनिक बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए कि उसकी पहचान ही बदल जाए. लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब विज्ञापन की आलोचना से आगे बढ़कर महिला के कपड़े पर सामाजिक पहरेदारी शुरू हो जाए.
कृति ने क्या पहना, यह पसंद का विषय हो सकता है. लेकिन क्या उन्हें वह पहनने की अनुमति होनी चाहिए या नहीं, यह अधिकार का सवाल है.
यही वह महीन रेखा है जिसे समझना आज जरूरी है. किसी हिंदू परिवार में रक्षाबंधन पर बहन साड़ी पहनती है, सलवार-सूट पहनती है, लहंगा पहनती है या पश्चिमी परिधान ,यह परिवार और व्यक्ति की पसंद हो सकती है.पूजा की थाली रखना परंपरा हो सकती है, लेकिन हर परिवार की परंपरा बिल्कुल एक जैसी नहीं होती है. भारत की हिंदू परंपरा की सबसे बड़ी खूबी ही उसकी विविधता रही है. यहां पूजा के तरीके, खान-पान, पहनावे और त्योहार मनाने की शैली क्षेत्र, जाति, परिवार और समुदाय के अनुसार बदलती रही है.
इसलिए किसी एक पहनावे को ‘हिंदू संस्कृति’ का अंतिम प्रमाण मान लेना खुद हिंदू समाज की विविधता को छोटा करना है.और यहीं से एक बड़ा खतरा पैदा होता है. आज सवाल है कि रक्षाबंधन के विज्ञापन में महिला ने कितना कपड़ा पहना? कल सवाल हो सकता है कि त्योहार के दिन लड़की को क्या पहनना चाहिए? फिर सवाल होगा कि बाहर जाते समय क्या पहनना चाहिए? फिर यह भी हो सकता है कि किसके सामने क्या पहनना चाहिए? और अंततः सवाल महिला के कपड़े से निकलकर उसकी स्वतंत्रता तक पहुंच सकता है.
कट्टरता अक्सर एक दिन में चरम पर नहीं पहुंचती. वह छोटे-छोटे सामाजिक आग्रहों से रास्ता बनाती है. पहले कोई कहता है कि ‘यह कपड़ा हमारी संस्कृति के खिलाफ है’ फिर कहा जाता है कि ‘अच्छी लड़कियां ऐसा नहीं पहनतीं’ उसके बाद समाज तय करने लगता है कि महिलाओं को किस तरह रहना चाहिए. जब यह सोच संस्थागत हो जाती है तो महिला की स्वतंत्रता पर पहरा लगने लगता है.
पाकिस्तान का अनुभव इस मामले में हमारे सामने एक चेतावनी की तरह है. वहां धार्मिक कट्टरता के विस्तार ने समाज के एक बड़े हिस्से को धीरे-धीरे ऐसे सामाजिक दबावों का आदी बनाया, जिनमें महिलाओं के पहनावे और सार्वजनिक व्यवहार को लेकर कठोर मानदंड थोपे गए. भारत और पाकिस्तान की सामाजिक परिस्थितियां बिल्कुल समान नहीं हैं, न ही दोनों देशों की धार्मिक-सांस्कृतिक यात्रा को एक तराजू पर रखा जा सकता है. लेकिन एक बात समान रूप से समझी जा सकती है जब समाज महिलाओं के कपड़ों को अपनी सामूहिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देता है, तो स्वतंत्रता का दायरा सिकुड़ने लगता है.
एक तर्क अक्सर दिया जाता है कि क्या किसी इस्लामी त्योहार के विज्ञापन में कोई अभिनेत्री ऐसी पोशाक पहनने की हिम्मत कर सकती है? लेकिन इस सवाल में ही असली जवाब छिपा है. क्या हिंदू धर्म को अपनी सामाजिक मर्यादाएं तय करने के लिए इस्लामी कट्टरता को आदर्श बनाना चाहिए? अगर किसी दूसरे धर्म में महिलाओं के पहनावे पर ज्यादा पाबंदी है तो क्या हिंदू समाज की उपलब्धि यह होगी कि वह भी उसी दिशा में बढ़े? हिंदू परंपरा की खूबी उसकी खुली और बहुलतावादी प्रकृति रही है. इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘वहां ऐसा हो सकता है या नहीं’, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या हम अपने समाज को वहां तक ले जाना चाहते हैं? धर्म की शक्ति अनुशासन थोपने में नहीं, विविधता को स्वीकार करने में है.
भारत की ताकत यह नहीं है कि यहां हर महिला एक ही तरह के कपड़े पहने. भारत की ताकत यह है कि यहां साड़ी पहनने वाली महिला भी अपनी है और जींस पहनने वाली भी अपनी है. घूंघट करने वाली भी अपनी है और बिना घूंघट रहने वाली भी सबकी पसंद है. मंदिर जाने वाली महिला भी अपनी है और फैशन शो में जाने वाली भी. हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए महिलाओं को एक तय पोशाक में कैद करना जरूरी नहीं है.
हिंदू धर्म को अगर सचमुच मजबूत बनाना है तो उसे महिलाओं की स्वतंत्रता से डरने की जरूरत नहीं है. हिंदू समाज की आत्मा इतनी कमजोर नहीं हो सकती कि एक अभिनेत्री के परिधान से उसका धर्म खतरे में पड़ जाए. धर्म की रक्षा महिलाओं के शरीर पर पहरा बैठाकर नहीं, बल्कि अपने मूल्यों की शक्ति से होती है.
इसलिए कृति के कपड़े पसंद नहीं हैं तो उन्हें नापसंद कीजिए. विज्ञापन खराब लगा तो उसे खारिज कीजिए. ब्रांड की मार्केटिंग पर सवाल उठाइए. लेकिन इस असहमति को महिला की स्वतंत्रता पर नियंत्रण का औजार मत बनाइए.
क्योंकि पर्दा केवल चेहरे पर नहीं पड़ता. कभी-कभी पर्दा सोच पर भी पड़ जाता है.और जिस दिन समाज को यह तय करने की आदत पड़ गई कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए, उस दिन खतरा कृति सेनन के कपड़ों से कहीं बड़ा होगा. तब सवाल यह नहीं रहेगा कि महिला ने कितना पहना है. सवाल यह होगा कि उसे अपनी पसंद से जीने की कितनी आजादी बची है.
संयम श्रीवास्तव