यूपी में गोमूत्र खरीद के पीछे कितना दम, कितनी तैयारी?

उत्तर प्रदेश सरकार ने बुलंदशहर के 15 गांवों में गोमूत्र खरीद का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसके तहत किसानों और पशुपालकों से 10 रुपये लीटर गोमूत्र खरीदा जा रहा है.

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योगी सरकार के गोमूत्र खरीद के पीछे कितना दम. (photo: ITG) योगी सरकार के गोमूत्र खरीद के पीछे कितना दम. (photo: ITG)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 11 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:05 AM IST

उत्तर प्रदेश सरकार ने बुलंदशहर में गोमूत्र खरीद का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है. किसानों और पशुपालकों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर पर गोमूत्र खरीदा जा रहा है. 15 गांवों से प्रतिदिन करीब 500 लीटर एकत्र हो रहा है. इसे जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर जैविक कृषि उत्पाद और दवाएं बनाने की बात कही जा रही है. 300 महिलाओं को शेयरहोल्डर बनाकर उन्हें प्रति लीटर दो रुपये कमीशन देने का प्रावधान भी है. योजना को सफल होने पर पूरे प्रदेश में फैलाने और दर बढ़ाकर 20 रुपये करने की घोषणा की गई है. यह पहल गो-संरक्षण, ग्रामीण आय बढ़ाने और जैविक खेती को जोड़ने के नाम पर पेश की जा रही है.

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सवाल यह है कि क्या यह योजना पूरी तैयारी और दीर्घकालिक ढांचे के साथ लाई गई है, या चुनाव पूर्व लोक-लुभावन घोषणा मात्र है? देश के अन्य हिस्सों में पहले भी ऐसी योजनाएं शुरू हुईं, पर वे सिरे नहीं चढ़ सकीं. छत्तीसगढ़ में 2022 में भगवान न्याय योजना के विस्तार के तहत गोमूत्र चार रुपये प्रति लीटर पर खरीदा गया. गुजरात की बनास डेयरी ने भी पांच रुपये प्रति लीटर पर खरीद शुरू की. कई जगहों पर पंचगव्य आधारित उत्पाद बनाने के प्रयास हुए. परंतु अधिकांश योजनाएं सीमित पैमाने पर सिमट गईं या धीमी पड़ गईं. कारण साफ था. संग्रहण केंद्रों की कमी, भंडारण की व्यवस्था न होना, गुणवत्ता नियंत्रण का अभाव, बाजार मांग का न बन पाना और सप्लाई चेन का टूटना. गोमूत्र खरीदा तो गया, पर जरूरत के अनुसार प्रोसेसिंग और वितरण न होने से वह बेकार या अनुपयोगी हो गया.

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गोमूत्र आयुर्वेद में कई व्याधियों के निवारक के रूप में वर्णित है. खेती में जैविक कीटनाशक और उर्वरक के रूप में भी इसका पारंपरिक उपयोग होता रहा है. परंतु इन दावों को व्यावसायिक और टिकाऊ बनाने के लिए सिर्फ खरीद शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है. बिना प्रॉपर ढांचे के योजना कुछ दिनों में ही दम तोड़ देती है. ताजा गोमूत्र का भंडारण चुनौतीपूर्ण है. गर्म मौसम में गुणवत्ता तेजी से गिरती है. संग्रहण के लिए गांव स्तर पर साफ-सुथरे टैंक, नियमित परिवहन, कोल्ड स्टोरेज या प्रोसेसिंग यूनिट्स की जरूरत होती है. इसके साथ  ही गुणवत्ता मानक भी तय करने होंगे.किस नस्ल की गाय का मूत्र है? स्वच्छता के मापदंड, परीक्षण की व्यवस्था आदि के बिना गोमूत्र न तो आयुर्वेदिक दवाओं के लिए विश्वसनीय बनेगा, न कृषि उत्पादों के लिए प्रभावी हो पाएगा.

सरकार को बाजार तक पहुंचाने के लिए भी बहुत मेहनत करनी होगी.  निजी क्षेत्र, आयुर्वेदिक कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों को साथ लेकर वैज्ञानिक परीक्षण कराने होंगे. अन्यथा यह सरकारी खरीद पर निर्भर सब्सिडी वाली योजना बनकर रह जाएगी, जो लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी. महिलाओं को शेयरहोल्डर बनाने का प्रावधान सकारात्मक है, पर उन्हें प्रशिक्षण और बाजार पहुंच भी देनी होगी.

पिछले अनुभव बताते हैं कि अच्छी मंशा या सांस्कृतिक भावना पर्याप्त नहीं होती है. यदि योजना को केवल गो-संरक्षण के प्रतीक के रूप में पेश किया गया और व्यावहारिक चुनौतियों जैसे भंडारण, सप्लाई चेन, गुणवत्ता और मांग आदि की अनदेखी की गई, तो यह भी उन अनेक योजनाओं की कतार में शामिल हो जाएगी जो शुरू तो हुईं पर सिरे नहीं चढ़ सकीं.

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